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सरकार बस इतना बता दे कि मैं कहां जाकर मरूं

तारीख 19 मई. हरियाणा के जींद जिले के किसान गजे सिंह जींद प्राथमिक सहकारी भूमि विकास बैंक द्वारा जारी किए गए उनकी जमीन नीलामी के नोटिस को लेकर परेशान है. बैंक के नोटिस में उसे लगभग 9 लाख रूपए चुकाने की बात कही है. उसे यह समझ ही नहीं आ रहा है कि इस नोटिस का क्या करे और कहां लेकर जाए. कर्ज तले दबे इस किसान को शहर आकर पता चला कि बैंक ने जिले में लगभग 150 किसानों को उनकी जमीन नीलामी के नोटिस थमाए हैं. जमीन नीलामी के नोटिस के अलावा जिले के बैंकों ने 4,500 किसानों को कर्ज वसूली के सिलसिले में भी कानूनी नोटिस थमाए हैं.

जमीन नीलामी के नोटिस देखकर गजे सिंह सहमा हुआ है. उसका कहना है कि आज से करीब 15 साल पहले खेती करने के लिए उसने साढ़े तीन लाख का लोन लिया था और अब बैंक 30 मई तक 9.12 लाख रूपए चुकाने के लिए कह रहा है. पिछले कई सालों से खेती में कोई फायदा ना होने की वजह से अब इतनी बड़ी राशि चुकाने की उसकी हैसियत नहीं है. हर बार प्राकृतिक आपदा के कारण फसल खराब होने के चलते वह कर्जे की मार झेल रहा है.

गजे सिंह बताते हैं  “जींद की सरकारी चीनी मिल ने अभी उनकी गन्ने की फसल के 3 लाख रूपए भी नहीं दिए हैं और अगर ऐसे में सरकार उसकी चार एकड़ जमीन नीलाम कर रही है तो सरकार मुझे बस इतना बता दे कि मैं कहां जाकर मरूं.”

पिछले कई वर्षों से कृषि ऋण माफ़ी किसानों और उनके आंदोलनों की सबसे प्रमुख मांग रही है. चुनाव में किसानों के सम्पूर्ण कर्ज माफ़ी की घोषणा करके भाजपा और कांग्रेस ने सत्ता भी हासिल की है, लेकिन इन दोनों पार्टियों ने ही सत्ता में आने के बाद किसानों के साथ वादा-खिलाफी की है. एक तरफ तो विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे बड़े-बड़े उद्योगपति बैंकों के हजारों करोड़ रूपए लेकर भाग जाते हैं और दूसरी तरफ गरीब किसानों की थोड़े से कर्ज के चलते जमीन नीलाम कर दी जाती है.

किसानों की जमीन की नीलामी का विरोध करते हुए इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के विधायक परमेंदर ढुल किसानों के साथ आए हैं. विधायक ने बैंक द्वारा जारी किए गए जमीन की नीलामी के नोटिस को पत्रकारों को दिखाते हुए इसे ‘सरफेसी कानून’ का उल्लंघन बताया है.

उनका कहना है, “सरफेसी कानून 1993 (2006 में संशोधित) के अनुसार एक लाख रूपए से 9 लाख रूपए तक के कर्जदार किसान की जमीन को कोई बैंक या दूसरी वित्तीय संस्था नीलाम नहीं कर सकती. पिछले दिनों जब सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों या किसी दूसरी वित्तीय संस्था के कर्ज तले दबे किसानों की सूची मांगी थी, तब भाजपा सरकार ने दलील दी थी कि वह कर्जदार किसानों की सूची नहीं दे सकती क्योंकि इससे उन किसानों की बदनामी होगी. अब यही किसान विरोधी भाजपा सरकार किसानों की जमीन नीलामी के नोटिस सरेआम जारी कर रही है. क्या अब किसानों की बदनामी नहीं हो रही है. हम हर हाल में में इन किसान विरोधी ताकतों का सामना करेंगे और किसानों की जमीन की नीलामी नहीं होने देंगे.”

सरफेसी कानून के उलंघन के सवाल पर बैंक अधिकारी नर सिंह का कहना है कि सरफेसी कानून केवल राष्ट्रीयकृत बैंकों पर लागू होता है. सहकारी बैंकों के लिए अलग कानून है और उसी के अनुसार ही कर्जदार किसानों को उनकी जमीन की नीलामी के नोटिस दिए गए हैं.

पिछले साल भी प्रदेश के दादरी और पलवल के कई किसानों को उनकी जमीन नीलामी के नोटिस थमाए गए थे, लेकिन प्रदेश के किसान संगठनों और क्षेत्रिय पंचायतों के भारी विरोध के चलते बैंकों को पीछे हटना पड़ा था. देशभर के किसान पिछले कई सालों से सम्पूर्ण कर्ज माफ़ी और फसलों के दाम लागत से डेढ़ गुना बढ़ाकर देने की मांग लगातार करते रहे हैं. इस साल भी सम्पूर्ण कर्ज माफ़ी और स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करवाने के लिए 22 फ़रवरी को किसानों के दिल्ली घेराव आन्दोलन को सरकार ने कुचल दिया था. हालांकि, किसान महासंघ के बैनर तले अनेक किसान संगठन अपनी पुरानी मांगों को लेकर 1 जून से 1० जून तक गांव बंद का ऐलान कर चुके हैं.

अब अहम सवाल यह है कि क्या ये किसान संगठन और विपक्षी दल गजे सिंह और उनके जैसे किसानों की जमीन नीलामी रोक पाएंगे? क्या उन्हें कर्ज से मुक्ति दिला पाएंगे?

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