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मोदी सरकार ने चुपके से पार्टियों की विदेशी फंडिंग को आसान बना दिया है

मोदी जी की सरकार काम करे और बताए न कि उसने काम किया है ऐसा होता नहीं है. लेकिन सरकार ने एक ऐसा काम कर दिया है जिसके बारे में उसने आपको बताया नहीं. माने गाजे-बाजे के साथ. और किसी ने कुछ चूं-चपड़ नहीं की क्योंकि इस एक कदम को विपक्ष का पूरा साथ मिला था. क्योंकि फायदा उनका भी था जो सरकार में हैं और उनका भी जो नहीं हैं. तो ये काम क्या था?

काम था अपने लिए चंदे का जुगाड़ बिना किसी झंझट के. सारी राजनितिक पार्टियां अब बिना रोकटोक कितना भी चंदा, किसी से भी ले सकेंगी और इसकी कोई जांच नहीं होगी.

ये इसलिए संभव हुआ है क्योंकि हाल ही में संसद में इस साल का वित्त विधेयक (2018) पास हो गया है. इसमें राजनैतिक पार्टियों को 1976 के बाद मिले किसी भी तरह के देशी-विदेशी चंदे की जांच से मुक्त कर दिया गया है. इस नए विधेयक को सभी दलों द्वारा बिना बहस किए मंजूरी दे दी गई. यह विधेयक विदेशी चंदा नियमन कानून-2010 से संबंधित था, जो विदेशी कंपनियों को राजनीतिक दलों को चंदा देने से रोकता था. सियासी दलों को राजनैतिक चंदे में रियायत देने का काम पहले की सरकारों से ही शुरू हो गया था.

जानिए कब और कैसे सियासी दलों ने चंदा लेने को आसान बनाया

#. सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने कंपनियों के राजनैतिक चंदे को वीआईपी बनाया था, जिसमें कंपनियों को चंदा दिखाकर टैक्स में छूट देने की इज़ाज़त दी थी. ध्यान रहे सियासी दलों को मिली रकम पर टैक्स नहीं लगता.

#. इसके बाद कांग्रेस सरकार भी पार्टियों को झोला भरने के लिए इलेक्टोरल ट्रस्ट लेकर आई थी जिसके जरिए सभी दल पैसा समेटते हैं.

#.2017 में मोदी सरकार एक वित्त विधेयक लेकर आई जिसमें राजनैतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे की अधिकतम सीमा को हटा दिया. इसके बाद अब कंपनियों को यह भी नहीं बताना पड़ता कि उन्होंने किस पार्टी को कितना चंदा दिया है. इससे पहले तक कंपनियां अपने तीन साल के शुद्ध लाभ का अधिकतम 7.5 फीसदी हिस्सा ही चंदे के तौर पर दे सकती थीं.

#.ताजे संशोधन के बाद सियासी दलों के विदेशी चंदों की कोई पड़ताल नहीं होगी.

#.इससे पहले 2016 के वित्त विधेयक के जरिए सरकार ने विदेशी चंदा कानून के तहत विदेशी कंपनी की परिभाषा को उदार किया था और यह बदलाव 2010 से लागू किया था. मतलब अब ज़्यादा कंपनियां सरकारी कागज में विदेशी मानी जा सकती थीं.

फोटो संकेतात्मक
आमतौर पर विपक्ष सरकार के हर दूसरे काम पर छाती पीटता है लेकिन ये विधेयक बिना किसी बहस मंज़ूर हो गया. 

ताजा किए गए संशोधन ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही 2014 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले से बचने के रास्ते आसान कर दिए हैं, जिसमें दोनों दल एफसीआरए कानून के उल्लंघन के दोषी थे. एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक राइट्स के आकड़ों के अनुसार देश के पांच प्रमुख सियासी दलों ने 2012 से लेकर 2016 तक 945 करोड़ का चंदा कंपनियों से लिया है. आपको याद रहे इस पैसे पर न राजनैतिक दलों को तो ना ही कंपनियों को कोई टैक्स देने की जरूरत है.

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