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जवानों पर हमले का दृश्य देखकर लोग रो रहे हैं, सत्ता को यह रुदन सुनाई देना चाहिए, आओ सामूहिक रुदालियाँ गाएं

आवेश तिवारी

श्रीनगर में सीआरपीएफ़ के बहादुर जवानों पर हमले के पीछे केवल आतंकी नहीं है बल्कि इंटेलिजेंस एजेंसियों और उच्चाधिकारियों की घोर लापरवाही भी है| यह हमला हमारी सुरक्षा एजेंसियों की कार्यशैली पर भी सवाल खड़ा करता है और बताता है कि बस्तर से लेकर बारामुला तक जवानों की जिंदगी से कैसे खिलवाड़ किया जा रहा है|

1- आप अंदाजा लगाइए जम्मू श्रीनगर हाईवे दो दिनों से बंद है और हाइवे खुलते ही 2,500 जवानों को एक साथ श्रीनगर कूच करने का फैसला सुना दिया जाता है, वो भी ऐसे इलाके में जहाँ हर वक्त हमले का खतरा रहता है जबकि होना यह चाहिए था कि पूरे रास्ते को क्लियर रखा जाए ,जानकारी मिल रही है कि रवानगी से पहले एरिया डोमिनेट करने और सेनीटाइजेन की कोशिश नहीं की गई।

2- जिस स्कार्पियो से आत्मघाती हमले को अंजाम दिया गया उसमे दो लोग बैठे थे और तक़रीबन 350 किलो विस्फोटक था यानि कि 60 किलो के आधा दर्जन आदमियों के लायक विस्फोटक कल्पना करिए एक सड़क जिस पर से 2,500 जवान गुजरने वाले हो एक गाडी इतना विस्फोटक लेकर आ जाती है और उसे कोई नहीं रोकता जबकि किसी भी अन्य वाहन को आस पास नहीं भटकने देना था।

3- सीआरपीऍफ़ अपने इंटेलिजेंस विंग को मजबूत करने के लिए सरकार से लगातार पैसे मांग रहा है लेकिन इसको लेकर कोई कवायाद नहीं की गई सीआरपीएफ को इंटेलिजेंस के लिए लोकल पुलिस या फिर गृह मंत्रालय के फीड पर निर्भर रहना होता है।

4- सीआरपीऍफ़ और बीएसऍफ़ से सेना का काम लिया जा रहा है तो इसमें अधिकारियों के तौर पर पूरी तरह से नाकारा हो चुके आईपीएस को तैनात करने की क्या वजह है ? क्यों नहीं आर्मी के ट्रेंड अफसरों को तैनात किया जाता है।

आज के हमले में शहीदों की सूची मिली है,इसमें एक नाम हेड कांस्टेबल नसीर अहमद का भी है, इसमें आदिवासी भी हैं, पहाड़ के युवा भी हैं, गंवई जवान भी है| हर हिन्दुस्तानी को यह बात याद रखनी चाहिए कि शहादत देने वालों में देश का गरीब, पिछड़ा आदिवासी तबका था| भागलपुर के रतनपुर गाँव के रतन कुमार की शाहदत हुई है तो यूपी में चंदौली का अवधेश यादव भी चला गया| शाहदत वो देगा आप माल काटेंगे,आप हिन्दू मुस्लिम करेंगे, आप राफेल करेंगे और दिखाएँगे कि कश्मीर में बहुत शान्ति है तो यह नहीं चलेगा , हरगिज नहीं चलेगा| कश्मीर अशांत है और पिछले पांच वर्षों में और ज्यादा अशांत हुआ है| अगर आपकी सर्जिकल स्ट्राइक में दम होता तो हिम्मत नहीं होती किसी की ,आप हाफिज को उसके अंजाम तक पहुंचाते तो वो न होता जो आज हुआ है, आप फेल हुए है पूरी तरह से फेल हुए हैं|

अभी 17 जवानों का पता नहीं चल रहा हैं न मिलने का मतलब आप समझ रहे होंगे न ? उनके घर वालों के नंबर हैं हमारे पास, कैसे पूछूं कि क्या हुआ? कहाँ हैं पंकज त्रिपाठी? कहाँ है जीत राम? वंदना नितिन को क्या कहूँ? मीना साहू से क्या पूछूं? क्या बोलू शाजिया कौसर को? कौन लेगा इन बेकसूर जवानों के शहादत की जिम्मेदारी? यह यक़ीनन राष्ट्रीय शोक का वक्त है लेकिन यह भी मानना होगा कि हमारा देश नेतृत्व विहीन है कुछ लोग हैं जो एक सरकार चला रहे है कुछ लोग हैं जो उस सरकार को वाह वाह कर रहे हैं कुछ लोग है जो बस यह दृश्य देखकर रोये जा रहे हैं| सत्ता को यह रुदन सुनाई देना चाहिए, आओ सामूहिक रुदालियाँ गायें|

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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