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अतिशी या दीपेंदर हूडा जैसे प्रत्यशियों की हार और प्रज्ञा ठाकुर की जीत से क्या साबित हुआ?

श्याम मीरा सिंह

पिछले दो लोकसभा चुनावों से साफ हो चुका है कि आम चुनावों में विचारधाराएं महत्वपूर्ण हो चली हैं। जहां प्रत्याशी गौण होता जा रहा है। यही कारण है कि आतिशी हारती हैं और प्रज्ञा भारती और साक्षी महाराज जैसे लोग जीत जाते हैं। ऐसा नहीं है कि लोग आतिशी के काम से परिचित नहीं थे या दीपेंद्र हूडा के काम की तारीफ नहीं करते थे लेकिन उनके लिए यह चुनाव विकास से ज्यादा विचारधारा की लड़ाई थी।

भाजपा ने अपने वोटर को एडुकेट किया है भाजपा ने पहले मिसइन्फॉर्मेशन का साम्राज्य तैयार किया… फिर नेहरू, गांधी से लेकर राजीव गांधी तक अकबर तक के बारे में अपने वोटरों को प्रोपोगंडा द्वारा राजनीतिक साक्षरता दी.. उस मिसिन्फॉर्मेशन को उसने टीवी, फर्जी वेबसाईटों और व्हाट्सअप द्वारा घर के अंदर बाथरूम में बैठे हुए वोटर तक भी पहुंचाया।

जिस आम वोटर को बगल के आसियान कंट्रीज के बारे में नहीं पता वह इजराइल की बहादुरी पर आपको ज्ञान दे सकता है। जिस आम आदमी को नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया बुक के बारे में नहीं पता लेकिन नेहरू का नाम आते ही उसके मुंह से “लड़कीबाज” और “चरित्रहीन” जैसी उपमाएं ही निकलेंगी। जिसे नहीं पता कि गांधी ने अफ्रीका में किसप्रकार रंगभेद के खिलाफ संघर्ष तैयार किया उसे गांधी के “ब्रह्मचर्य के प्रयोग” के बारे में पूरा ज्ञान है।

इस मिसइन्फॉर्मेशन के साम्राज्य ने भाजपा और संघ के समर्थन में एक भीड़ तैयार की है। ऐसी भीड़ जो केवल वोटर नहीं है बल्कि सक्रिय होकर एडवोकेसी करने वाली पूरी आर्मी है।

कांग्रेस के पास अपनी कोई विचारधारा थी नहीं। कम्युनिस्टों के पास थी जिसे वह गांव क्या! शहरों में भी न फैला सके। विचारधारा का यह अवकाश ही है जिसने भाजपा के लिए खुला मैदान छोड़ दिया।

आपने देखा होगा संघ और भाजपा समर्थक कांग्रेस से ज्यादा वामपंथियों से चिढ़े हुए होते हैं यह वामपंथ की ताकत और भय दोनों ही है कि भारत जैसे बड़े देश की केंद्र सरकार जेएनयू जैसे एक विश्विद्यालय के पीछे पड़ गई।

मुसलमानों को भाजपा ने अपना एक कॉमन दुश्मन बनाया जिसका बचाव करना किसी भी विपक्षी पार्टी के बस की बात नहीं थी। भाजपा अपने मंसूबे में इतनी सफल हुई कि राहुल और प्रियंका भी मंदिरों में जाकर लेट गए। यह दिखाने के लिए कि वह भी हिन्दू हैं कांग्रेस का साम्प्रदायिक राजनीति के सामने इसकदर घुटने टेकना ही संघ की जीत थी। लड़ाई अब दो पार्टियों की नहीं है विचारधाराओं की है। अनैतिकता और साम्प्रदायिकता का तोड़ साम्प्रदायिक होकर नहीं किया जा सकता। बहुजन आंदोलन के पास डा. अम्बेडकर जैसे प्रेरक नायक होने के बावजूद बहुजन आंदोलन चुनावों को प्रभावित न कर सका!

क्यों ? क्यों कि उसके लीडरों में सच्चाई नहीं थी, नैतिकता नहीं थी। लोहिया के विचारों पर दावा भरने वाली पार्टी खुद सबसे अधिक लोहिया विरोधी रही। साम्प्रदायिकों के खिलाफ गुंडों और भ्रस्टाचारियों को खड़ा करना जनता को विकल्पविहीन छोड़ देना जैसा है।

साम्प्रदायिक विचारधारा के सामने लड़ाई अनैतिकता के सहारे नहीं लड़ी जा सकती। समय के नैतिक प्रतिमान ही उससे लड़ सकेंगे। आज दोबारा से डा. अम्बेडकर, कांशीराम, लोहिया और गांधी के विचारों को सच्चाई के साथ लेकर लड़ने का वक्त है। आप अनैतिकता के साम्राज्य का सामना छोटे मोटे धनुषवाण लेकर नहीं कर सकते।

डॉ. अम्बेडकर के तर्क ही इस मिसिन्फॉर्मेशन का जवाब होंगे। गांधी की सादगी ही अम्बानी के धनबल को हरा सकती है। कांशीराम का साइकिल से गांव गांव जाना ही मोदी के हेलिकॉप्टर वाली रैलियों को हरा सकता है…

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