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बिल चुकाने के लिए पैसा नहीं बचा तो अस्पताल ने 80 वर्षीय मरीज बिस्तर से बांध दिया

बिल चुकाने के लिए पैसा नहीं बचा तो अस्पताल ने 80 वर्षीय मरीज बिस्तर से बांध दिया. इन्हें मध्य प्रदेश के शाजापुर सिटी अस्पताल में भर्ती कराया गया था. पांच दिन भर्ती रहे. परिजनों ने दो बार में 11 हजार रुपये का बिल जमा किया. अस्पताल ने 11 हजार रुपये और मांगे. बेटी ने कहा कि अब पैसा नहीं है, हमें अब घर जाने दो. इस पर अस्पताल ने कहा कि जब तक पूरा बिल नहीं चुकाया जाता, आप मरीज को नहीं ले जा सकते.

वृद्ध 80, लक्ष्मी नारायण, चिकित्सा उपचार के लिए शाजापुर क्षेत्र से 38 किलोमीटर दूर राजगढ़ जिले से आए थे. उपचार के दौरान, परिवार ने 6,000 रुपये का भुगतान किया, उसके बाद 5,000 रुपये का.

नारायण के परिवार के पास आवश्यक राशि नहीं थी, और कोविड -19 लॉकडाउन के कारण, वे कोई अन्य व्यवस्था भी नहीं कर सकते थे.

बुजुर्ग की बेटी का आरोप है कि उसके 80 वर्षीय पिता को अस्पताल के कर्मियों ने बिस्तर पर रस्सियों से बांध दिया. बाद में स्थानीय लोगों ने हस्तक्षेप करके बुजुर्ग को अस्पताल से छुड़वाया.

जिला कलेक्टर दिनेश जैन ने एएनआई को बताया, “हमने मामले की जांच के लिए उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (एसडीएम) और एक डॉक्टर की एक टीम को अस्पताल भेजा है. ऐसा नहीं होना चाहिए था और हम यह सुनिश्चित करेंगे कि अस्पताल के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए. ”

जैन ने अस्पताल के व्यवहार की निंदा की और आश्वासन दिया कि सुधारात्मक उपाय किए जाएंगे ताकि इस तरह की कोई घटना दोहराई न जाए.

सरकार ​स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, रेलवे सब प्राइवेट हाथों में बेचना चाहती है. अस्पताल प्राइवेट बनिये के पास होगा तो वह बिल न चुका पाने के लिए आपको बांध देगा. किडनी निकाल लेगा. ​मुस्टंडे भेजकर पिटवा देगा.

सरकार चाहती है कि देश की सारी सुविधाएं ठाकुर का कुआं हो जाएं. सरकार चाहती है कि देश के स्कूल और अस्पताल शाहूकार का ठीहा हो जाएं. इससे क्रोनी पालने में मदद मिलेगी. पर आप ऐसा क्यों चाहते हैं? वह तो आपको बिस्तर से बांध देगा. जो लोग रोज रोज टैक्सपेयर के पैसे की चिंता में दुबले होते रहते हैं, इन बुनियादी बातों पर उन्हें भी कभी कोई सवाल नहीं सूझता.

नया गरीब वर्ग

लॉकडाउन की वजह से नौकरियांं जाने की वजह से देश में एक ‘नया गरीब वर्ग’ उभरा है. इस नये वर्ग में करीब 95 प्रतिशत परिवारोंं की आजीविका छिन गई है. इसके अलावा लॉकडाउन ने गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले 98 प्रतिशत परिवारों की आय के साधन छीन लिए हैं. 97 प्रतिशत दिहाड़ी मजदूरों की आय बंंद हो गई है.

मिनिस्ट्री आफ हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स की संस्था द नेशनल इंस्टीट्यूट आफ अर्बन अफेयर्स ने देश के 12 शहरों की झुग्गी बस्तियों में यह सर्वे किया है.इतनी बड़ी संख्या में लोग गरीबी की तरफ जा रहे हैं. इससे बचाने के लिए सरकार के पास अभी सिर्फ यही प्लान है कि हमसे कर्ज ले लो.

लॉकडाउन को लेकर कुछ दिन पहले एक सर्वे आया था कि भारत ने दुनिया का सबसे सख्त, सबसे बेरहम लॉकडाउन लागू किया. क्या इस लॉकडाउन का कोई फायदा हुआ? बड़े पैमाने पर देखें तो कोरोना के प्रसार की गति धीमी करने में कुछ मदद मिली. लेकिन अगर आज लॉकडाउन खुलने तक 2 लाख केस हो चुुके हैं, 5500 मौतेंं हो चुुकी हैं, तो कहना होगा कि लॉकडाउन फेल हो चुका है. इस दौरान कोई कारगर रणनीति नहीं बनाई जा सकी. तीन दिन से हर रोज 8000 से अधिक नये केस आ रहे हैं. एक तरफ महामारी और वैश्विक मंदी है, दूसरी तरफ हमारी सरकार की ओर से फैलाया गया अर्थव्यवस्था का रायता है. नोटबंदी का जो दूरगामी महान प्रभाव होना था, उसने अभी तक पीछा नहीं छोड़ा है. सरकार के पास इससे निपटने का कोई कारगर प्लान है, यह अभी तक तो नहीं दिखता. अब भी देश के अच्छे अर्थशास्त्रियों की नहीं सुनी जा रही है.

जो जबानी अच्छे दिन आए थे, क्या वे दुर्दिन में बदल चुके हैं?

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