लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

समाज

आख़िर क्यों बसंती, इंदरपाल और जयभगवान जैसे किसानों का दिल्ली कूच करना ज़रूरी था?

तारीख़ 2 अक्टूबर, दिल्ली के गाजीपुर मंडी के पास यूपी गेट पर सत्तर हजार के करीब किसानों की भीड़ जमा है। इसी भीड़ के बीच हाथ में गजा लठ(तीन फ़ीट की लाठी) लिए बसन्ती खड़ी हैं। वह उत्तरप्रदेश के बरेली के गांव जालपा मोहनपुर से चलकर दिल्ली आई हैं।

बसन्ती छोटे किसान परिवार की कर्ता-धर्ता हैं, जिसके पास सिर्फ 4 बीघा जमीन है। यहां आने का कारण पूछने पर वह चेहरे पर तेवर भरकर बताती हैं,

“हमारे पास थोड़ी सी जमीन है। उसी से गुज़ारा करते थे, लेकिन अब वह ठीक हालत में नहीं है। जिसके कारण अब हमारी ज़िन्दगी भी ठीक स्थिति में नहीं है। रूखी-सूखी रोटी खाकर दिन काट रहे हैं। अगर मौसम की मार से बच जाएं तो साल-भर मेहनत करके खेत में कुछ उगा लेते हैं। लेकिन, उगाने से भी कौन सा कुछ ठीक हो जाता है, मौसम से तो बचे पर सरकारी मार से नहीं। सरकार हमारी फसल को वाजिब दाम ही नहीं देती है। मेरे पास तीन बच्चे हैं, बेचारे अच्छे खाने के लिए तरसते रहते हैं। मिठाई और लज़ीज़ खाना तो बस उन्हें ब्याह-शादी में ही नसीब हो पाता है। मेरी कोशिश रहती है कि उन्हें अच्छा खाना खिला सकूं, पर करूं भी क्या? ये गरीबी का फंदा गले से निकलता ही नहीं।”

इतना कहकर बसंती के मुंह पर अजीब क़िस्म का सन्नाटा छा गया। उनके गाल हल्के से फूलने लगे, मानों उनके शरीर से कुछ उमड़कर बाहर आ रहा हो। अंदर उमड़ा दु:ख पानी में तब्दील होकर आंखों की कोर के दरवाजों से गालों के रास्ते बहकर जमीन में जा मिला।

किसान की जी- तोड़ मेहनत के पसीने और आंसुओं का जमीन से एक अजीब सा रिश्ता है। रिश्ता हो भी क्यों न। उनके दर्द को सिर्फ जमीन ही अपनी छाती से चिपकाती है, सूबे की सरकारें नहीं।

जब बसंती के आंसू छूटे तो पास बैठीं रामरती खड़ी होकर अपने साड़ी के पल्लू से बसन्ती के आंसू पोछ देती हैं।

रामरती और बसंती एक ही गांव से आई हैं और दोनों ही किसान हैं। बसंती की उम्र कोई 35 के आसपास है, तो रामरती 65 पार कर गई हैं।

बसंती और रामरती

बुढापा दस्तक दे चुका है, फिर भी वह अपने 5 बीघे के खेत में काम करती हैं। रामरती की मुख्य मांग बूढ़े हो गए किसानों को पेंशन दिलाने की है। लगभग रामरती जितनी उम्र के ही उनके पड़ोसी इंदरपाल सिंह भी साथ आए हैं। इंदरपाल के पास भी चार बीघा जमीन थी, जो कर्ज के चलते अब नीलाम हो चुकी है। इंदरपाल की कमाई का एकमात्र साधन वह चार बीघे की खेत ही थी। इंदरपाल जब अपनी कहानी बताना शुरू कर ही रहे थे कि भावुक हो गए। अपने परने से आंसू पोछतें हुए बिना बताए ही भीड़ में मिल गए। इसके बाद रामरती ने गंभीर होते हुए इंदरपाल के बारे में बताया,

