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आखिर क्योंं, कैसे और किसके इशारे पर राफेल डील में अंबानी की गोटियां फिट हुईं!

मार्च 2015 के चौथे सप्ताह में, राफेल पर नरेंद्र मोदी द्वारा नई डील की घोषणा करने के दो सप्ताह पहले, अनिल अंबानी फ्रांस के रक्षा मंत्री के प्रमुख सलाहकारों से मिले. यह मुलाकात पूरी तरह से गोपनीय और बहुत ही कम समय में नियोजित की गई थी.

इस मुलाकात में शामिल एक सलाहकार के अनुसार अंबानी ने यहां डिफेंस क्षेत्र में काम करने की इच्छा जताई. इसके साथ ही अंबानी ने एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग अर्थात् समझौता ज्ञापन के तैयार किए जाने और मोदी के दौरे दौरान उसपर साइन किए जाने की भी बात कही.

अंबानी जब फ्रांस के रक्षा मंत्री के ऑफिस गया, तब यह पता चल गया था कि प्रधानमंत्री मोदी 9 अप्रैल 2015 से फ्रांस के आधिकारिक दौरे पर जाएंगे. इस बीच अंबानी ने 28 मार्च को रिलायंस डिफेंस बनाई और जब मोदी 9 अप्रैल को फ्रांस जाकर राफेल पर नई डील की घोषणा की तो अनिल अंबानी मोदी के डेलिगेशन में शामिल था.

8 अप्रैल 2015 को मोदी के दौरे से एक दिन पहले वित्त सचिव एस जयशंकर ने मीडिया से बात की. इस दौरान उन्होंने राफेल सौदे को लेकर कहा कि फ्रेंच कंपनी, भारत के रक्षा मंत्रालय और HAL के बीच बात चल रही है.

राफेल पर मोदी के नए सौदे से पहले HAL को 108 राफेल विमान बनाने का लाइसेंस मिला था. जब मोदी ने नया सौदा घोषित किया तो HAL को उसमें से पूरी तरह हटा दिया गया.

नया सौदा तय होने पर अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस दस्सॉ की प्रमुख साझेदार बन गई. 7.87 बिलियन यूरो की डील में 30 हजार करोड़ रुपये ऑफसेट के तौर पर मिले. इसमें रिलायंस का हिस्सा कितना है, इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है.

अब इस खबर को हाल के खुलासों से जोड़कर देखिए. अनिल अंबानी के पास समझौता ज्ञापन और उसमें उल्लिखित बातों की जानकारी थी, जिसका फायदा उसने बखूबी उठाया. डील में भारत के रक्षा मंत्रालय की प्रमुख भूमिका थी लेकिन पीएमो ने अपने स्तर पर खेल खेला. ये खेल किसके लिए खेला, अब ज्यादा छुपा नहीं है. रक्षा सौदों में एजेंट, एजेंसी और कमीशनखोरी से जुड़े प्रावधानों को हटा दिया गया ताकि दस्सॉ और एमबीडीए को खुली छूट मिल जाए और ऑफसेट पार्टनर चुनने में दिक्कत ना हो.

बाद में रिलायंस डिफेंस और दस्सॉ एविएशन ने मिलकर एक ज्वाइंट वेंचर बनाया. इस वेंचर के तहत नागपुर में ऑफसेच डिस्चार्ज के लिए इंड्रस्ट्रियल प्लांट बनाया गया.

जाहिर है कि दस्सॉ और रिलायंस ने मिलकर खेल खेला. इसमें दोनों को फायदा हो इसलिए भारत सरकार ने किसी भी प्रकार की सरकारी या बैंक गारंटी की जगह केवल लेटर ऑफ कंफर्ट से काम चला लिया.

समाचार समाप्त हुए.

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