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राजनीति रिपोर्ट

चौटाला परिवार को तोड़ने की साज़िशों का कच्चा-चिट्ठा

जाटड़ा अर काटड़ा, अपना नै ए मारया करै‘. इस कहावत का मतलब है, ‘अपनों में फूट पड़ना‘. इसका इस्तेमाल सिंधु घाटी सभ्यता के किसानी कबीले के लोग अपने कुनबे(परिवार) के टूटने के दौरान अक्सर करते आए हैं। इस कहावत का एक ढूंगा(गहरा) मतलब यह भी है कि हम किसान आपस में लड़ते हैं बाहर नहीं।
आज हरियाणा का एक राजनैतिक परिवार जब टूट रहा है तो विपक्षी दल खुश नज़र आ रहे हैं क्योंकि उन्हें इससे फायदा होगा. नुकसान उस टूटने वाले परिवार को तो निश्चित रूप से होगा ही, लेकिन एक छुपा हुआ नुकसान भी है जो अभी दिखाई नहीं दे रहा है।
ख़ैर, परिवार टूटते ही हैं कभी अर्थ की वजह से तो कभी सत्ता की वजह से। पिछले कई दिनों से हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री रहे ओमप्रकाश चौटाला का परिवार चर्चा का विषय बना हुआ है। ओमप्रकाश चौटाला वो शख्स हैं जिन्होंने एक लंबे वक़्त किसानों की राजनीति की है और जो किसानों को सत्ता में लाए हैं। चौटाला 2004 के बाद सत्ता से बाहर रहे। लंबे समय से सत्ता से बाहर ही नहीं बल्कि जेबीटी शिक्षक घोटाले में दोषी पाए जाने पर जेल में भी हैं। 2013 में जब चौटाला को जेल हुई तो राजनैतिक पंडितों को लग रहा था कि उनके जेल में जाने के बाद उनका राजनैतिक परिवार यानी इनेलो (इंडियन नेशनल लोकदल) बिखर जाएगा। लेकिन राजनैतिक पंडित गलत साबित हुए और उनके राजनैतिक परिवार के कार्यकर्ताओं ने जी तोड़ मेहनत कर इनेलो पार्टी को बचाए रखा।
अब जब इनेलो टूट रही है तो इसका कारण उनके दो पोते हैं, कार्यकर्ता नहीं। इनेलो के कार्यकर्ता इस आस में बूढ़े हो रहे हैं कि इनेलो का राज आएगा, ओमप्रकाश चौटाला दोबारा मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन इनेलो की जीत के बीच ओमप्रकाश चौटाला के दो पोतों की मुख्यमंत्री की कुर्सी आ गई है। 25-30 की उम्र के उनके दोनों पोते राजनीति में उतरते ही सीएम की कुर्सी मांग रहे हैं। उनके एक पोते का नाम है दुष्यंत तो दूसरे का दिग्विजय। दोनों ओमप्रकाश चौटाला के बड़े बेटे अजय सिंह चौटाला के पुत्र हैं।

तारीख 7 अक्टूबर, साल 2018। अभय चौटाला के भाषण के दौरान हूटिंग। इतना ही नहीं पार्टी के मुखिया चौधरी ओमप्रकाश जी के भाषण के दौरान हूटिंग। हूटिंग करने वाले यूथ इनेलो और स्टूडेंट विंग इनसो के कार्यकर्ता। युथ विंग और इनसो को दुष्यन्त और दिग्विजय संभालते हैं। जब युवा हूटिंग कर रहे थे तो ओमप्रकाश चौटाला ने दुष्यन्त को धमकाया भी, लेकिन उनकी बात को दुष्यन्त ने अनसुना कर दिया जिसके कारण ही ओमप्रकाश चौटाला ने अपने दोनों पोतों को निष्कासित कर दिया।

