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आलोक वर्मा को हटाकर कहीं नरेंद्र मोदी ने ख़ुद को और अपने प्यादों को बचाने का जुगाड़ तो नहीं कर लिया है!

सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच जारी जंग के कारण केंद्र सरकार ने दोनों अधिकारियों से सारे अधिकार वापस ले लिए हैं। एक नज़र में ऐसा लग रहा है कि यह सीबीआई की एक आंतरिक कलह थी और दो बड़े अफसर आपस में एक दूसरे के ऊपर आरोप लगा रहे थे। दोनों आरोपी अफसरों से सारे अधिकार वापस लेकर नरेंद्र मोदी ने सीबीआई के ही जॉइंट डायरेक्टर नागेश्वर राव को अंतरिम डायरेक्टर बनाकर ठीक ही किया है। मगर ऐसा नहीं है। शायद सरकार की शातिर चालों ने इस मामले को इतना धुंधला बना दिया है कि एक आम आदमी के लिए इसके पार सच देख पाना मुश्किल है।

आलोक वर्मा हुए हैं राजनीति के शिकार

आलोक वर्मा को उन पुलिस अधिकारियों में गिना जाता है, जिन्होंने अपनी ईमानदारी से पुलिस सेवा को बेहतर बनाने का काम किया है। आलोक वर्मा की साल 2017 में नरेंद्र मोदी से अनबन तब हुई, जब केंद्र सरकार ने उनकी सिफ़ारिश के बावजूद कई आईपीएस अधिकारियों को सीबीआई की टीम में शामिल नहीं किया। उसी साल अक्टूबर के महीने में गुजरात कैडर के विवादित आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना की नियुक्ति को लेकर भी आलोक वर्मा और नरेंद्र मोदी आमने-सामने थे। स्टर्लिंग बायोटेक मामले में राकेश अस्थाना के खिलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप होने के कारण आलोक वर्मा उनकी नियुक्ति रोकना चाहते थे। राकेश अस्थाना पर आरोप था कि उन्होंने इस कंपनी से 3.88 करोड़ रुपये लिए हैं। ऐसा कंपनी में छापेमारी के दौरान मिली एक डायरी में लिखा हुआ था।

स्पेशल डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए सीबीआई के डायरेक्टर की राय लेना जरूरी है। मगर, सीबीआई डायरेक्टर की एक न चली और राकेश अस्थाना को सीबीआई का स्पेशल डायरेक्टर बना दिया गया। सीबीआई के डायरेक्टर के विरोध के बावजूद भी अस्थाना की नियुक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के करीबी होने की वज़ह से हुई थी।

अभी हाल ही में मामले ने तूल तब पकड़ी जब हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में मीट कारोबारी मोईन क़ुरैशी को क्लीनचिट देने के लिए घूस लेने के आरोप में सीबीआई ने राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई। इसके साथ सीबीआई ने खुद के ही दफ़्तर में छापा मारकर अस्थाना के साथी डीएसपी देवेंद्र कुमार को गिरफ़्तार किया।

अस्थाना ने अपने ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज होने के बाद आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ सीवीसी में कथित भ्रष्टाचार के 10 मामले दर्ज कराए हैं। अस्थाना के द्वारा आलोक वर्मा पर आरोप लगाते ही केंद्र सरकार ने अस्थाना और आलोक वर्मा दोनों को ही छुट्टी पर भेज दिया और सीबीआई के जॉइंट डायरेक्टर एम नागेश्वर राव को तत्काल प्रभाव से सीबीआई का अंतरिम डायरेक्टर बना दिया। राकेश अस्थाना की तरह नागेश्वर राव को भी नरेंद्र मोदी के चहेते अफसरों में से एक माना जाता है। शायद इसीलिए नागेश्वर ने अंतरिम डायरेक्टर बनते ही भ्रष्टाचार के मामले में अस्थाना के ख़िलाफ जांच कर रहे 13 अफ़सरों का तबादला कर दिया है।

अस्थाना के खिलाफ जांच कर रहे सभी अधिकारियों का ट्रांसफर करना इस बात की तरफ भी इशारा करता है कि नागेश्वर राव और केंद्र सरकार राकेश अस्थाना को बचाना चाह रही है। आलोक वर्मा को हटाने का कोई तुक नहीं बनता था। इसलिए उन्होंने इस आदेश के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और केंद्र सरकार के आदेश को चुनौती दी है। उनकी चुनौती को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है और 26 अक्टूबर को सुनवाई की बात कही है। आलोक वर्मा को हटाए जाने को लेकर सीनियर वकील प्रशांत भूषण ने दावा किया है कि राफेल की आग से बचने के लिए सरकार ने आलोक वर्मा को हटाया है और उन्हें ग़लत तरीके से हटाया गया है। सुप्रीम कोर्ट के नियम के अनुसार सीबीआई डायरेक्टर का टर्म दो साल का फिक्स है और सिर्फ सेलेक्शन कमेटी ही उसे हटा सकती है। इसे लेकर आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है,जिसपर शुक्रवार को सुनवाई होनी है।

इस मामले में एक नया खुलासा करते हुए प्रशांत भूषण ने कहा है कि राफ़ेल डील की जांच सीबीआई न करे, इसलिए शायद सीबीआई डायरेक्टर को हटाया गया है। उनकी, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी की मुलाकात आलोक वर्मा से हुई तो उन्होंने राफ़ेल विमान डील से जुड़ी शिकायतों पर गौर फ़रमाया था। शायद वो इस मामले में एफ़आईआर दर्ज करके जांच शुरू करते। राफ़ेल मामले में उनसे हुई मुलाकात के बाद हल्ला भी मचाया गया और उनपर सवाल खड़े करते हुए कहा गया कि आलोक वर्मा ने इन लोगों से मुलाकात क्यों की? इनकी शिकायतें क्यों सुनीं? यह बिल्कुल साफ है कि सरकार राफ़ेल डील को लेकर कोई भी जांच नहीं करवाना चाहती। आलोक वर्मा ने राफ़ेल डील वाले मामले को हाथ लगाकर नरेंद्र मोदी से खतरा मोल तो लिया है। शायद उन्होंने वही किया है जो एक ईमानदार अफ़सर का काम है।

आलोक वर्मा को इस तरह हटा देने से केंद्र सरकार अपने दो मंसूबों में कामयाब होती दिख रही है। पहला यह कि राफेल डील की जांच नहीं होगी और नरेंद्र मोदी का खास अफसर राकेश अस्थाना भी जांच से बच जाएगा।

दूध के धुले नहीं हैं नागेश्वर राव

नागेश्वर राव के ख़िलाफ़ भी कई गंभीर आरोप लगे हैं। सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा ने कुछ महीने पहले उनके ख़िलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश की थी। इतना ही नहीं आलोक वर्मा ने उन्हें हटाने की सिफारिश भी की थी, लेकिन यहां भी उनकी दाल न गली। नागेश्वर राव की गिनती भी मोदी के करीबी अफ़सरों में की जाती है। उनके अंतरिम डायरेक्टर बनते ही 13 उन अफसरों का तबादला कर दिया जाता है, जो राकेश अस्थाना द्वारा घुस लेने वाले मामले की जांच कर रहे थे।

अब बेशक हमारी सरकार और गोदी मीडिया दोनों मिलकर इस मामले को सीबीआई की आंतरिक कलह घोषित करने में तुले हों। लेकिन, यह सारा मामला राफ़ेल डील से लेकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अपनी अंदरखाने की राजनीति और अपने प्यादों को बचाने का खेल है।

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