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नफरत ने कभी सुखद परिणाम नहीं दिया है, सिवाय बर्बादी, दुख, हिंसा, पीड़ा और अमानवीयता के

कृष्णकांत

“नफ़रत की नींव पर तैयार हो रहा यह नया देश तभी तक ज़िंदा रहेगा जब तक यह नफ़रत जिंदा रहेगी, जब बंटवारे की यह आग ठंडी पड़ने लगेगी तो यह नया देश भी अलग-अलग टुकड़ों में बंटने लगेगा.”

यह बात मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने बंटवारे के विरोध में 1946 में कही थी, जब दोनों पक्ष बंटवारे पर सहमत हो गए थे. लेकिन मौलाना आज़ाद एक ऐसे राष्ट्र सपना देख रहे थे जहां धर्म, जाति, सम्प्रदाय और लिंग किसी के अधिकारों में बाधा न बनें.

उन्होंने जिन्ना के द्विराष्ट्र के सिद्धांत को नकार दिया और हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्ष में खड़े हो गए. 15 अप्रैल, 1946 को बतौर कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आज़ाद ने कहा था, ”मैंने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान के रूप में अलग राष्ट्र बनाने की मांग को हर पहलू से देखा और इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि यह फ़ैसला न सिर्फ़ भारत के लिए नुकसानदायक साबित होगा बल्कि इसके दुष्परिणाम खुद मुसलमानों को भी झेलने पड़ेंगे. यह फ़ैसला समाधान निकालने की जगह और ज़्यादा परेशानियां पैदा करेगा.”

ये वही मौलाना आज़ाद थे जिन्होंने 1923 में ही कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में कहा था कि “आज अगर कोई देवी स्वर्ग से उतरकर भी यह कहे कि वह हमें हिंदू-मुस्लिम एकता की कीमत पर 24 घंटे के भीतर स्वतंत्रता दे देगी, तो मैं ऐसी स्वतंत्रता को त्यागना बेहतर समझूंगा. स्वतंत्रता मिलने में होने वाली देरी से हमें थोड़ा नुकसान तो ज़रूर होगा लेकिन अगर हमारी एकता टूट गई तो इससे पूरी मानवता का नुकसान होगा.”

लेकिन मुस्लिम लीग और जिन्ना जब मानने को तैयार नहीं हुए और देश भर में खून खराबे को उकसाते रहे तो अंतत: वे गांधी भी बंटवारे पर सहमत हो गए ​जो कुछ समय पहले तक कहते थे कि भारत का बंटवारा मेरी लाश पर होगा.

जिन्ना ने नया देश बनवा लिया, लेकिन मौलाना आजाद गलत नहीं थे. नफरत की नींव पर खड़े होते ही उस देश के दुर्दिन जो शुरू हुए तो आज तक नहीं रुके हैं. मौलाना आजाद की भविष्यवाणी को सच होने के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा. 1971 में ही नफरत में सीझा पाकिस्तान ढहकर दो टुकड़े हो गया.

दुनिया के इतिहास में नफरत ने कभी सुखद परिणाम नहीं दिया है, सिवाय बर्बादी, दुख, हिंसा, पीड़ा और अमानवीयता के. नफरत अथवा घृणा मनुष्य को अंधा कर देती है. जिन्ना एक उदाहरण हैं. अपने आसपास भी आप देख ही रहे होंगे.

इसलिए सोशल मीडिया पर हर आदमी को सिर्फ गालियां ही नहीं देनी चाहिए. अच्छे लोगों को सुनना चाहिए और अच्छे लेख पढ़ने चाहिए. आज मौलाना आजाद जैसे महान लोग तो नहीं हैं, लेकिन किसी किसी की बात में सच्चाई होती है, उसे सुनना चाहिए.

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