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महाराष्ट्र के दूध देवता नाराज

मुंबई में मॉनसून की बारिश में अगर हेलो फ्रैंड्स, चाय पी लो वाली आंटी की बात मानकर आप चाय पीने का मन बना रहे हैं, तो थोड़ा होशियार हो जाएं. क्योंकि महाराष्ट्र के दूध देवता नाराज हो गए हैं. किसान अपने दूध के खरीद मूल्य की बढ़ोत्तरी को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं. सूबे के किसानों के ‘स्वाभिमानी शेतकरी संगठन’ ने सोमवार से ‘महादूध आंदोलन’ का डंका पीट दिया है. सूबे के किसान ख़रीद मूल्य में पांच रुपये की बढ़ोतरी और दूध से बनने वाली चीजों से जीएसटी हटाने की मांग कर रहे हैं. किसानों के कई दूध संघ मुंबई और पुणे जाने वाले दूध की सप्लाई को ठप करने पर उतारू हैं. दूध सड़कों पर गिराकर किसान, सरकार को अपने बगावती तेवर दिखा रहे हैं.

वो बगावती तेवर दिखाएं भी क्यूं ना. उनसे दूध 14 से 18 रुपये लीटर के हिसाब से खरीद लिया जाता है और फिर इसी दूध को थैली में पैक कर कंपनियां 40 से 42 रुपये लीटर के हिसाब से बेचती हैं. इसलिए स्वाभिमानी शेतकरी संगठन से जुड़े किसानों ने सोमवार को गांव-देहात से दूध ले जाने वाले टैंकरों के चक्के जाम कर दिए. इन किसानों ने नागपुर-अमरावती हाइवे पर दूध ले जा रहे एक टैंकर को रोककर उसे आग के हवाले कर दिया.

15 जुलाई की रात को स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के लोकसभा सांसद राजू शेट्टी ने ऐलान किया कि जब तक सूबे के दूध उत्पादक किसानों को दूध का उचित दाम नहीं मिलेगा तब तक हम दूध की सप्लाई को ठप रखेगें.

दूध के टैंकरों से दूध गिराते आंदोलनकारी (फोटो : ANI)
दूध के टैंकरों से दूध गिराते आंदोलनकारी (फोटो : ANI)

पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि किसान एक लीटर दूध के लिए 35 रुपये खर्च करता है. वहीं उनसे ये दूध 14 से 18 रुपये में ही खरीदा जाता है. जबकि बाजार में गाय का  दूध 42 रुपये और भैंस का दूध 50 रुपये प्रति लीटर बेचा जा रहा है. सरकार इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही है इसलिए उन्हें ये आंदोलन करना पड़ रहा है. राजू शेट्टी खुद भी पालघर के पास गुजरात – महाराष्ट्र बॉर्डर पर सूबे में आने वाले दूध टैंकर को रोकने का ऐलान कर चुके हैं. आंदोलित किसान बुलढाणा, जालना, औरंगाबाद, पुणे, नासिक, कोल्हापुर और सांगली जिलों मे दूध ले जा रहे ट्रक-टैंकरों को रोककर दूध सड़क पर बहा रहे हैं.

यह आंदोलन अचानक नहीं उभरा है. इससे पहले भी 29 जून को पुणे में किसानों ने एक बड़ा मोर्चा निकाला था. सूबे के कृषि अधिकारियों को अपना दुखड़ा लिखित में देकर बताया था. इन किसानों ने अपने दूध के लिए पांच रुपये प्रति लीटर के हिसाब से पैसा बढ़ाकर उनके बैंक अकाउंट में जमा करने की मांग की थी. लेकिन सरकार उनकी मांगों पर कोई ठोस फैसला नहीं लिया है. इसलिए मजबूर होकर किसान अब फिर आंदोलन कर रहे हैं.

किसानों के इतने तीखे विरोध के बाद भी फड़णवीस सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंगी है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने इन किसानों को सीधे-सीधे सब्सिडी देने वाली मांग का समर्थन नहीं किया है. फड़णवीस ने नागपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा है कि बातचीत के लिए दरवाज़े हमेशा खुले है. सरकार किसी भी मुद्दे पर अड़ी हुई नहीं है. लेकिन जिस तरह से हाल-फिलहाल में आंदोलन हो रहा है, वह सही नहीं है.

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