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गंगा के लिए 121 दिन से आमरण अनशन पर बैठे संत गोपालदास को भी सरकार ने फुटबॉल बना दिया है!

तारीख 24 जून, साल 2018। 36 साल का एक संत उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम पर गंगा नदी की तलहटी में खनन के ख़िलाफ़ और गंगा की सफ़ाई के लिए आमरण अनशन पर बैठ जाता है। संत के गुरु प्रोफेसर जी डी अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद उनसे दो दिन पहले यानी 22 जून को ऋषिकेश से अपना अनशन शुरू करते हैं। दोनों ही संतों की मांगों में समानता थी। दोनों गंगा में हो रहे अवैध खनन, बांधों जैसे बड़े निर्माण को रोकने और उसकी सफ़ाई को लेकर आमरण अनशन पर थे। मामला देश के प्रधानसेवक के पास भी भेजा जाता है। स्वामी सानंद उनको तीन खत लिखते हैं, लेकिन एक भी खत का जवाब नहीं आता।

सरकार की अनदेखी की वजह से गंगापुत्र जी डी अग्रवाल 11 अक्टूबर को प्राण त्याग देते हैं। उनकी मौत के बाद देश के मीडिया ने थोड़ी-बहुत कवरेज भी दी, लेकिन कुछ दिनों बाद ही सबकुछ भुला दिया जाता है। प्रोफेसर जी डी अग्रवाल की मौत के बाद वह दूसरा नौजवान संत ऋषिकेश में उनके आश्रम मातृसदन चला जाता है और वहां अपना आमरण अनशन जारी रखता है। मातृसदन आश्रम में वह संत प्रेस कांफ्रेंस कर ऋषिकेश के एम्स अस्पताल के डॉक्टरों पर सवाल खड़े करते वहां कुछ सबूत पेश करता है और कहता है कि स्वामी सानंद की मौत प्राकृतिक नहीं थी। प्रेस कांफ्रेंस के बाद से ही पुलिस उस संत को भी जबरन वहां से उठाकर अस्पतालों में घुमाने लग जाती है। अपने बयान के बाद सरकार के निशाने पर आए और 121 दिन से आमरण अनशन कर रहे इस संत का नाम है गोपाल दास।

121 दिन से आमरण अनशन कर रहे इस संत का नाम है गोपाल दास।

 

अब कहाँ है संत गोपालदास?

प्रेस कांफ्रेंस करने के बाद ही संत गोपालदास सरकार के निशाने पर आ जाते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस के अगले दिन यानी 17 अक्टूबर को पुलिस आश्रम पहुंच जाती है और उन्हें जबरन वहां से उठाकर ऋषिकेश के एम्स में भर्ती कर दिया जाता है। जब पुलिस उन्हें उठाने के लिए वहां पहुंची तो संत आश्रम के अंदर एक कमरे में बंद होकर अपनी नस काटकर खून से एक चार्ट पर लिखते हैं, “मुझे चाहिए अलोकतांत्रिक और अमानवीय ख़ौफ़ से आज़ादी”

अस्पताल में गोपाल दास।

जबरन ऋषिकेश एम्स में भर्ती करवाए जाने की ख़बर के बाद ही मीडिया के लोग एम्स पहुंचने लगते हैं, जिनसे संत अपनी बातचीत में एम्स के डॉक्टरों के प्रपंचों का जिक्र करते हैं जो उनके ख़िलाफ़ वहां के डॉक्टर रच रहे हैं। अपने ऊपर तलवार लटकती देख एम्स के डॉक्टरों ने संत गोपालदास को 18 अक्टूबर की रात को जबरन एम्स ऋषिकेश से चंडीगढ़ पीजीआई भेज दिया। पीजीआई पहुंचाए गए संत गोपालदास एलोपैथिक ट्रीटमेंट लेने से मना कर देते हैं। वह लगातार इस बात पर अड़े रहते हैं कि सरकार को अगर जरूरी लगे तो यूनानी चिकित्सा या आयुर्वेद से मेडिकल मदद कर सकती है।

पीजीआई की मेडिकल टीम ने संत को दिल्ली एम्स में भर्ती करने के लिए भी कहा। लेकिन, मीडिया और विपक्ष के डर से पीजीआई के निदेशक ने ऐसा करने से मना कर दिया। चंडीगढ़ प्रशासन ने संत के साथ आए उनके सहयोगियों को अस्पताल से बाहर निकाल दिया और उनको जबरन फीडिंग शुरू कर दी। जबरन फीडिंग के लिए नाक में ठूंसी गई नली को जब संत ने निकाल कर बाहर फेंक दिया तो उनके दोनों हाथ बांध दिये गए और ज़बरन फीडिंग चालू कराई गई। उनके साथ हो रही इस जबरदस्ती और अमानवीय व्यवहार का विरोध करते हुए संत गोपालदास ने हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस को पत्र लिखा है। अपने पत्र के जरिए उन्होंने आंदोलनकारियों के साथ हो रही बर्बरता पर ध्यान देने की अपील की है। चिकित्सा के नाम पर मानसिक प्रताड़ना झेल रहे संत गोपालदास ने पत्र में लिखा है, “हम कोई फ़ुटबॉल नहीं हैं, जब चाहा जहां धकेल दिया।”

अमानवीय व्यवहार का विरोध करते हुए संत गोपालदास ने हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस को पत्र लिखा है।

 

आज शाम को उनके सहयोगी राहुल दादू ने न्यूज़सेंट्रल24×7 को बातचीत में बताया,”संत गोपालदास को दोबारा ऋषिकेश भेजने का प्लान बनाया जा रहा है। सरकार उनकी मांगों को मानने की बजाय लगातार इधर से उधर पटक रही है। गंगा के नाम पर वोट लेने वाले लोग आज गंगा पुत्रों को मारने में जुटे हुए हैं।”

मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक नमामि गंगा प्रोजेक्ट है। द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक नमामी गंगे प्रोजेक्ट को तीन साल पहले शुरू किया गया था। लेकिन, आज तक सीवेज प्रोजेक्ट के लिए दिये गए बजट का सिर्फ 3.32 फीसदी ही खर्च किया गया है।

गंगा की सफाई के लिए आंदोलन करने वालों को अब तक मौत ही नसीब हुई है। स्वामी सानंद की मौत को अभी दस दिन भी नहीं बीते हैं और संत गोपाल दास के साथ भी वैसा ही व्यवहार हो रहा है। ऐसे में गंगा को लेकर सरकार का रवैया साफ नज़र आता है। भाजपा को सिर्फ वोट चाहिए पर्यावरण नहीं।

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