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कारगिल में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ने वाले इस सैनिक को देश से बाहर कर दिया जाएगा?

तारीख 7 दिसंबर. साल था 1979. भारतीय सेना की 122 रेज़िमेंट में असम के मोरीगांव जिले का एक नौजवान भर्ती होता है. 1999 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुई कारगिल की लड़ाई का हिस्सा बनता है. लड़ाई में विजयी भारतीय फ़ौज का हिस्सा होने पर खूब गर्व महसूस करता है. फ़ौज में 32 साल से ज़्यादा सेवा देकर वो 2012 में रिटायर होता है और वापस अपने घर मोरीगांव में जाकर रहने लगता है. लेकिन इस सैनिक और इसके परिवार को हैरानी तब होती है, जब तीन दशक से भी ज्यादा समय तक फ़ौज में रहकर देश की सेवा करने के बावजूद उनका नाम NRC ड्राफ्ट में नहीं आता है. इस फौजी का नाम है बीर बहादुर थापा.

विजय पताका फहराने वाला आज खुद हार गया

लेफ्टिनेंट बीर बहादुर थापा जब भी 1999 के कारगिल की लड़ाई को याद करते हैं, तो उनका गला रुंध जाता है. लड़ाई में अपने दोस्तों को खोना उनके लिए बहुत दर्दनाक था. वे पाकिस्तानी सेना पर बोफोर्स बंदूकों की गोलीबारी के लिए प्लेसमेंट, रेंज और दूसरी ज़रूरी जानकारियां देने वाली टीम का हिस्सा थे. पुरानी यादें ताज़ा करते हुए बीर बहादुर बताते हैं,

“मैं 7 दिसंबर 1979 को फ़ौज में भर्ती हुआ था और साढ़े बत्तीस साल फ़ौज में सेवा देने के बाद रिटायर हुआ. जब मैं वापस आया, तो NRC की प्रक्रिया शुरू हुई थी, जिसके बाद मैंने और मेरे परिवार ने फ़ौज सहित सारे ज़रूरी कागज़ात भी NRC के आवेदन के लिए दिए थे. लेकिन अभी हाल ही में आई NRCकी दूसरी लिस्ट में मेरे दो बच्चों और पत्नी का नाम नहीं आया है. 2012 में असम वापस आने के बाद से ही मैं अपने जिले मोरीगांव में लगातार काम कर रहा हूं, ताकि उन गोरखा लोगों की मदद कर सकूं, जिन्हें सेना में जाने का मौका नहीं मिला.”

NRC को अपडेट करने का काम मई 2015 से शुरू हुआ था.
NRC को अपडेट करने का काम मई 2015 से शुरू हुआ था.

1945 से रह रहे लोगों का नाम भी नहीं है लिस्ट में

सूबे में रहने वाले वो गोरखा, जिन्होंने अलग-अलग मौकों पर देश की सेवा की है, वो खुद पर गर्व महसूस करते हैं. कुछ लोग बीर बहादुर जैसे हैं, जो जंग का हिस्सा भी रहे. लेकिन आज ये लोग सिस्टम से मजबूर हैं और हारते दिख रहे हैं. हर तरह की मेहनत और निष्ठा के बावजूद NRC के पहले दो ड्राफ्ट्स में उनका नाम नहीं आया है. कारगिल लड़ाई को याद करते हुए बीर बहादुर बताते हैं,

“एक फौजी के रूप में हमने कारगिल की लड़ाई में देश की हिफाज़त की है. लड़ाई जीतने के लिए बोफोर्स बंदूकों और दूसरे तोपखानों को हमारी सेना तक पहुंचाने के लिए मैं पूरे इलाके का सर्वेक्षण करता था. अपनी जान जोखिम में डालकर देश के लिए लड़ने, कारगिल की लड़ाई जीतने और फिर सभी सेना के कागज़ात जमा करवाने के बावजूद भी NRC की लिस्ट में हमारा नाम नहीं है.”

बीर बहादुर बताते हैं कि 1945 से ही यहां बहुत सारे गोरखा और नेपाली लगातार रहते आए हैं, लेकिन ऐसे ढेर सारे लोगों के नाम लिस्ट में शामिल नहीं किए गए हैं. NRC लिस्ट के मसौदे में असम के एक लाख से ज़्यादा गोरखाओं के नाम नहीं हैं. कई परिवार ऐसे हैं, जिनका कोई न कोई सदस्य दो-तीन दशक तक सेना का हिस्सा रहा, लेकिन उनका नाम भी लिस्ट में नहीं है.

कई परिवारों में एक जने का नाम ही है लिस्ट में

असम में कई परिवार ऐसे भी हैं, जिनके सिर्फ एक ही सदस्य का नाम लिस्ट में शामिल किया गया है. बचे हुए सदस्यों को 10 अगस्त को आने वाली अगली लिस्ट का इंतज़ार है. ऐसी ही स्थिति में फंसे लोकनाथ दहल बताते हैं,

“एक लाख से ज़्यादा गोरखा लोगों को NRC लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है. उनमें से ज़्यादातर ने 1948 के कागज़ात भी दिए हैं, लेकिन फिर भी उनके नाम शामिल नहीं किए गए. यहां तक कि मेरे परिवार में केवल एक जने का नाम लिस्ट में है. बाकी हम सभी इंतजार कर रहे हैं.”

NRC की लिस्ट में नाम न आने के कारण असम के 40 लाख लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. लिस्ट में अपना नाम न आने के कारण चिंतित पित्तम्बर शर्मा भावुक होकर कहते हैं,

“हम भारतीय हैं और हम अपने देश से प्यार करते हैं. मुझे यकीन है कि हमें इंसाफ मिलेगा और जल्द ही हमारे नाम लिस्ट में शामिल किए जाएंगे. मेरे परिवार के लोगों को अभी तक इस लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है.”

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह.
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह.

NRC मसौदा आने के बाद से ये सवाल मुंह बाए खड़ा है कि इन 40 लाख लोगों का होगा क्या! इस मामले पर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि यह सिर्फ एक ड्राफ्ट सूची है और यह फाइनल लिस्ट नहीं है. अगर किसी का नाम फाइनल लिस्ट में भी नहीं आता है, तो वो विदेशी कोर्ट में जा सकता है. किसी के खिलाफ कोई ज़बर्दस्ती नहीं होगी और न ही कोई सज़ा होगी. कुछ लोग बेवजह डर का माहौल बना रहे हैं. यह रिपोर्ट निष्पक्ष है. इसके खिलाफ अफवाह नहीं फैलाई जानी चाहिए.

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