लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

रिपोर्ट

क्या 95 या 99.9 प्रतिशत पाने वाले छात्रों और उनके मां-बाप किस बात की खुशियां मना रहे हैं?

ये जो बच्चे 95 और 99.9 प्रतिशत अंक पा रहे हैं और उनके माँ-बाप अपना 56 इंची सीना टोले-मोहल्ले और फेसबुक पर दिखा रहे हैं, मुआफ़ करें, इससे मुझे कोई खुशी या उत्साह अनुभव नहीं हो पाता। ऐसे तमाम अभिभावक अपने बच्चों को हैसियत, पैसे और सुरक्षा के लिए जारी भेड़ियाधसान, कुत्ता-दौड़ और चूहा-दौड़ के कुशल प्रतिस्पर्द्धी बना रहे हैं और जाहिर है कि अपने बच्चों के भविष्य को लेकर वे पूरीतरह आश्वस्त हो लेना चाहते हैं। पर इन बच्चों के सभी शुभेच्छु न तो समाज के भविष्य के बारे में कुछ सोचते हैं और न ही ये बच्चे, अपवादों को छोड़ दें तो, कभी इतने संवेदनशील बन पाते हैं कि समाज के उपेक्षितों-लांछितों-दमितों-उत्पीड़ितों की तरफ उनका ध्यान जाए। इन बच्चों को बस एकमात्र यह लक्ष्य दिया जाता है कि वे डाक्टर-इंजीनियर बनकर खूब धन कमायें, मोटे-मोटे पैकेज लेकर आई टी सेक्टर में जाएँ या कलक्टर-एस.पी. बनकर अपने हक की आवाज़ उठाते लोगों पर लाठियों-गोलियों की बौछार करें।

ये बच्चे और इनके माँ-बाप कभी भी पीछे छूट गए बच्चों के बारे में नहीं सोचते और यह मानकर चलते हैं कि जो मेधावी और परिश्रमी थे वे आगे निकल गए और अयोग्य और आलसी पीछे छूट गए। उनके भेजे में यह बात तक नहीं आती कि हर बच्चे में कोई न कोई विशिष्ट योग्यता होती है, जो उनकी पारिवारिक स्थिति और इस शिक्षा-व्यवस्था के कारण उभरकर सामने आ ही नहीं पाती। उनकी खोंपड़ी में यह बात घुस ही नहीं पाती कि इस शिक्षा-व्यवस्था का ढाँचा गढ़ा ही इसतरह गया है कि उत्पादन और विनिमय और राज-काज के पूरे तंत्र को चलाने के लिए जितने नौकरशाह, वैज्ञानिक, प्राध्यापक, डाक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, सेनाधिकारी आदि चाहिए, उतने को चुन लेने के बाद शेष आबादी को बौद्धिक और शारीरिक उजरती गुलामी करने वाली भीड़ में धकेल दिया जाए और उनके दिमाग में यह बात कूट-कूट कर बैठा दिया जाए कि वे इसी लायक थे। शिक्षा इसी मामले में ‘आयडियोलोजिकल स्टेट-आपरेटस’ है, जिसके द्वारा शासक वर्ग अपनी हेजेमनी स्थापित करता है। यह भी अनायास नहीं है कि अच्छी शिक्षा और अच्छी नौकरी की चूहा-दौड़ में 90-95 प्रतिशत वही आगे निकल पाते हैं जो समाज के ‘विशेषाधिकार-प्राप्त उपभोक्ता समाज’ के भीतर से, यानी खाते-पीते परिवारों से आते हैं। ऐसा इंतज़ाम किया ही इसलिए गया है कि सामाजिक संस्तरों के स्थापित पद-सोपान-क्रम में ज्यादा उथल-पुथल न हो। इसके जो अपवाद होते हैं, उनके उदाहरण दे-देकर अच्छे अंक पाने वाले और ऊँचे पदों-ओहदों पर पहुँचने वाले लोग यह तर्क देते हैं कि ‘फलां को देखो, अपनी मेहनत और काबिलियत से कहाँ पहुँच गया।” यानी जो नहीं पहुँच सके वे हैं ही काहिल और मूर्ख। यह ‘सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट’ का बर्बर तर्क है, जहाँ सारी योग्यता हैसियत और आर्थिक ताक़त से तय होती है।