“इंदरपाल की हालत हमसे भी ज्यादा खराब है। जमीन नीलाम होने के बाद खुदखुशी कर रहे थे, लेकिन मौके पर गांव वाले पहुंच गए और इन्हें मरने से बचा लिया। अब लोगों से बहुत कम बात करते हैं। बस गुमसुम ही रहते हैं।”

देश में चल रहे कृषि संकट की वजह से पता नहीं कितने ही किसानों ने अपनी जमीनें खोई हैं, अपना पेट पालने के साधन खोए हैं या अपने पशु बेचने पड़े हैं। इनके नुकसान की जड़ें अलग-अलग हैं, पर इन किसानों में जो चीज़ सबको एक बराबर मिला है, वो है कृषि में घाटा और हताशा।

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के आने के बाद किसानों की आत्महत्याओं में 45% का इजाफा हुआ है और कृषि वृद्धि दर 1.9 प्रतिशत घटी है। इसलिए, कृषि में घाटा खाए इन किसानों ने अपनी हक़-हक़ूकों के लिए यह यात्रा 23 सिंतबर को हरद्वार से शुरू हुई थी, जो 2 अक्टूबर को किसान घाट पर खत्म होनी थी।

मगर, इन्होंने जिन्हें दिल्ली चुनकर भेजा था, उन्होंने इन्हें दिल्ली की जमीन पर पैर तक ना रखने दिया।

हुक्मरानों को पहले ही पता था कि किसानघाट तक किसानों के चले जाने के राजनैतिक मायने क्या हो सकते हैं। मुम्बई के किसानों ने वहां जाकर जो हुंकार भरी थी, वो आज भी तख्त पर बैठे नेताओं के कानों से मवाद निकलवा रही है। ऐसे में उत्तर भारत के इन किसानों को दिल्ली के दर्शन भला मुल्क के हुक्मरान क्यों होने देते।

जैसे ही गाजीपुर मंडी के नज़दीक यूपी गेट पर ये किसान पहुंचते हैं, सरकारी तंत्र इनका स्वागत आंसू गैस के गोलों, तेज पानी की बौछारों और लाठियों से करता है। किसान गुस्से में थे, इसी कारण सारे अस्त्र शस्त्रों से लैस सरकार की फौज से खाली हाथ ही भीड़ गए। इस भिड़ंत में कई किसानों को गंभीर चोटें आईं, मगर उनका हौसला पस्त नहीं हुआ। भिड़ंत के बाद यूपी गेट फ्लाईओवर के नीचे ही एक लम्बे-चौड़े ट्रॉली को स्टेज बना लिया गया और उसके सामने किसान बैठ गए। स्टेज जमने के बाद से ही किसानों की इस बैठकी में देश के अलग-अलग जगहों से आए किसानों ने हुंकार भरनी शुरू कर दी।

शाम के तीन बजते-बजते भाजपा के तीन मंत्री किसानों को समझाने वहां पहुंच गए। इन मंत्रियों के आने के बाद किसानों ने नारेबाजी शुरू कर दी। किसान नेताओं ने किसानों को समझाया। इसके बाद भाजपा नेताओं ने बोलना शुरू किया। नेताओं ने अपने भाषण की शुरुआत इस जुमले के साथ की, “किसानों की मांगों को लेकर कमेटी बनाएंगे”। बस फिर क्या था। किसानों की भीड़ से एक चप्पल उछलकर स्टेज की ओर जा गिरा। गनीमत है कि चप्पल मंत्रीजी को नहीं लगी। खैर मंत्री जी लोकतंत्र के दरबार लुटियंस दिल्ली बैरंग ही लौट पड़े।

इस भिड़ंत में घायल होने वाले किसान भी वहां जमे हुए थे। दोपहर के चार बजते हैं। सूरज जरूर नम पड़ रहा है, पर किसानों का जोश नहीं। पुलिस द्वारा दिए गए घावों और फाड़ दिए गए कपड़ों में अभी भी किसान सीना ताने हुए खड़े हैं। अपने फटे कपड़ों में सिर पर सम्मान रूपी परना(छोटी पगड़ी) बांधे मुजफ्फरनगर से आए किसान जयभगवान बाल्यान का कहना था,

