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वो नेता जिसने गोलियों की बौछार के बीच अंग्रेजों का झंडा उताकर देश का झंडा फहरा दिया

साल 1932, दिन था 23 मार्च, शहीद भगत सिंह का पहला शहादत दिवस. कांग्रेस कमेटी के क्रांतिकारी धड़े ने पंजाब में कचहरियों पर कांग्रेसी झंडा फहराने का प्लान बनाया. लेकिन इस प्लान की खबर अंग्रेज़ी हुकूमत को लग जाती है. इसके बाद पंजाब में अंग्रेजी सेना ने जिलेवार मोर्चा संभाल लिया. कांग्रेस के नेताओं ने एक सीक्रेट मीटिंग बुलाई, जिसमें अंडरग्राउंड होने की बात कही गई. लेकिन उस मीटिंग में 16 साल का नौजवान पीछे हटने को तैयार ना हुआ.

नेताओं ने समझाया उसे समझाया भी और गोली लगने का डर भी दिखाया. लेकिन नौजवान किसी की भी सुनने को तैयार नहीं था. वहां मौजूद एक कांग्रेसी नेता उनसे कहा कि हम तो डरपोक हैं और तुम ज्यादा बहादुर हो तो जाओ खुद ही फहरा लो झंडा. नौजवान का उबाले मार रहा खून कहां शांत होने वाला था. उसने झंडा अपने कुर्ते में छुपा लिया और झंडा फहराने कचहरी पहुंच गया. वहां तैनात अंग्रेजी सेना को चकमा देकर झंडा फहराने कचहरी की छत पर चढ़ने लग गया. नीचे खड़े अंग्रेज़ी जवानों ने उस पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. लेकिन एक भी गोली छू तक ना सकी. नौजवान ने यूनियन जैक के झंडे को उतारकर फेंक दिया. और देखते ही देखते कांग्रेस का झंडा फहराकर भाग गया. कुछ दिन बाद उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तार हुए नौजवान को अगले दिन कोर्ट में पेश किया गया. कोर्ट में जज ने उनका नाम पूछा, नौजवान ने तपाक से जवाब दिया,

“मेरा नाम लंदनतोड़ सिंह है.”

साल 1972, पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में लोगों का एक जत्था बढ़ रही महंगाई के खिलाफ कूच करता है. सूबे के नए मुख्यमंत्री बौखला जाते हैं और प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटने के आदेश दे बैठते हैं. जैसे ही उनका आदेश आया पुलिस ने लट्ठ बरसाने शुरू कर दिए. लेकिन लोग फिर भी पीछे नहीं हटे. पीछे हटते भी कैसे, उनके साथ खड़े थे लंदनतोड़ सिंह यानी सरदार हरकिशन सिंह सुरजीत. जब लाठीचार्ज से बात नहीं बनी तो करीब 250 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तार किए गए सभी लोगों को बुड़ैल जेल में डाला दिया गया.

हरकिशन सिंह का जन्म पंजाब में लुधियाना के एक गांव बुंदाला में हुआ था.
हरकिशन सिंह का जन्म पंजाब में लुधियाना के एक गांव बुंदाला में हुआ था.

गिरफ्तार हुए लोगों में उनके नेता हरकिशन सुरजीत भी शामिल थे. उस समय उनके साथ जेल में बन्द रहे कामरेड रघु उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं,

“पुलिस के किसी अफसर ने जैल सिंह को खबर भिजवाई कि जल्दी कुछ करें, इन्होंने तो यहां जेल को यूनिवर्सिटी बना रखा है. सारा दिन ये कैदी पढ़ते रहते हैं. कामरेड सुरजीत इनका प्रोफेसर बना हुआ है. हमारा ही राशन खाकर हमारे ही खिलाफ नाटक खेलते हैं, गाने गाते हैं. इनको जेल में डालकर कुछ नहीं होने वाला जल्दी कुछ करें.”

इसके बाद कामरेड सुरजीत के पास के जैलसिंह ने पुलिस वाले के हाथ 1 लाख रुपये का आफर भिजवाया. पुलिस वाले ने उनके पास आकर कहा,

” आप ये 1 लाख रुपये ले लो. हम आप सभी को जेल से भी छोड़ देंगे. लेकिन बाहर जाकर आप धरना मत करना.”

ये सुनते ही उनके माथे की तियोरियां चढ़ गई और संदेशा लेकर आए पुलिस वाले को बड़ी तल्खी से कहा,

”जैल सिंह को पता होना चाहिए कि सुरजीत का जमीर बिकाऊ नहीं है, जो इन नोटों की गड्डियों से खरीदा जाए. जाओ, उनको कह देना सुरजीत टूटने वाला नहीं है. वो महंगाई की कमर तोड़कर ही दम लेगा.”

पुलिस वाला बेचारा छोटा सा मुंह लेकर वहां से जाता रहा. हम उनके साथ तब ढाई महीने बन्द रहे. एक कमाल की बात ये थी कि वे 24 घण्टे में सिर्फ 5 या 6 घण्टे ही सोते थे. उनका ज्यादातर समय पढ़ने-लिखने और अपने दूसरे साथियों को पढ़ाने में बीतता था. वे हमें अकसर कहते थे,

“मैं तो सिर्फ मैट्रिक तक ही पढ़ा हूं, फिर भी दिन भर लोगों को पढ़ाने में लगा रहता हूं. आप लोग तो ग्रेजुएट हो, पढ़े लिखे हो. अपने फ़र्ज़ को समझो. जब तक यहां जेल में हो अपने दूसरे अनपढ़ या कम पढ़े लिखे साथियों को पढ़ाना शुरू करो. “



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