प्रतिस्पर्द्धा पूँजीवाद की मूल चालक शक्ति होती है। इसलिए पूँजीवादी समाज के हर नागरिक के दिलो-दिमाग में यह तर्क बैठाना होता है कि ‘भई, तुम प्रतिस्पर्द्धा में पीछे छूट गए तो तुम इसी लायक हो, और अब अपनी इस स्थिति को सर झुकाकर स्वीकार करो !’ सारी योग्यता इस बात से तय होती है कि तुम इस खूनी-बर्बर व्यवस्था के नट-बोल्ट बनने के लिए कितने अनुकूल हो।

मैंने सैकड़ों कैरियरवादी छात्रों को, सिविल सेवा की, विदेश जाने की या ऐसी ही किसी चीज़ की तैयारी करने वाले युवाओं को देखा है। अपवादों को छोड़ दें तो इनकी बड़ी संख्या राजनीतिक-सामाजिक ज्ञान के मामले में निहायत कूपमंडूक तो होती ही है, ये प्रायः रुग्णता की हद तक स्वार्थी, व्यक्तिवादी और कमीने होते हैं। आपको कभी पीले-बीमार चेहरों वाले इन लोगों के अंतर्जगत में झाँकने का मौक़ा मिले तो आप पायेंगे कि ये आत्मिक रूप से दिवालिया और नैतिक रूप से निहायत गिरे हुए लोग होते हैं। व्यवस्था जितनी अधिक रुग्ण, संकटग्रस्त और आततायी होती जाती है, उसे ऐसे लोगों की ज़्यादा से ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है और तब ऐसे लोग भारी तादाद में बाज़ार में उपलब्ध भी हो जाते हैं।

मैं जब बहुतेरे वाम-प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को देखती हूँ कि वे अपने बेटे-बेटी-नाती-पोते आदि-आदि के 95 और 99 प्रतिशत अंक पाने की खुशी सोशल मीडिया पर भी डागा-बाजा बजाकर करते हैं तो मुझे क्षोभ होता है। वे अपनी निजी खुशी के साथ इस अन्यायी शिक्षा-व्यवस्था को एक तमगा भी दे रहे होते हैं और प्रकारांतर से उन लोगों की खिल्ली भी उड़ा रहे होते हैं जो अपनी सामाजिक-पारिवारिक स्थिति और इस शिक्षा-व्यवस्था द्वारा निर्धारित योग्यता के घनघोर अन्यायपूर्ण और अवैज्ञानिक पैमाने के कारण पीछे छूट गए। यही वामपंथ को कलंकित करने वाले वे भारतीय फ्रॉड हैं जो भगतसिंह पर लेख और किताबें लिखते हैं, लेक्चर देते हैं और अगर भगतसिंह पड़ोस के बजाय उनके घर में पैदा हो जाए तो शोक में डूब जाते हैं। ज़रा नज़र घुमाकर अपने आस-पास के बुज़ुर्ग वामपंथी बुद्धिजीवियों को देखिये! उनमें से 80 प्रतिशत के बेटे-बेटियाँ विदेशों में सेटल हैं (जहाँ वे अपनी छुट्टियाँ बिताने जाया करते हैं) या फिर देश में ही उच्चपदस्थ नौकरशाह हैं, आई.टी. सेक्टर में हैं, प्रोफ़ेसर-डाक्टर-इंजीनियर हैं। बात ठीक है कि सभी वामपंथियों के बच्घ्चे वामपंथी बन जाएँ, यह ज़रूरी नहीं। यह बलात नहीं किया जा सकता! मगर यह भी इत्तेफ़ाक नहीं हो सकता कि 2-3 प्रतिशत वामपंथियों के बच्चे भी वामपंथी नहीं बन पाते। मैंने खुद ऐसे सैकड़ों वाम बुद्धिजीवी देखे हैं जिनका माथा मार्क्सवाद के “ज्ञान” से एक-एक कुंतल का हो गया है, लेकिन जो अपने बेटे-बेटियों को सिविल सर्विस, पी.एम.टी., इंजीनियरिंग, नेट आदि की तैयारी कराने पर धोती खूँटकर पिले रहते हैं और किसी भी प्रकार की सामाजिक सक्रियता और अपने विचारों से पूरी तरह काटकर रखते हैं। ऐसे वामपंथियों पर गरीब मेहनतक़श अवाम भला क्यों भरोसा करे?

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *