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रिपोर्ट

क्यों हो रहा है 5 मार्च को भारत बंद

लक्ष्मण यादव


आज मुल्क एक ऐसे मोड पर खड़ा है कि यहाँ की जनता को अपने हक़-हुकूक के लिए सड़क पर उतर कर भारत बंद करने को मजबूर होना पड़ रहा है। आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा कि ये भारत बंद क्यों हो रहा है? तो आइए, समझते हैं कि ये क्यों हो रहा है।

भारत बंद का पहला सबसे अहम मुद्दा है- आदिवासियों को उनकी जल-जंगल-ज़मीन से बेदखल करने के आदेश का प्रतिरोध।

आदिवासी, जो इस मुल्क के असल मूलानिवासी हैं, जिन्होंने इस मुल्क के जंगलों को बचाया है, उन पर जगलों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाकर और तीन पीढ़ी का पट्टा न होने के बहाने अपनी जमीन छोड़कर जाने का आदेश कितना न्यायसंगत है?

दरअसल इसके पीछे सरकारें आदिवासियों को जंगलों से बेदखल करके बड़े बड़े उद्योगपतियों को प्राकृतिक संपदा के दोहन का रास्ता साफ करना चाहती हैं।

13 फरवरी 2019 को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने वाइल्ड लाइफ फर्स्ट नामक नॉन गवर्नमेंट आर्गेनाईजेशन एंड अदर्स वर्सेज पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार एंड अदर्स मामले में 21 राज्यों की सरकारों को आदेश दिया है कि अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम २००६, के अंतर्गत वन भूमि पर आदिवासियों और पारंपरिक वन निवासी समुदाय के जिन परिवारों के आवेदन निरस्त कर दिए गए हैं, उन्हें 12 जुलाई 2019 तक राज्य सरकारें वन भूमि से बेदखल करें। हालाँकि सरकार इस फैसले के खिलाफ 13 जुलाई तक सुप्रीम कोर्ट से स्टे लेकर आ गयी है लेकिन इससे आदिवासी विस्थापन की समस्या का हल नहीं हो रहा है और वह जस की तस बनी रहेगी। सरकार की मंशा पर भी हमें शक है क्यूंकि उसने केस की पैरवी में बहुत लापरवाही बरती, कोर्ट की अंतिम चार सुनवाई में सरकार ने अपना पक्ष रखने के लिए कोई वकील नहीं भेजा। हमें स्पष्ट रूप से यह नहीं पता है की सरकार ये लापरवाही किसलिए कर रही थी।

भारतीय वन अधिनियम २००६ साफ साफ कहता है की वन भूमि में पीढ़ियों से रह रहे अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी के वन अधिकारों और कब्जे को पहचान किया जाये। इस तरह के जंगलों में आदिवासी पीढ़ियों से निवास कर रहे है लेकिन उनके अधिकारों को दर्ज नहीं किया जा सका, इसलिए उनके दावे की रिकॉर्डिंग के लिए एक रूपरेखा बनाई जाये और सबूत जुटाकर वन भूमि पर उनके अधिकारों को सुनिश्चित किया जाये। सरकारों ने आज़ादी के बाद भी पुश्तैनी जमीनों पर जंगल के अधिकार और उनके आवास को पर्याप्त रूप से मान्यता नहीं दी थी।

2 जनवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने कैलाश एवं अन्य विरुद्ध भारत सरकार मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि “आदिवासी जो कि भारत की आबादी का लगभग 8% हिस्सा है जो भारत के मूल निवासी हैं और भारत के शेष 92% लोग बाहर से आए हुए लोगों के वंशज हैं।” इसलिए सुप्रीम कोर्ट का 13 फरवरी 2019 का आदेश इस मुल्क के मूल निवासियों को जंगल से बेदखल करने की साजिश है और जंगल आदिवासियों का जीवन है तो यह संविधान का अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन है। जंगल से बेदखली आदिवासियों को उनके पैतृक जमीन, जीवन शैली, परंपरा और उनके पुरखों से दूर करने की साजिश है सामान्य शब्दों में कहा जाए तो यह बेदखली आदिवासियों के सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार का हनन है। यह बेदख़ली वन अधिकार अधिनियम 2006 और पेशा कानून 1996 का उल्लंघन है। पेसा( पंचायत एक्सटेंशन टू सेडुल एरिया) एक्ट १९९६, ग्राम सभा को सर्वोच्च मानता है, न की ग्राम पंचायत को। लेकिन इस जजमेंट में पारम्परिक ग्राम सभाओं की अनदेखी की गयी है।
इसलिए आदिवासी समाज भारत सरकार से मांग है:
१. अनुसूचित जनजाति एवं परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम २००६, को सख्ती से लागू किया जाए।

  1. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पश्चात जिन परिवारों पर विस्थापन का संकट मंडरा रहा है केंद्र सरकार ने जमीन पर मालिकाना हक/पट्टा दिलाने के लिए अध्यादेश लाए।
  2. आदिम समुदायों और जिन परिवारों ने अभी तक जमीन पर मालिकाना हक का दावा नहीं किया है सरकार उन्हें भी अनुसूचित जनजाति एवं परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम २००६, के तहत मालिकाना हक और वन अधिकार प्रदान करें।
  3. संविधान की पांचवी और छठी अनुसूची को सख्ती से लागू किया जाए।
  4. पारम्परिक ग्रामसभा के अनुसूची ५ के १३(३) (क), २४४ (१) १९, (५ एंड ६) के तहत आदिवासियों एवं वन निवासियों को दिए गए अधिकारों को सुनिश्चित किया जाए।
    साथियों हम आपको बता देना चाहते कि आदिवासी समुदाय किसी भी परिस्थिति में अपना घर जमीन और जंगल नहीं छोड़ने वाला है और हम सरकार के द्वारा रिव्यू पिटिशन के बाद आए सुप्रीम कोर्ट के स्टे ऑर्डर से भी संतुष्ट नहीं है हम चाहते हैं कि इस मुद्दे पर सरकार एक अध्यादेश लाए और तुरंत आदिवासियों के हित में कार्यवाही की जाए जिससे अगली बार जब सुनवाई हो तो सरकार आदिवासियों को उनके जल जंगल और जमीन से बेदखल न कर सके।

