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कांचा इलैया आर्थिक-सामाजिक न्याय की ऐसी आवाज़ हैं जिसे दबाना नामुमकिन है!

25 तारीख को इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर पढ़ी तो पता चला कि भारत के मशहूर चिंतक-लेखक कांचा इलैया की तीन किताबों को दिल्ली यूनिवर्सिटी में एमए राजनीतिक विज्ञान के सिलेबस की रीडिंग लिस्ट से हटाने की तैयारी चल रही है। अभी हाल ही में हुई ‘दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टैंडिंग कमेटी ऑन अकैडमिक मैटर्स’ की एक बैठक में एमए के सिलेबस की समीक्षा के दौरान यह सुझाव कमेटी के सदस्यों ने दिया है।

कई दूसरी ख़बरें पढ़कर मालूम हुआ कि इस कमेटी के सदस्यों को लगता है कि उनकी किताबें यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लायक नहीं हैं क्योंकि उनमें रिसर्च की कमी है, आंकड़ों की कमी है, तथ्यों की कमी है, किताबों का कंटेंट समाज को बांटने वाला है, इत्यादि। इतना ही नहीं एक सदस्य का तो कहना है कि किताबों में कांचा इलैया का नज़रिया ज़्यादा है, इसलिए किताब सही नहीं हैं।

ख़बर पढ़ते ही मुझे कांचा इलैया के साथ हुई मेरी मुलाकातों और बातचीत का ध्यान आया। इस साल अप्रैल में जब मेरी कांचा से मुलाक़ात हुई थी तो मैंने उन्हें बताया था कि मेरे कई मित्र जिन्होंने आपकी किताबें पढ़ी हैं वो आपकी किताबों का मज़ाक बनाते रहते हैं।

मेरी बात सुनकर वह हंसने लगे और तपाक से सवाल दाग दिया, “क्या तुम मेरी किताबों का मज़ाक बनाते हो?” मैंने तुरंत मना कर दिया। मेरे मना करते ही उन्होंने फिर से सवाल किया, “तुम क्यों मज़ाक नहीं बनाते?”
मैंने थोड़ी हड़बड़ाहट के साथ उनकी किताब why I am not hindu का थोड़ा सा जिक्र करते हुए कहा, “मैं गांव से हूँ और मैंने दलितों और पिछड़ों की मेहनत पर ब्राह्मण-बनिया लॉबी को राज़ करते हुए देखा है। कभी धर्म के नाम पर कभी वेदों, पुराणों के नाम पर। इसलिए मैंने आपकी किताब का कभी मज़ाक नहीं बनाया।”

मेरा जवाब सुनकर उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम कौन सी भाषा में लिखते हो? मेरे मुंह से हिंदी निकला ही था कि उन्होंने गंभीर मुद्रा में आकर कहा, “अंग्रेज़ी में भी लिखा करो। बहुत कम पिछड़े और दलित अंग्रेज़ी में लिखते हैं। इसका कारण है कि ब्राह्मण-बनिया इंटेलेक्चुअल लॉबी ने बड़ी चालाकी से पिछड़े, दलित और आदिवासियों को क्षेत्रीय भाषाओं में समेटकर रख दिया है और खुद अंग्रेज़ी मीडियम की पढ़ाई करके ज्ञान पर कब्ज़ा जमाए बैठे हैं। दुनिया के अच्छे से अच्छे विचार अंग्रेज़ी में लिखे-पढ़े जा रहे हैं और अगर अंग्रेज़ी से परहेज़ किया तो पीछे छूट जाओगे।