“भाईसाब यह पहली सरकार है, जिसने किसान दिल्ली में जाने से रोके हैं। और ये पटाखे से और छुटवा दिए हमारे ऊपर। इन पटाखों से कुछ नहीं होना और ना ही किसान डरने के इन पटाखों से। ये पुलिस वाले माहरे(हमारे) ट्रैक्टरों की हवा निकालगे अर ट्रॉलियों में रखा माहरा(हमारा) सारा समान उठा लेंगे। एक बात बताओ भाईसाब। फरवरी के महीने में गन्ना मील तक पहुंचाया था, अब तक पैमेंट नहीं आई है। किसान अपने हक़ लेन सड़कों पे नहीं आवेंगे तो के घर भूखे मरेंगे। कहाँ गई स्वामीनाथन की रिपोर्ट? कहाँ गए माहरी कमाई दुगनी करने के वादे? कर्ज माफ तो क्या करना था, ये माहरे 10 साल पुराने ट्रैक्टरों को ही तोड़ने के आदेश दे रहे हैं। सारा प्रदूषण जैसे माहरे ट्रैक्टर ही फैला रहे हैं। मोदी में इतना ही दम है तो तोड़के दिखाए इन शहरवाले अमीरों की दस साल पुरानी गाड़ियां। आगे-पीछे बस किसान को लूट लो। ये दोनों (मोदी-योगी) हमारा फद्दु खीँचके(बेवकूफ बनाकर) वोट ले गये। 2019 में काढेंगे इनकी मरोड़।”

अभी भगवान बोलना बंद ही हुआ था कि पास खड़े 70 साल से ज्यादा उम्र के वृद्ध किसान का गुस्सा फूट पड़ा। हाथ में पकड़े हुए लट्ठ को चौकस कर चेहरे पर गुस्सा लाकर कहने लगे,

“हमारे बालकन (बालक) तै हमारे ऊपर ही लठ बरसवा दिए। पहचान ना रहे के (क्या) हम वर्दी में खड़े अपने बालकों को। इस सरकार ने आज बाप-बेटे को लड़वाया है।”

बुजुर्ग ठीक ही कह रहा था, क्योंकि दिल्ली पुलिस के लगभग जवान दिल्ली के आसपास के किसान परिवारों से ही आते हैं, जिन्हें आज अपने किसानों पर ही क्रूर कदम उठाने पड़े।

सोशल मीडिया पर वायरल फ़ोटो, फ़ोटो पत्रकार- रवि चौधरी

प्रदर्शन में ज्यादातर पश्चिमी उत्तरप्रदेश के गन्ना किसान थे। गन्ना किसान सरकार से इसलिए इतने नाराज़ हैं, क्योंकि अब तक 22 हजार करोड़ रुपये गन्ना किसानों का सरकार के यहां बकाया है। आंदोलन की बागडोर राकेश टिकैत और नरेश टिकैत ने संभाल रखी थी, जो भारतीय किसान यूनियन बनाने वाले बाबा महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे हैं।

आंदोलन में आए किसानों के बीच बाबा टिकैत के जयकारे वाले नारे और झंडे रह-रहकर भारतीय किसान यूनियन को मजबूत कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे हर किसान के शरीर में बाबा टिकैत ज़िंदा हो गए हों। बाबा टिकैत की राजनीति जिंदा होने का मतलब है कि जब मन करे दिल्ली आओ और तख्त को उल्टा करके अपने हक़-हकूक की कमाई लेकर गांव वापस चले जाओ।

किसानों को दिनभर दिल्ली के बाहर रोकने के बाद रात को साढ़े बारह बजे किसान घाट जाने दिया गया। किसान घाट पर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के दर्शन कर किसान अपने गावों में वापस लौट गए। लाठीचार्ज और पानी की बोछारों के बीच ये हज़ारों किसान अपने साथ दिल्ली से कुछ ऐसे जख्म लेकर लौटे हैं, जो 2019 में इन सत्ताधारियों को तंग करने वाला है।

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *