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5 मार्च को दलित-पिछड़ों और आदिवासियों को आख़िर क्यों भारत बन्द करना पड़ा!

5 मार्च को सरकार की आदिवासी, अनुसूचित जाति एवं पिछड़ा विरोधी नीतियों के कारण देश भर में हुए भारत बंद ने कई सवाल खड़े किए जिनका जवाब सरकार को देते हुए नहीं बन रहा है। शांतिपूर्ण रूप से हुऐ इस बंद ने सरकार को सोचने पर मज़बूर कर दिया है। अनेक राजनैतिक पार्टियों के समर्थन से हुऐ इस बंद के यूँ तो बहुत से कारण थे। पर मुख्यतः 13 पोईंट रास्टर का विरोध और माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदिवासियों को जंगल से निकाले जाने का फ़ैसला दिए जाने के विरोध में इस बंद का आयोजन किया गया। 

13 पाॅईंट रॉस्टर
विश्वविद्यालयों इत्यादि में आरक्षण देने के मामले में पहले 200 पोईंट रास्टर को आधार माना जाता था। जिसमें पूरे विश्वविद्यालय को एक यूनिट मानकर आरक्षण दिया जाता था। परंतु पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट एवं इस साल सुप्रीम कोर्ट ने पद्धति को बदल दिया। इसमें 13 पोईंट रॉस्टर के अंतर्गत विश्वविद्यालयों के विभागों को आधार मानकर आरक्षण देने का आदेश दिया गया। ज़्यादातर विश्वविद्यालयों में मुश्किल से 2-3 प्रोफ़ेसर ही पूरे विभाग को चलाते हैं। ऐसी स्थिति में आरक्षण पिछड़े लोगों को देंगे, अनुसूचित वर्ग को देंगे, अनुसूचित जनजाति वर्ग को देंगे या फिर हाल ही में बनाए गये ग़रीब स्वर्णों की कैटेगॉरी को? जाहिर तौर पर इन वर्गों को विभाग़वार 13 पोईंट रॉस्टर में कोई लाभ मिलता नहीं दिख रहा। 

जंगलों से बेदख़ल करने का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 
अभी पिछले महीने 13 फ़रवरी को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक और ऐसा ही फ़ैसला दिया। जिसमें जंगलों में रहने वाले लोगों को ज़बरदस्ती निकालने का आदेश दे दिया। हालाँकि इस फ़ैसले में एस॰एल॰पी॰ डाल दी गयी है परंतु इसका कोई अनुकूल फ़ैसला आता आये इसकी कोई गारंटी नहीं है। 

जस्टिस अरुण मिश्रा, नवीन सिन्हा और इंदिरा बैनर्जी की तीन जजों वाली बेंच ने राज्यों को उन तबके को लोगों को जंगलों से बाहर निकालने का आदेश दिया जिनके शेड्यूल ट्राइब एंड अदर फ़ॉरेस्ट ड़वेल्लर्स ऐक्ट 2006 के अंतर्गत दावे निरस्त किए जा चुके हैं। 

आन्ध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओड़िसा, राजस्थान, तमिलनाडू, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिवों को ऐसे लोगों को अब तक ना निकाले जाने के लिए भी कोर्ट ने जवाब माँगा।

कोर्ट ने यह आदेश एनजीओ वाइल्ड लाइफ़ फ़र्स्ट (NGO Wildlife First) एवं कुछ सेवानिवृत अधिकारियों की याचिका पर सुनाया। इस याचिका के मुताबिक़ 44 लाख दावों में से लगभग 22 लाख 50 हज़ार दावों को निरस्त कर दिया गया था। केवल मध्य प्रदेश में ही 3 लाख 50 हज़ार दावों को निरस्त किया गया, वहीं ओड़िसा में लगभग 1 लाख 50 हज़ार दावों को निरस्त किया गया। ग़ौर देने वाली बात तो यह है कि गुजरात, गोवा और हिमाचल प्रदेश में तो अभी तो दावों पर कोई कार्यवाही ही नहीं हुई है। ऐसे में ये आँकड़े 20 लाख 50 हज़ार से भी कहीं ज़्यादा हो सकते हैं।

भारत बंद की आवश्यकता
जब सरकार जनता के हितों की अनदेखी कर रही हो और विपक्ष एवं जनता के चुने हुए प्रतिनिधि भी सांसद में जनता के हितों तो साधने में नाकाम हो रहे हों तो फिर ऐसे ही भारत बंद की आवश्यकता पड़ती है।

मूलभूत अधिकार
आंदोलन करना एक लौकतांत्रिक मूलभूत अधिकार है। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर यह जानते थे कि यदि लोकतंत्र में चेक एंड बैलेन्स (Check and Balance) नहीं रखा गया तो इसका दुरूपयोग भी हो सकता है। इसलिए उन्होंने आंदोलन करने के अधिकार को मूलभूत अधिकारों की श्रेणी में रखा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के अनुसार शांतिपूर्वक ढंग से आंदोलन अथवा प्रदर्शन करना, भारतीयों का मूलभूत अधिकार है।