इस फैसले से एक करोड़ से ज़्यादा आदिवासी अपनी पीढ़ियों की विरासत और ज़िंदगी के वजूद जल-जंगल-ज़मीन से बेदखल हो जाएंगे। कोर्ट के स्टे-ऑर्डर के बहाने इसे टाला जा रहा है, जबकि अध्यादेश लाकर इसका एक स्थायी समाधान निकाला जाना चाहिए।

क्या यह संविधान की हत्या नहीं है? क्या ऐसे फैसलों का विरोध नहीं किया जाना चाहिए?

भारत बंद करने का दूसरा मुद्दा है- विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर। अब आप सोचेंगे कि ये रोस्टर क्या होता है, 13 प्वाइंट क्या होता है, इससे किसे, कितना, कहाँ नुकसान हो रहा है?

इसे सीधी आसान भाषा में समझें कि इस विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर से उच्च शिक्षा में आरक्षण पूरी तरह खत्म हो चुका है। बस इतनी सी बात है। विभागवार रोस्टर से प्रोफेसर बनने के लिए OBC, SC, ST, PwD के लिए आरक्षित पद अमूमन कभी आएँगे ही नहीं।

अभी तक पिछले एक साल में विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर लागू होने के बाद लगभग 1000 पदों के विज्ञापन आए होंगे, जिनमें से अधिकतम 3 से 4 फ़ीसदी पद OBC को और 2 फ़ीसदी पद SC को मिले होंगे। ST और PwD को कमोबेश कोई पद ही नहीं मिला।

आज भी बहुजन समाज के अधिकतम 10 फ़ीसदी शिक्षक भी नहीं होंगे, लेकिन इस विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर से तो अब कभी बहुजन शिक्षक ही नहीं बन सकेंगे।

केंद्र सरकार भी मानती है कि न्यायपालिका ने विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने का आरक्षण विरोधी फैसला दिया है, इसलिए सरकार अध्यादेश लाकर 200 प्वाइंट रोस्टर लागू करेगी। लेकिन सरकार धोखा देते हुए अध्यादेश नहीं ला रही और दूसरी तरफ आरक्षण विरोधी रोस्टर से लगातार विज्ञापन आ रहे हैं। यानी जिस आरक्षण को उच्च शिक्षा में लागू कराने के लिए सड़क से संसद तक संघर्ष हुआ, पीढ़ियाँ खप गईं; आज वह विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर से एक झटके में ख़त्म किया जा चुका है।

क्या यह संविधान की हत्या नहीं है? इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए?

यदि हाँ! तो ये विरोध हो रहे हैं। पूरा देश आज विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर और आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ़ आंदोलन कर रहा है। लेकिन सरकार लगातार इन मुद्दों को टाल कर आचार-संहिता लगने का इंतज़ार कर रही है।

रोस्टर पर अध्यादेश लाने की बात संसद में बोलकर भी सरकार लगातार धोखा दे रही है। उधर आचार-संहिता लागू हुई और इधर विश्वविद्यालयों व ज़मीनों से वंचितों की बेदखली का रास्ता साफ हो जाएगा। अभी नहीं रोका गया, तो आगे रोकने को कुछ बचेगा ही नहीं।

आंदोलनों और हड़तालों से इस सरकार पर कोई असर ही नहीं पड़ रहा है। इसलिए भारत बंद एक मजबूरी है। संविधान को बचाने और इस मुल्क को मुकम्मल मुल्क बनाने के लिए ये भारत बंद हो रहा है।

सामाजिक न्याय के लिए यह भारत बंद हो रहा है। आज़ादी के सत्तर साल बाद भी आज ये मुल्क किसका है और किसके लिए हैं, ये तय करने के लिए ये भारत बंद हो रहा है।

गाँव-कस्बों में दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक तबके के लोग अपना खून-पसीना एक करके अपनी पहली पीढ़ी के बच्चों को विश्वविद्यालयों तक भेज पाए कि वे कुछ बड़ा करेंगे। प्रोफ़ेसर बनेंगे। लेकिन आज उन पीढ़ियों के ख़्वाब ही हत्या करने वाले ‘द्रोणाचारी’ विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर के बहाने ‘एकलव्यों’ की गरदन ही काट चुके हैं।

अब मुल्क के बहुजनों के बच्चों के लिए विश्वविद्यालयों के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। अब आपके बच्चे कभी प्रोफ़ेसर नहीं बन पाएँगे। इसलिए ये भारत बंद हो रहा है।

आइए! संविधान बचाने के लिए हो रहे इस ऐतिहासिक संघर्ष का हिस्सा बनिए। ताकि जब आने वाली पीढ़ियाँ आपसे पूछें, कि ये सब तुम्हारे सामने हो रहा था, तब तुम क्या कर रहे थे? आप पीढ़ियों को बता सकें कि आप इसके विरोध में लड़ रहे थे।

(लेखक जाकिर हुसैन कॉलेज में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं)

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