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क्या हम इन शहादतों की क़ीमत समझ रहे हैं?

हमारे 40 जवान शहीद हुए हैं. उन्होंने ये शहादत इसलिए दी कि ये देश बचा रहे, इसकी एकता और अखंडता बची रहे.

कोई भी जवान जब कश्मीर जैसी बारूदी घाटी पर तैनाती के लिए निकलता तो अपना कफ़न साथ लेकर निकलता है. वो आप जैसे पर्यटकों की तरह गुलमर्ग की वादियों का आनंद लेने नहीं निकलता जो जानते हैं कि उनकी जान को कोई ख़तरा नहीं, आतंकवादी उन्हें निशाना नहीं बनाएँगे. न ही वो जवान हम जैसे पत्रकारों की तरह कोई इम्यूनिटी लेकर निकलता है जो जानते हैं कि हिज़बुल के आतंकी भी उन पर आसानी से हमला नहीं करेंगे क्योंकि इससे उनकी कथित ‘लड़ाई’ कमज़ोर होगी.

जवान ये जानते और समझते हुए घर से निकलता है कि उस बारूदी घाटी में वही निशाना है, उसको मार गिराना ही आतंकियों का उद्देश्य है, उसका शरीर ही वह टार्गेट है जिसके लिए घाटी में कई बंदूक़ें घात लगाए तैनात खड़ी हैं. ऐसे में कश्मीर की घाटी पर उस जवान का बिताया एक-एक पल मौत के किसी टाइमर से कम नहीं है. लेकिन इसके बाद भी वो बिना किसी हिचक के घाटी की ओर बढ़ता है तो सिर्फ़ इस सोच के साथ कि भले ही वो ज़िंदा रहे न रहे, ये देश रहना चाहिए, इसकी एकता रहनी चाहिए.

लेकिन आज जब हमारे 40 जवान शहीद हुए हैं तो हम क्या कर रहे हैं? हम इन शहादतों का मज़ाक़ बना रहे हैं. हम अपने-अपने एजेंडा के अनुसार इनका इस्तेमाल कर रहे हैं. हम इतना गिर चुके हैं कि एक-दूसरे पर निशाना साधने के लिए हमने इन शहादतों को भी नहीं छोड़ा. मोदी का विरोध करने वाले पूछ रहे हैं कि 56 इंची सीना कहाँ गया, सरकार के पक्षधर पूछ रहे हैं कि मानवाधिकार कार्यकर्ता कहाँ गए, कुछ पत्रकार बोल रहे हैं कि देखो गोदी मीडिया कैसे इसे टीआरपी के लिए भुना रहा है, कुछ अन्य पत्रकार बोल रहे हैं कि देखो वामी मीडिया आज कैसा बर्ताव कर रहा है… हर पक्ष अपने-अपने निशाने पर इन शहादतों के बहाने निशाना साध रहा है. 40 जवान एक साथ हमारे देश की एकता के लिए शहीद हो गए और हमने उनकी शहादत को ही आपस में कीचड़ उछालने का बहाना बना लिया.

आज हम सबको एक-दूसरे का हाथ थामे खड़ा होना चाहिए था. कंधे से कंधा मिलाते हुए दहशतगर्दों को यह संदेश देना था कि उनकी ऐसी कायरना हरकत ने हमें तोड़ा नहीं बल्कि जोड़ा है.

पाकिस्तान या कश्मीर के जो चुनिंदा लोग इस हादसे का जश्न मना रहे हैं, वो हैवान हैं. हमें उन्हें गाली देकर जवाब नहीं देना बल्कि एक साथ खड़े होकर ये दिखाना था कि हम उन जैसे हैवान नहीं हैं और न ही हम कभी ख़ुद को उनके जैसा बनने देंगे. यह समय किसी को ललकारने, सरकार पर दबाव बनाने, बदला लेने, एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने या लोगों को गालियाँ देने का नहीं बल्कि उस एकता के प्रदर्शन का समय है जिस एकता लिए हमारे भाइयों ने अपनी शहादत दी है.

ये बात सही है कि सुरक्षा में चूक हुई है और इसकी ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए, ज़िम्मेदार लोगों से सवाल पूछे जाने चाहिए. लेकिन उससे भी पहले ये समय सारी दुनिया को और इस घटना को अंजाम देने वालों को यह दिखाने का है कि ऐसी कायरना हरकत हमें तोड़ नहीं सकती. बल्कि हमें एक साथ ला खड़ा करती है. हमें उन्हें दिखाना है कि ऐसी घटना पर देश में कोई दो पक्ष हो ही नहीं सकते. हमारे भीतर चाहे जितने भी मतभेद हों लेकिन ऐसी घटनाओं पर हम सब एक साथ खड़े हैं, हम सब मानवता के साथ खड़े हैं, हम आदमी के पक्ष में और आदमखोरों के ख़िलाफ़ खड़े हैं.

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