लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

कला एवं साहित्य राजनीति

मेरे आसपास आजकल बहुत कुछ घट रहा है

मेरे आसपास आजकल बहुत कुछ घट रहा है

और बहुत तेजी से

कुछ दोस्तों ने मुखौटे बदल लिए हैं

कुछ दुश्मनों ने चेहरे।

एक बस है जो लगता है छूटने वाली है

एक और बस है ठसाठस भरी हुई

उसका खलासी गायब है

चलने का वक़्त भी नहीं पता

लोग भाग रहे हैं बेतहाशा

इधर से उधर

उधर से इधर

कुछ खड़े हैं जो असमंजस में

छूट जाने के डर से अकेले

दांव तौल रहे हैं

इधर जाएं

या उधर।

मेरे आसपास आजकल बहुत कुछ घट रहा है

और बहुत तेजी से

किसी को मिल गए हैं बारहमासा टिकाऊ जूते

किसी ने तान ली है छतरी धूप में।

मुझसे कहता है पकी दाढ़ी वाला घुटा हुआ एक आदमी

बेटा जी लो अपनी ज़िन्दगी, कमा लो पैसे

फिर नहीं आने का सुनहरा मौका

क्यों जी रहे हो जैसे तैसे

वह अभी अभी चढ़ा है एक बस में

और पुकार रहा है मुझे सीढ़ी से ही

वो छूटने वाली बस का है मुसाफिर

उसकी दौड़ ज़्यादा लंबी नहीं, जानते हुए भी

दे रहा है मुझे आखिरी आवाज़

दिस इज़ द लास्ट कॉल फॉर पैसेंजर नंबर फलां फलां

मैं असमंजस में हूं

पैरों के नीचे की धरती कर सकता हूं महसूस

थोड़ा और शिद्दत के साथ

वह मुझे गुब्बारे दिखाता है

गुब्बारे रंग बिरंगे उसकी छतरी हैं गोया उल्टा पैराशूट

आकाश की ओर उतान जिनमें भरी है

निष्प्राण, निरर्थक, नीरस गैस

मेरे सिर के ठीक ऊपर चमकाता है वह

अपने बारहमासा जूते

जिनसे अगले पांच माह वह काट लेगा कम से कम

ऐसा दावा करता है।

मेरे आसपास आजकल बहुत कुछ घट रहा है

और बहुत तेजी से

मेरे साथी कह रहे हैं चढ़ जाओ

मेरी संगिन कहती है तोड़ दो दीवारें जो

बना रखी हैं तुमने अपने चारों ओर।

एक देश है जहां उत्तेजना ऐसी है गोया

सोलह मई को नेहरू जी संसद से करेंगे

ट्रिस्ट विद डेस्टिनी का भाषण

और आज़ाद हो जाएंगे सवा अरब लोग

चौक चौराहों और ट्रेनों में बैठे लोग किसी को

देख रहे हैं आता हुए सवार सफेद घोड़े पर

उसके पीछे उड़ती हुई एक चादर है और उसके

हाथों में जादू की एक छड़ी

बिल्कुल ऐसा ही हुआ था पांच साल पहले

लेकिन कोई याद नहीं करना चाहता उस घोड़े को

जिसकी टाप ने कर दिया था हमें बहरा

जिसके खुरों से उड़ने वाली धूल का कण अब भी

गड़ता है हमारी आंखों में और घुड़सवार के उतरते ही

हुई थी आकाशवाणी

हार कर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं

उसने हवा में जो रुमाल लहराया था उसमें लगी इत्र

की मादकता अब भी सिर चढ़ कर बोलती है

आदमी पागल

औरत पागल

बच्चे पागल

पागल बुज़ुर्ग

भीतर से दरकता हुआ एक दुर्ग

बाहर सवारियों को समेटती खचाखच भरी बस।

कोई छूटने न पाए

सबका साथ ही सबका विकास है।

मेरे आसपास आजकल बहुत कुछ घट रहा है

और बहुत तेजी से

और मैं असमंजस में हूं और यह कोई नई बात नहीं है

क्योंकि शादियों में उदास हो जाना अचानक बचपन से मेरी फितरत रही है

कोई मर जाए तो निस्संग हो कर मलंग हो जाना पुरानी

अदा रही है अपनी

एकाध बार पूछते हैं, कहते हैं लोग हाथ बढ़ाकर-

चढ़ जाओ

फिर प्रेरणा के दो शब्द कह कर हो लेते हैं फरार

अबकी बार मजबूत सरकार।

मैंने पिछले एक हफ्ते में दर्जनों लोगों से पूछा है कि प्रियंका गांधी के आने से कांग्रेस का वोट कैसे बढ़ेगा

सबके मन में केवल विश्वास है

पूरा है विश्वास हम होंगे कामयाब वाला

विश्वास पर दुनिया कायम है तो कांग्रेस क्यों नहीं?

एक बस में अंधविश्वास का भरा है पेट्रोल

दूसरे में विश्वास का

संदेह वर्जित है

विरासत में मिला जो कुछ भी है वही अर्जित है

हाउ इज़ द जोश

सब महामिलावट का है दोष।

मेरे आसपास आजकल बहुत कुछ घट रहा है

और बहुत तेजी से

इसीलिए

मैंने किया है निश्चय बहुत धीरे धीरे

ऐन चुनाव के बीच बच्चों को गणित पढ़ाऊंगा

तेजी से घटती हुई दुनिया में उन्हें जोड़ना सिखाऊंगा

न इस बस से आऊंगा

न उस बस से जाऊंगा

अपनी हदों में रहूंगा

पकी दाढ़ी वाले घुटे हुए आदमी की बातों में

नहीं आऊंगा

न पहनूंगा जूता न तानूंगा छाता

किसी के बाप का क्या जाता

अपना खेल

अपना हाता।

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