मुझसे इतना कहकर और मुझे एक थपकी लगाकर कांचा वहां से चले गए।

इस मुलाक़ात के लगभग एक महीने बाद ही कांचा से मेरी दूसरी मुलाकात हुई। शाम के वक़्त कांचा गेस्ट हाउस के कमरे में बैठे थे। मैंने उन्हें अपनी पिछली मुलाक़ात का जिक्र किया तो उन्होंने बड़े उत्साह से बोलना शुरू किया,
“आज मैं अशोका यूनिवर्सिटी के किसी कार्यक्रम में बतौर स्पीकर शामिल हुआ था। करीब 200 छात्रों की भीड़ थी। अपनी बात शुरू करने से पहले मैंने वहां मौजूद छात्रों से पूछा कि आप लोगों में से जाट कितने हैं। मेरा सवाल सुनकर सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे। बहुत देर बाद सिर्फ एक लड़की ने डरते-डरते हाथ उठाया। जबकि यह यूनिवर्सिटी जाटों की जमीन पर है। इसके आसपास जाटों की बहुलता है। फिर भी वहां तक सिर्फ एक लड़की पहुंची। ऐसा नहीं है कि जाटों के बच्चे पढ़ते नहीं हैं। पढ़ते हैं पर निचले स्तर के स्कूल या कॉलेजों में। बड़े बड़े शिक्षण संस्थानों तक नहीं पहुंच पाते। मैं तुम्हें यह इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि अब पिछड़ी और दलित जातियों को भी उच्च शिक्षा और अंग्रेज़ी शिक्षा में अपनी भागेदारी बढ़ाने की जरूरत है।”

कुछ देर बाद रुकने के बाद उन्होंने बताया कि वे आजकल पिछड़ी जातियों की अंग्रेज़ी माध्यम की उच्च शिक्षा में हिस्सेदारी पर कुछ काम कर रहे हैं।

उनकी किताबें हटाए जाने की खबर जब पढ़ रहा था तो मेरे दिमाग में उनकी बताई हुई एक बात और ध्यान आ रही थी। उन्होंने मई में हुई हमारी मुलाकात में बताया था, “हाशिये पर रहे लोगों के बारे में ये लोग न लिखना चाहते हैं और न ही पढ़ना। अगर हम खुद हमारे बारे में लिखें तो हमारी किताबों पर इन्हें आपत्तियां होती हैं। मैं आंबेडकर, फुले की सोच को आगे बढ़ाने के लिए लगातार लिखता रहता हूँ और तुम नौजवान भी लिखा करो ताकि पिछड़े, दलित और आदिवासी समाज के लोग भी ज्ञान के क्षेत्र में अपनी जगह बना सकें”

उनकी किताबों को हटाने की बात हो रही है तो एक जरूरी सवाल यह बनता है कि क्या फुले और आंबेडकर के विचारों को आगे बढ़ाने वाले लेखकों के साथ ऐसा क्यों और किसके इशारे पर किया जा रहा है। पश्चिमी देशों की यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई जाने वाली उनकी किताबों के खिलाफ भी कुछ लोग वहां गए थे लेकिन उनकी अपील को खारिज कर दिया गया।

उनकी किताबें बीजेपी और आरएसएस की सोच को चुनौती देता हैं शायद इसलिए ही सरकार के इशारे पर इतना सब हो रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारी यूनिवर्सिटियों में मौजूद सत्तापक्ष के लोग सत्ता की मदद से असरदार और अच्छे दलित विद्वानों को बाहर करने पर तुले हैं। उनकी लेखनी द्वारा उठाए गए प्रश्न सत्तापक्ष को असहज महसूस करवा रहे हैं। शायद वे अपनी जाति के विशेष अधिकारों को खोना नहीं चाहते हैं और इसलिए सामाजिक एकता की आवाज़ उठाने वाले दलित विद्वानों और छात्रों को अब बाहर करने में लगे हुए हैं। बेशक यूनिवर्सिटी कांचा की किताबों को बाहर कर दे, लेकिन उनके द्वारा उठाए गए सामाजिक और आर्थिक न्याय के सवाल नया इतिहास लिखने के लिए हमारे समाज में चिंगारी पैदा कर चुके हैं।

1 COMMENTS

  1. Kanha ilaya is great writer his books has been made a storm against manuwadi writing and dalit writer has been waken up and now they are not going to sleep

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