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कर्नाटक चुनाव में जातीय समीकरण हावी, महिलाएं एक बार फिर हाशिये पर

कर्नाटक चुनाव के परिणामों को दलीय राजनीति के साथ-साथ अगर लैंगिक और जातीय तराजू पर तोलकर देखें तो जातीय पलड़ा भारी और महिलाओं का पलड़ा खाली पड़ा नज़र आता है. परंपरागत रूप से प्रमुख राजनीतिक दलों में प्रतिनिधित्व करते आए लिंगायत और वोक्कालिगा इस बार भी मजबूत स्थिति में है लेकिन महिलाएं पिछले चुनाव की तुलना में इस बार भी हाशिये पर ही हैं. इस बार सिर्फ 6 महिला विधायकों को ही विधानसभा जाने का मौका मिला है. महिलाओं की यह संख्या 2013 के चुनाव परिणाम के मुकाबले बिल्कुल नहीं बदली है.

क्या है कर्नाटक की नई विधानसभा के जातीय समीकरण

कर्नाटक की जातीय राजनीति में दो समुदाय लिंगायत और वोक्कालिगा हमेशा ही महत्वपूर्ण रहे हैं. उत्तर कर्नाटक में लिंगायत और दक्षिण कर्नाटक में वोक्कालिगा समुदाय पारंपरिक रूप से सभी प्रमुख दलों से प्रतिनिधित्व पाते हैं. जो राजनीति पर इनके जातीय कब्जे को मजबूत करता है.

इसमें कोई दोहराई नहीं है कि इस बार चुनाव जातीय समीकरणों के कारण पहले से ज्यादा पेचीदा रहा. इस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों ने परंपरागत रूप से दो प्रमुख जातियों को ज्यादा तव्वजो दी जिसके चलते पहले की तुलना में इस बार ध्रुवीकरण की राजनीति ने ज्यादा पैर पसारे.

लिंगायत जाति के 2013 के चुनाव में सिर्फ 24% ही विधायक थे, यह 1994 के 35% के मुकाबले कम था. भाजपा ने अलग रणनीति अपनाते हुए वोक्कालिगों के गढ़ माने जाने वाले दक्षिण और तटीय कर्नाटक में लिंगायत उम्मीदवारों को मैदान में उतारा. ऐसा कहा जा रहा है कि दक्षिण और तटीय कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के वोक्कलिगा उम्मीदवारों के बीच वोटों के विभाजन को ध्यान में रखकर ज्यादा लिंगायत उम्मीदवारों को उतारना भाजपा की रणनीति का एक हिस्सा था, जो सफल भी हुआ. जिसके कारण लिंगायतों की विधानसभा में प्रतिनिधित्व 24% से बढ़कर 28% हो गया है.

वोक्कालिगा जाति का प्रतिनिधित्व स्थिर ही रहा है. मध्य कर्नाटक जहाँ 2013 के चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का कब्ज़ा था,वहां भाजपा ने वोक्कालिगा जाति के उमीदवारों को उतारा है.

ओबीसी जातियों का प्रतिनिधित्व हाल के वर्षों में बढ़ा है. इसमें विशेष रूप से पूर्व मुख्यमंत्रीसिद्धारमैया की कुरुबा जाति ने अच्छी-खासी बढोतरी हासिल की है. भाजपा ने दक्षिण कर्नाटक में कम प्रभावशाली ओबीसी उम्मीदवारों को वरीयता दी. शायद इस फैसले के चलते ही उन्हें ज्यादा सीटें जितने में मदद भी मिली है.

 क्या हैं तीनों पार्टियों के विधायकों के जातीय समीकरण

अगर इस जातीय ध्रुवीकरण को पार्टियों के हिसाब से तोड़कर देखें तो करीब 65% लिंगायत विधायक और 20% वोक्कालिगा विधायक भाजपा के पास हैं. इसके अलावा भाजपा के पास इस बार 18 ओबीसी विधायक हैं. जबकि 2013 में भाजपा के पास सिर्फ 5 ओबीसी विधायक थे.

कांग्रेस ने उन क्षेत्रों में लिंगायत और वोक्कलिगों(पार्टी संबद्धता के बावजूद) को टिकट वितरित किए जहां उन्हें 2013 में निर्वाचित किया गया था. कांग्रेस और जेडीएस दोनों के पास करीब 35% लिंगायत और 80% वोक्कालिगा विधायक हैं. इससे एक बात तो साफ़ हो जाती है कि सिद्दारमैया की लिंगायतों को अलग से प्रतिनिधित्व देने वाली रणनीति सफल नहीं हो पाई है.

कर्नाटक की जातीय भौगोलिक राजनीति में भी नहीं दिखा कोई ख़ास बदलाव

कर्नाटक में पार्टियों का प्रतिनिधित्व तो बदलता रहा है लेकिन जातीय भौगोलिक राजनीति में 2013 के मुकाबले 2018 में कोई ख़ास बदलाव देखने को नहीं मिला.