अब सवाल यह है कि दोनों ने मुख्यमंत्री बनने की ज़िद में अपने सगे दादा और चाचा के ख़िलाफ़ ही हूटिंग करवा दी। अगर कोई कार्यकर्ता इनसे ज़्यादा मेहनत करके ऊपर जाने की कोशिश करेगा तो उसके साथ ये दोनों नौजवान क्या करेंगे? दुष्यन्त तो अपने अंदर ताऊ देवीलाल की छवि होने का प्रचार करवाते हैं और फिर कुर्सी के लिए अपने दादा और चाचा के साथ ही झगड़ रहे हैं। अगर इतनी छोटी सी उम्र में ही कुर्सी के लिए अपने परिवार से झगड़ रहे हैं तो दुष्यन्त को चौधरी देवीलाल की परछाई बताना सबसे महान मूर्खता है। क्योंकि उन्होंने कभी कुर्सी के लिए लड़ाई नहीं की बल्कि अपनी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर वीपी सिंह को बैठाया। ऐसा उन्होंने उस समय किया था जब उनकी राजनीति 45 वर्ष के पार हो चुकी थी।
कुछ ज़रूरी सवाल
एक बार आंख मूंदकर सिर्फ इतना सोचिए कि दुष्यन्त को पंचर करने से किसका फायदा है? अब एक सवाल यह भी है कि क्या सिरसा, जींद, फतेहाबाद और हिसार का कार्यकर्ता गोहाना में जाकर चौधरी ओमप्रकाश चौटाला के ख़िलाफ़ हूटिंग कर सकता है? असल में तो असली इनेलो का कार्यकर्ता कभी भी ओमप्रकाश चौटाला के ख़िलाफ़ हूटिंग नहीं करेगा। फिर हूटिंग किसने की?
दुष्यंत को पंचर और ओमप्रकाश चौटाला के ख़िलाफ़ हूटिंग करने वाले कौन लोग हैं?

  • हूटिंग उन युवाओं ने की जो रोहतक और सोनीपत बेल्ट के हैं, जिनके परिवार या तो कांग्रेसी हैं या भाजपाई। लेकिन ये युवा पिछले कुछ सालों से इनेलो की स्टूडेंट विंग इनसो और यूथ विंग में सक्रिय हैं।
  • ये युवा एक आम बात अपनी ज़ुबान पर रखते हैं, “हमें इनेलो से कुछ नहीं लेना, हम तो दुष्यन्त जी के साथ हैं।” ये वो नौजवान हैं जिन्होंने दुष्यन्त के राजनीति में कदम रखते ही यह नारा दे दिया था, “हमारा मुख्यमंत्री कैसा हो, दुष्यन्त चौटाला जैसा हो।”
  • इन्हीं के बहकावे में आकर दुष्यन्त ने 2014 में हिसार से लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद उचाना से विधानसभा का चुनाव लड़ा था और मुंह की खानी पड़ी थी।
  • इन युवाओं के फेसबुक को देखेंगे तो पता लगेगा कि इनकी सारी पोस्ट इनेलो, ओमप्रकाश चौटाला और अभय चौटाला के ख़िलाफ़ होती हैं। पिछले कुछ महीनों से तो इन्होंने भाजपा और कांग्रेस के ख़िलाफ़ एक भी पोस्ट नहीं लिखी है।
  • इन्हीं युवाओं ने 7 अक्टूबर को ओमप्रकाश चौटाला के ख़िलाफ़ हूटिंग की।

