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रिपोर्ट

अलीगढ़ घटना शर्मनाक, सावधान! राजनीति व नफरत की दुकान चलाने वाले माहौल खराब करना चाहते हैं

रणविजय सिंह

अलीगढ़ में एक ढाई साल की बच्‍ची की हत्‍या कर दी गई। इस मामले में करीब 7 दिन बाद ट्विटर और फेसबुक पर लोग जाग गए हैं। लेकिन जो जागे हैं उनमें से ज्‍यादातर सोते रहते तो बेहतर होता। क्‍योंकि जागे हुए लोग जैसी घिनही बात कर रहे हैं उससे माहौल खराब ही होगा। एक बात जो मैं साफ करना चाहता हूं वो यह है कि जो बच्‍ची मरी है न हिंदू थी, न मुसलमान। शायद इस बात का अंतर वो खुद भी न कर पाती। वो सिर्फ और सिर्फ एक बच्‍ची थी और उसे मारने वाले हैवान। बात इतनी ही है।

लेकिन कुछ लोगों को यह समझ ही नहीं आता। उन्‍हें तो बस अपनी राजनीति करनी है, अपनी नफरत की दुकान चलानी है। तो मामले में हिंदू मुसलमान करने लगे, देखने लगे धर्म और बेचने लगे धर्म। ऐसे लोग अगर यह बात जानते भी हैं कि लड़की के पिता और आरोपियों के बीच रुपयों के लेन-देन को लेकर विवाद था, दोनों के बीच झगड़ा भी हुआ था, आरोपी बदले की भावना रखता था, इन सारी बातों को जानने के बाद भी वो इसे विवाद का मामला नहीं बल्‍कि धर्म का मामला बनाते हैं। क्‍योंकि इसी से उनकी दुकान चलेगी।

दूसरा यह कि पुलिस बार बार कह रही है कि बच्‍ची का रेप नहीं हुआ है। लेकिन लोग मान ही नहीं रहे। क्‍योंकि रेप लिखकर उन्हें दो लाइक ज्‍यादा मिला जाएंगे, लोगों में गुस्‍सा जरा और ज्‍यादा भर जाएगा। लेकिन यकीन मानिए आपके रेप लिखने से सबसे ज्‍यादा अगर किसी का नुकसान हो रहा है तो वो उस बच्‍ची का हो रहा है। मैं गुजारिश करूंगा आप रेप होना न लिखें। यह गलत है। उस बच्‍ची के साथ भी गलत है जो मर चुकी है। उसकी मौत को ऐसे तमाशा मत बताइए। और अगर आप लाइक और शेयर बटोरने के लिए ऐसा कर रहे हैं तो यकीन मानिए आप भी उन हैवानों से कम नहीं हैं। मेरे मायनों में तो रेप कहना ही बच्‍ची की बार-बार हत्‍या करना है।

एक पक्ष और है जो इसे कठुआ से जोड़ कर प्रचारित कर रहा है। यह सवाल कर रहा है कि अब कहां हैं वो लोग जो ट्वीट कर रहे थे। हाथों में तख्‍ती लिए खड़े थे। मैं पूछता हूं आप अलीगढ़ को कठुआ का जवाब बनाकर पेश क्‍यों कर रहे हैं? क्‍यों जरूरी है कि कोई ट्वीट करे ही और आप होते कौन हैं इसपर सवाल करने वाले। क्‍या आप कठुआ के आरोपी के सगे हैं। क्‍या आप अलीगढ़ के आरोपी के सगे हैं। यह किस ओर बढ़ रहे हैं आप। बच्‍ची चाहे कठुआ में मारी गई या अलीगढ़ में मारी गई, दोनों ही मामले समाज पर कलंक हैं। हमें यह सोचने की जरूरत है कि हम किस ओर बढ़ रहे हैं, न कि यह कि मुसलमान की बच्‍ची थी या हिंदू की बच्‍ची थी। अगर आप यह कर रहे हैं, और इससे आपको संतोष मिल रहा है तो आपको खुद को आइने में देखना चाहिए, आप क्‍या बन रहे हैं।

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