अभी 2016 में भी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस ए॰ के॰ सीकरी और आर॰ के॰ अग्रवाल की बेंच ने भी एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा था कि शांतिपूर्ण तरीक़े से धरना प्रदर्शन करना एक मूलभूत अधिकार है। 

संयुक्त राष्ट्र का यूनिवर्सल डेक्लरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स (UDHR) भी अनुच्छेद 20(1) के तहत शांतिपूर्ण रूप से इकट्ठा होने का अधिकार देता है। भारत ही नहीं विश्व के सभी लौकतान्त्रिक देशों में इसी तरह के प्रदर्शन किए जाते हैं। अभी हाल ही में फ़्रान्स में हुए प्रदर्शनों ने भी दुनिया भर में सुर्ख़ियाँ बटौरीं थी। फ़रवरी में ब्राज़ील के आदिवासी लोग भी सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर थे।

जनता की आवाज़
इस तरह के आंदोलन सरकार में बैठे लोगों तक अपनी बात बेहतर ढंग से पहुँचाने के लिए भी बहुत ज़रूरी है। पिछले साल 2 अप्रैल को हुए भारत बंद में भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों ने अपनी बात भारत बंद करके सरकार तक पहुँचाई जिसका असर भी हुआ और सरकार को एक अध्यादेश भी लाना पड़ा। ठीक इसी तरह 5 मार्च को हुए भारत बंद का असर भी सरकार पर पड़ा और कल ही एक अध्यादेश भी आ गया। हालाँकि इस अध्यादेश में 13 पोईंट या 200 पोईंट का उल्लेख नहीं है, फिर भी इसके अनुसार शिक्षकों की भर्ती में यूनिवर्सिटी या कॉलेज को ही एक इकाई माना जाएगा।

पूरे बहुजन समाज पर असर
यदि कहा जाए कि रॉस्टर अथवा जंगलों से विस्थापन का किसी एक समुदाय विशेष पर असर पड़ेगा तो यह ग़लत होगा। रॉस्टर में अनुसूचित जाति अथवा जनजाति के लोगों को ही नहीं बल्कि अन्य पिछड़ा वर्ग को भी पड़ रहा था। जैसे कि इस वर्ग को 13 पोईंट रॉस्टर में चौथी सीट दी गयी थी। जबकि बहुत से विभागों में केवल 1-2 ही सीट होती है। दूसरे शब्दों में पिछड़ा वर्ग को भी रॉस्टर से नुक़सान था।

वहीं दूसरी तरफ़ यदि यह कहा जाए कि जंगलों से मनुष्यों के विस्थापन से सिर्फ़ आदिवासियों को ही फ़र्क़ पड़ेगा तो ऐसा नहीं है। इसका फ़र्क़ अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग पर भी उतना ही पड़ेगा। उदाहरण के तौर पर, फ़ॉरेस्ट प्रोटैक्शन ऐक्ट 2006, दो प्रकार के लोगों को मान्यता देता है। एक, ’फ़ॉरेस्ट ड्वेलिंग शेडयूल ट्राइब’ (Forest Dwelling Schedule Tribe) जिसमें जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लोग हैं। दूसरा, ‘अदर ट्रेडिशनल फ़ॉरेस्ट ड्वेल्लेरस’ (Other Traditional Forest Dwellers), जिसमें कोई भी जंगल में रहने वाला समुदाय अथवा 75 साल से अपनी आजीविका के लिए जंगल पर निर्भर लोगों को रखा गया है। जोकि अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग अथवा सामान्य वर्ग से भी हो सकता है। इस स्थिति में आदिवासियों से अलग भी बहुत से समुदाय एवं जातियाँ इस विस्थापन की शिकार हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, डोम जाति जोकि मुख्यत ओड़िसा एवं झारखंड में पाई जाती है, अनुसूचित जाति में आती है। जबकि इसका मुख्य व्यवसाय बाँस की लकड़ी के समान जैसे कि टोकते बनाना इत्यादि है। विस्थापन की स्थिति में यह जाति एवं ऐसी बहुत सी जातियाँ भी लपेटे में आएँगी। इसके साथ ही अनुसूचित जाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग पर तो इसका सबसे बुरा असर पड़ा है। बल्कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओड़िसा में दूसरी श्रेणी में जहाँ आदिवासियों से कम दावे किए गये थे; वहीं दूसरी और इन राज्यों में इस दूसरी श्रेणी के दावों के ख़ारिज होने की प्रतिशत दर आदिवासियों से ज़्यादा है। मध्य प्रदेश में इस श्रेणी के 1,50,664 एवं कर्नाटक के 1,41,019 ऐसे ही दावों को ख़ारिज किया जा चुका है।


इस परिस्थिति में यदि कोई यह सोचे की भारत बंद एक अनुचित क़दम है; क्योंकि रॉस्टर से हमें कोई नुक़सान नहीं है, या विस्थापन से सिर्फ़ आदिवासी समुदायों को ही नुक़सान है और हमें कोई परेशानी नहीं है; तो उनके लिए उर्दू के जाने माने शायर ‘राहत इंदौरी’ का एक शेर बहुत ही सटीक बैठता है कि ‘आग लगी है तो आएँगे कई ज़द में, यहाँ पर सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।’

परमीत काजल वर्तमान में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं।

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