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रिपोर्ट

न कोई आंदोलन हुआ, न कोई मांग उठी, फिर अमित शाह हिंदी को ऐसा क्या देना चाहते हैं, जो उसके पास नहीं है

राकेश कायस्थ

गृहमंत्री अमित शाह हिंदी को लेकर चिंतित है। वे हमेशा बातचीत में हिंदी का प्रयोग करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के लिए कसीदे पढ़ते वक्त उनकी करतूतों’ की तारीफ कर चुके हैं। पंद्रह लाख वाले मामले कोजुमला’ बता चुके हैं। महात्मा गांधी को चतुर बनिया’ करार दे चुके हैं। यानी हिंदी के इस्तेमाल को लेकर उनकी प्रतिबद्धता पर कहीं से कोई सवाल नहीं है। लेकिन अचानक हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का आइडिया दिमाग में कहां से आया? क्या हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है? क्या हिंदी पूरब से लेकर सुदूर दक्षिण तक को जोड़ने वाला सबसे बड़ा पुल नहीं है? क्या असम के चाय बगान और केरल के मसाला एक्सचेंज में काम करने वाला बिहारी मजदूर अपने मालिकों से अंग्रेजी में बात करता है?

मुझे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के शुरुआती दिन याद आते हैं। मैं जिन वीडियो एडिटर्स के साथ काम करता था, उनमें कई तमिलनाडु और केरल के रहने वाले थे। उनकी शिक्षा अपनी मातृभाषा में हुई थी। लेकिन साथ-साथ वहां के सरकारी स्कूलों में उन्हें हिंदी की शिक्षा भी मिली थी। उनमें कुछ ऐसे थे जिनकी हिंदी व्याकरण की समझ दिल्ली वालों से बेहतर थी। उन पुराने लोगों मुझे अभी सबसे ज्यादा रजीना (अब दिवगंत) की याद आ रही हैं, जो मलयाली भाषी हिंदी टाइपिस्ट थीं। खबरें उन दिनों कलम से लिखी जाती थी और रजीना उन्हें तूफानी रफ्तार से हिंदी में टाइप किया करती थीं। मात्राओं में छोटी-मोटी गलती तो खुद सुधार दिया करती थीं। अमित शाह ने जब एक देश और एक भाषा की बात कही तो मेरे जैसे आदमी का चकराना भी वाजिब है। आखिर वे हिंदी को अलग से क्या देना चाहते हैं जो उसके पास नहीं है? हिंदी को लेकर इस समय देश में ना तो कोई आंदोलन चल रहा है, ना ऐसी कोई मांग उठ रही कि इस भाषा का और सशक्तिकरण हो। उल्टे कुछ हिंदीभाषी राज्यों में सरकारें बच्चों की अंग्रेजी सुधारने पर ज़ोर दे रही हैं, ताकि उनका आत्मविश्वास बढ़े और वे नौकरियों के लायक बने। अमित शाह ने जो जुमला उछाला है, उसका सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक मतलब है और उसे समझने के लिए बहुत ज्यादा बुद्धि की भी आवश्यकता नहीं है। असली बात यह है कि संघ की राजनीति का पूरा मॉडल समूहों के ध्रुवीकरण और अलगाव के सिद्धांत पर आधारित है। मतलब यह कि बहुसंख्यकवाद को लगातार मजबूत किया जाये और जो जातीय, धार्मिक और भाषाई समूह साथ ना आये उन्हें इस कदर अप्रसांगिक बना दिया जाये उनकी अपनी ताकत खत्म हो जाये। राष्ट्रीय स्तर पर यह काम मुसलमानों के साथ हुआ है। क्षेत्रीय स्तर पर जाट, यादव, मराठा और जाटव जैसी कई हिंदू जातियों को भी बीजेपी ने लगभग अप्रसांगिक बना दिया है। सवाल यह है कि हिंदी की राजनीति को हवा देकर क्या होगा? तमिलनाडु और केरल को छोड़कर हिंदी का मुखर विरोध पूरे भारत में कहीं नहीं है। यह विरोध भी वैसा नहीं है, जैसा पचास या साठ के दशक में था। इन राज्यों का एतराज हिंदी के पठन-पाठन को लेकर नहीं है बल्कि उन्हें डर है कि उनकी अपनी भाषाई अस्मिता और संस्कृति खतरे में ना पड़ जाये। यह चिंता बहुत तक जायज भी है। तो अमित शाह ने जानबूझकर दो राज्यों की भावनाएं भड़का कर राष्ट्रीय स्तर पर एक बहुसंख्यवादी भावनात्मक ज्वर खड़ा करने दांव खेला है। उन्हें उम्मीद है कि अकूत संभावनाओं से भरा काउ बेल्ट जो अब सही मायने में गोबरपट्टी बन चुका है, उसका नौजवान यह मान लेगा कि जल्द ही इस देश से अंग्रेजी का वर्चस्व खत्म हो जाएगा और वह कांवड़ यात्रा पूरी करते ही सीधे आईएमएम, इसरो या आईआईटी में पहुंच जाएगा। सीधे-सीधे यह हिंदी हार्टलैंड के अल्प शिक्षित और कुंठित नौजवान वोटरों के लिए फैंटेसी की एक नई दुनिया रचने की तरकीब है। ट्रिपल तलाक नहीं तो कॉमन सिविल कोड, कॉमन सिविल कोड नहीं तो राम मंदिर और अब हिंदी। सारे घोड़े खोल दिये गये हैं। यह नहीं तो वह सही। कोई ना कोई दांव कामयाब ज़रूर होगा। अगर एक देश एक भाषा का नारा बुलंद हुआ तो इसके नतीजे क्या होंगे? दक्षिणी राज्यों के लोग मनोवैज्ञानिक रूप से बाकी देश से दूर होते चले जाएंगे। लेकिन इसकी चिंता किसको है? तमिलनाडु और केरल में वैसे भी कोई बीजेपी को वोट नहीं देता। वहां के लोगों को नाराज़ करके अगर पूरे भारत में फायदा हो रहा हो एतराज किसे होगा? कश्मीर का उदाहरण सामने है। चालीस लाख लोगों को स्थायी रूप से बंधक बनाने का फायदा यह है कि जयकारे बाकी देश में गूंज रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या इन सबकरतूतों’ से देश मजबूत हो रहा है या फिर धीरे-धीरे टूट रहा है?

मोदीजी सिंगापुर के सिस्टम के बहुत बड़े फैन हैं। शायद उन्हें याद हो कि सिंगापुर जैसे छोटे देश में चार आधिकारिक भाषाएं हैं, जिनमें तमिल भी शामिल है। सिंगापुर में तमिल आबादी सिर्फ 6 फीसदी है लेकिन आपको मेट्रो ट्रेन से लेकर हर सार्वजनिक जगह तमिल में एनाउंसमेंट सुनाई देगा। देश एकजुट बड़े दिल और खुले दिमाग से होता है। चालबाजियां तात्कालिक राजनीतिक फायदा दिला सकती हैं लेकिन देश अंतत: कमज़ोर ही होता है।

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