इस बार लिंगायतों ने मध्य कर्नाटक में अपना दबदबा बनाया है, लिंगायत उत्तर कर्नाटक में हमेशा से ही बने रहे हैं.

वोक्कालिगा और कम प्रभावशाली ओबीसी जातियां इस बार भी दक्षिण और तटीय कर्नाटक के हिस्सों में ही बने हुए हैं.

क्या है नए और पुराने विधायकों का समीकरण

नई विधानसभा को अनुभवी और नए चुनकर आए विधायकों में बांटकर देखा जाए तो करीब 82 ऐसे विधायक हैं जो पहली बार विधानसभा आए हैं, जिसमें सबसे ज्यादा 36 भाजपा के हैं, उसके बाद कांग्रेस के पास 27 और जेडीएस के पास 14 हैं. इस बार नए चुने गए विधायक 36% ही हैं, जो भारतीय मानकों से ज्यादा नहीं हैं.

इस चुनाव में 182 मौजूदा विधायकों को दोबारा टिकट मिली थी, जिसमें सिर्फ 87 ही अपनी सीट दोबारा बचा पाए हैं. कांग्रेस ने लगभग आधे विधायकों को दोबारा टिकट दी थी, जिसमें सिर्फ 45 अपनी सीट बचा पाए. भाजपा के 47 में से 30 विधायक दोबारा जीते हैं. वहीं जेडीएस के सिर्फ 12 मौजूदा विधायक ही जीत दर्ज कर पाए हैं, जबकि 25 नए विधायक जीतकर आए हैं.

किसने किसके किले में लगाई सेंध

इस बार कांग्रेस ने अपनी 48 सीट, भाजपा 27 और जेडीएस 17 सीटें दोबारा जीती हैं, इसका मतलब है कि 129 सीटों पर बदलाव देखने को मिलें हैं. भाजपा ने कांग्रेस की 58 और जेडीएस की 10 सीटों पर कब्ज़ा किया है. इसके उलट कांग्रेस भाजपा की 9 सीटों पर ही कब्ज़ा कर पाई है, पर कांग्रेस ने जेडीएस की 13 सीटों को कब्जाकर उन्हें ज्यादा नुक्सान पहुंचाया है. भाजपा ने बहुत सारी नई सीटों पर कब्ज़ा किया है, लेकिन कई गंवाई भी हैं.

क्या हुआ दल बदलने वाले नेताओं का

इस चुनाव में 87 उम्मीदवारों ने दल बदलकर चुनाव लड़ा है, जिनमें 23 मौजूदा विधायक और 31 पूर्व विधायक शामिल हैं. इनमें सिर्फ 6 नेताओं ने चुनाव लड़ने के लिए भाजपा का साथ छोड़ा है. कांग्रेस के 14 नेताओं ने भी दूसरी जगह भाग्य आजमाने के लिए पार्टी छोड़ी है, जिनमें 7 को भाजपा से टिकट मिला लेकिन सिर्फ 3 को जीत और जेडीएस की टिकट से लड़ने वाले 5 पूर्व कांग्रेसियों में से सिर्फ एक को जीत मिली है.

सबसे ज्यादा 23 जेडीएस के नेता छोड़कर भागे हैं. भाजपा की टिकट से लड़ने वाले जेडीएस के 13 बागी विधायकों में सिर्फ 6 और कांग्रेस से लड़ने वाले 9 बागियों में से सिर्फ 3 में जीत मिली है.

प्रतिशत के हिसाब से केवल 36 % ही बागी विधायकों को जीत हासिल हुई है. हालांकि ये आकड़ें राष्ट्रीय औसत से काफी कम मालुम होते हैं. गुजरात और उत्तर प्रदेश के 60 % के आकड़ें के मुकाबले 36% का ये आंकड़ा काफी कम है.

कर्नाटक विधानसभा में महिलाओं के प्रतिनिधत्व की क्या स्थिति है

विधानसभा में महिलाओं संख्या इस बार भी नहीं बदली है. 208 महिला उम्मीदवारों में सिर्फ 6 महिलाएं ही जीतकर विधानसभा जा रही हैं. 1990 के बाद राज्य में यह संख्या स्थिर है.

भाजपा की 29 महिला उम्मीदवारों में 3 महिला विधायक, हिरीयुर से के. पूर्णिमा,करवार से रूपाली नाइक और निप्पानी विधानसभा से शशिकला अन्नासाहेब जोले ने जीत दर्ज की है.

कांग्रेस से भी 3 ही महिला विधायक, बेलगाम से लक्ष्मी हेबबाल्कर, खानपुर से अंजली निंबालकर और कोलार गोल्ड से रूपकला एम जीती हैं. लेकिन जेडीएस की महिला उम्मीदवारों को तीसरे स्थान से ही संतोष करना पड़ा है.

कर्नाटक सिर्फ 2.7% महिला विधायकों के साथ देश में महिला प्रतिनिधित्व के मामले में सबसे कम संख्या वाले राज्यों में से एक है.

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