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बजट कम कर, किसानों की आय दुगनी के नाम पर अंधविश्वास का झुनझुना पकड़ाने की तैयारी

मुकेश असीम

बजट में किसानों को दुगनी आय का महामंत्र दिया गया है!
बताया गया है कि ज़ीरो बजट प्राकृतिक कृषि के जरिये किसान प्राचीन भारतीय ज्ञान की ओर लौटेंगे तो उनकी आय दुगनी हो जायेगी। प्राचीन भारतीय ज्ञान वाली यह कृषि कैसी होगी?

एक, किसान मुख्य फसलों के मध्य और फसल बोयें जिसे बेचकर आय बढ़े.
दूसरे, रासायनिक खाद व कीटनाशकों जैसे महँगे अवयवों के बजाय स्थानीय उपलब्ध गोबर, गौमूत्र, गुड, आदि का प्रयोग करें तो लागत कम हो जायेगी।
तीसरे, आर्थिक सर्वेक्षण में वैदिक कृषि की भी सलाह दी गई है हालाँकि उसके तरीके नहीं बताये गये। पर इतिहास कहता है कि वैदिक युग में लकड़ी के हल व बैलों से खेती होती थी, तो हम मान सकते हैं कि ऐसी खेती करने वाले किसान आधुनिक यंत्रों-तकनीक को त्यागकर बैल व लकड़ी के हल का प्रयोग शुरू करेंगे। 

एक हेक्टेयर से कम वाले किसानों की स्थिति फिलहाल यह है कि उन्हें हर फसल पैदा करना घाटे का सौदा है क्योंकि कम जमीन पर कम साधनों से की गई खेती में प्रयुक्त अवयवों की ज्यादा लागत व अधिक श्रम की आवश्यकता होती है जो आज के वक्त की सामाजिक तौर पर औसत कृषि लागत से अधिक है। किंतु किसी भी बाजार में औसत मूल्य से अधिक दाम कोई किसी को क्यों देगा? इसलिए इन 80% किसानों के लिए हर नई फसल व अधिक उत्पादन और भी अधिक हानि का बायस होगा। ये असल में अपने लगाये श्रम की औसत मजदूरी के बराबर आमदनी भी फसल बेचकर प्राप्त नहीं कर सकते, अन्य लागत की वापसी का तो सवाल ही नहीं उठता। एक और फसल उगाने से इनकी आमदनी नहीं बल्कि घाटा ही बढ़ेगा, अधिक उत्पादन से पूर्ति बढने पर बाजार दाम भी और कम ही होंगे। आज बचे समय में ये अन्य जगह मजदूरी कर जो कमा लेते हैं वो भी एक और फसल के चक्कर में बंद हो जायेगा।

जहाँ तक बैल,लकड़ी के हल, गोबर-गौमूत्र के खाद का सवाल है तो कोई भी व्यावहारिक किसान बता देगा कि इनको छोड़ने की वजह इनका आधुनिक यंत्रों-खादों-रसायनों से महँगा होना था। अगर ये सस्ते पड़ते तो किसान इनको छोड़ते ही क्यों? इनको सस्ता सिर्फ वही ‘कृषि विशेषज्ञ’ बता सकते हैं जिन्हें गेहूँ और धान के पौधों तक में फर्क मालूम न हो!

छोटी जोत वाली कृषि कभी लाभकारी नहीं हो सकती, उसका कोई भविष्य नहीं। इसमें नीम हकीमी नुस्खों के जरिये लाभ का सपना दिखाना इन गरीब किसानों के साथ शत्रुता का काम है जो संकटग्रस्त पूंजीवाद बढ़ती बेरोजगारी के आलम में इन्हें जमीन के इन टुकड़ों के साथ ही उलझाये रखने के लिए दिखा रहा है। कृषि भूमि के राष्ट्रीयकरण और सामूहिक खेती के अतिरिक्त अधिकांश गरीब-सीमांत किसानों के लिए कृषि समस्या का कोई समाधान नहीं.

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