व्हाट्सअप ग्रुप्स से चाचा-भतीजे के रिश्ते को किया खराब
दुष्यन्त के दो एनआरआई मित्र दुष्यन्त के नाम पर सोशल मीडिया संभालने लग जाते हैं। इन दोनों ने ही सबसे पहले एक ग्रुप बनाया जिसका नाम थामंथन”, जिसमें दुष्यन्त चौटाला भी ऐड किए गए थे। इस ग्रुप में अभय चौटाला को अनाप-शनाप बोला गया और दुष्यन्त चौटाला ने एक बार भी अपने चाचा के ख़िलाफ़ बोलने वालों का विरोध नहीं किया। कुछ पक्के लोकदलियों ने ओमप्रकाश चौटाला और अभय को अनाप-शनाप बोले जाने का विरोध किया तो उन्हें ग्रुप से बाहर निकाल दिया।
उसके बाद इस ग्रुप के स्क्रीनशॉट ख़ुद दुष्यन्त के एनआरआई दोस्तों ने अपने गुर्गों के माध्यम से अभय चौटाला को पहुंचा दिए गए और उनसे कहा गया कि दुष्यन्त चौटाला आपके ख़िलाफ़ साजिश कर रहा है। जब अभय ने दुष्यन्त से इस बारे में पूछा तो दुष्यन्त अभय से नाराज़ भी हो गए। इससे पहले भी किसी बात पर कहासुनी के चलते दुष्यन्त अभय से नाराज होकर बाहर विदेश घूमने चले गए थे और अपने भाई दिग्विजय को भी बाहर घूमने के लिए भेज दिया था। ये दोनों भाई उस समय बाहर घूमने गए थे जब एसवाईएल के पानी के लिए इनेलो सड़कों पर संघर्ष कर रही थी। उसी दिन पार्टी के पेज से तो आंदोलन की तस्वीरें साझा हुई और दिग्विजय चौटाला के इंस्टाग्राम पेज से समुद्र के बीच पर हॉलिडे मनाने की। फिर दुष्यन्त का ब्याह आया और पारिवारिक खुशियों के बीच सब ठीक हो गया।
व्हाट्सअप पर “मंथन” ग्रुप से अलग दुष्यन्त के दोनों एनआरआई मित्रों ने 15-16 मेंबर्स का एक और ग्रुप बनाया जिसका नाम रखा गया “खागड़”। इस ग्रुप में भी दुष्यन्त चौटाला नहीं जुड़े हुए थे, लेकिन उन्हें ग्रुप की सारी जानकारियां मिलती रहती थी। इसी ग्रुप में लगातार ओमप्रकाश चौटाला और अभय चौटाला को भला-बुरा कहा गया और गालियां भी दी गई। इसी ग्रुप में दुष्यन्त को सीएम के सपने दिखाने तेज़ कर दिए गए। इस ग्रुप के स्क्रीनशॉट भी अभय चौटाला के पास पहुंचा दिए गए। फिर अभय चौटाला ने भी गुस्से में आकर कई लोगों को फ़ोन पर अपने दोनों भतीजों को उल्टा-सीधा बोला जिसकी रिकॉर्डिंग दुष्यन्त और दिग्विजय के पास पहुंचा दी गई। शातिर चुगलखोरों ने अपना काम किया और परिवार पहुंच गया टूटने की कगार पर। दुष्यन्त के जिन दो एनआरआई दोस्तों की वजह से उनका परिवार टूट रहा है, उनमें से एक बीजेपी के एनआरआई संगठन ऑफ बीजेपी (ओवरसीज फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी) का एजेंट है।
दुष्यन्त को पंचर करने का किसको फायदा होगा?
साल 1977। देश में इमरजेंसी ख़त्म हुई। हरियाणा की बागडोर एक समझदार किसान के हाथ में गई। नाम था देवीलाल यानी जनता के ताऊ। उसी दौरान हरियाणा बाढ़ की चपेट में आ गया। ताऊ को अपने देहात की फिक्र होने लगी। केंद्र सरकार के पास गए तो मोरारजी देसाई ने अपना पल्ला झाड़ लिया क्योंकि वे चौधरी चरणसिंह के नज़दीकी माने जाते थे। पैसे बेशक न रहे हों लेकिन अपनी जनता को बाढ़ से बचाने का उनमें जज़्बा था। इसलिए उन्होंने गांव-गांव घूमकर लोगों को ख़ुद ही मिट्टी के बांध बनाने के लिए प्रेरित किया। मिट्टी का पहला तसला वह ख़ुद डालते। उनको काम करते देख पूरा गांव काम करने लग जाता और मिट्टी का बांध चंद घण्टों में पूरा हो जाता। ऐसे करके उन्होंने बिन पैसे ही हरियाणा को उस समय बाढ़ से बचा लिया।
इस किस्से को याद करते हुए हरियाणा के राजनैतिक इतिहासकार अनिल भनवाला बताते हैं,

ताऊ देवीलाल को हराने का माद्दा किसी में नहीं रहा। लेकिन फिर भी वे कई चुनाव हारे। उसकी वजह थी कि वे किसान-मज़दूरों के हक़ों की बात करते थे, इसीलिए शहरों की व्यापारी लॉबी उनसे खार खाती थी। इसी वजह से व्यापारी सभी गैर किसान लोगों को इकठ्ठा कर ताऊ देवीलाल को हराया करते थे। इन सब किस्सों का ज़िक्र यहां इसलिए ज़रूरी है क्योंकि हरियाणा में इनेलो की जीत के मौका सभी पार्टियों से ज़्यादा थे। उसका कारण है बसपा के साथ गठबंधन।

हरियाणा के किसान, दलित और मेव मुसलमान जिसके साथ भी चल देते हैं जीत उसी की होती है। लेकिन आरएसएस और भाजपा को किसान, दलित और मुसलमान के इस गठजोड़ का पहले से ही पता था क्योंकि उनकी नीतियां किसान विरोधी, दलित विरोधी और मुसलमान विरोधी रही हैं। इसीलिए आरएसएस ने इनके गठजोड़ को तोड़ने का पहले ही एक तोड़ निकाल रखा था, वो है इन तीनों समुदायों के वोटों को कई जगह बांट देना और पूंजीपतियों की मदद से दोबारा सत्ता हासिल करना। अब इनेलो को तोड़ा जा रहा है तो संघ-भाजपा को सत्ता में वापसी करने में कतई कोई दिक्कत नहीं होगी।
कुर्सी का खेल गज़ब है। आदमी अपने दादा तक को नहीं छोड़ता, जिसने उसे चलना सिखाया है। ख़ैर बरसाती और लालची कार्यकर्ताओं को 40-50 साल से जुड़े उन कार्यकर्ताओं की तरफ भी देखना चाहिए जो लोकदली विचारधारा को ज़िंदा रखे हुए हैं.

(इस रिपोर्ट का दूसरा भाग जल्द ही)

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