लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

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ग़रीबों-मज़दूरों की थाली से रोटियाँ ग़ायब, पर गोदी मीडिया में ग़रीब ही ग़ायब!

अनुपम जुलाई 2019 में आयी विश्व खाद्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 19 करोड़ 44 लाख लोग अल्पपोषित हैं, यानी देश के हर छठे व्यक्ति को मनुष्य के लिए ज़रूरी पोषण वाला भोजन नहीं मिलता। इसी तरह…

व्लादिमीर लेनिन की पुण्यतिथि पर पढ़ें उनका लेख: हड़तालों के विषय में

व्लादिमीर लेनिन इधर कुछ वर्षों से रूस में मजदूरों की हड़तालें बारम्बार हो रही हैं। एक भी ऐसी औद्योगिक गुबेर्निया नहीं है, जहाँ कई हड़तालें न हुई हों। और बड़े शहरों में तो हड़तालें कभी रुकती ही नहीं। इसलिए यह…

छपाक रिव्यु: चीख़ में छिपी भाषा भविष्य में सामने आयेगी जब एक संवेदनशील समाज होगा

शुभा “छपाक” इस मायने में एक साहसिक फिल्म है कि यह हिन्दी फिल्मों और समाज में दूर तक छाई हुई उपभोक्तावादी सौंदर्यदृष्टि को किनारे करती है. एक हस्तक्षेपकारी मनुष्य -दृष्टि से काम लेते हुए यह सुन्दरता के प्रति मौजूद रूढ़…

रोहित वेमुला का आखरी खत: ‘मनुष्य को कभी एक मस्तिष्क की तरह बरता ही नहीं गया’

रोहित वेमुला के आखिरी ख़त का अनुवाद – जब आप यह ख़त पढ़ेंगे, उस वक़्त मैं यहां नहीं रहूंगा। मुझ पर नाराज़ न हों। मुझे पता है कि आप में से कुछ लोग वाकई मेरी परवाह करते हैं, मुझ से प्यार…

नागरिकता क़ानून-एनआरसी पर प्रदर्शन में कौन ढूंढ रहा है हिंदू-मुसलमान?

प्रोफेसर अपूर्वानंद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों पर हुए हमले से पैदा हुई राष्ट्रीय उत्तेजना और विक्षोभ ने कुछ समय के लिए नागरिकता संबंधी क़ानून और नागरिकता के लिए पंजीकरण के ख़िलाफ़ चल रहे राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध की ओर से ध्यान…

आज विवेकानंद को नये कट्टर हिन्दूत्व के दार्शनिक योद्धा के रूप में बदल दिया गया है

आशुतोष कुमार पांडेय दोनों हाथों को मोड़कर छाती से सटाये और नेपोलियन की तरह टकटकी लगाकर कठोर मुद्रा बनाये स्वामी विवेकानंद हिन्दू धार्मिक प्रथाओं में दमन देखकर मानसिक वेदना के कारण विक्षिप्तता की ओर बढ़ रहे थे।विवेकानंद को निजी प्रेरणा…

‘I am worried about the way this Government has been functioning’

Sharad Yadav I condemn the idea of the Government for unification of services in the Railways with the basic objective of ending departmentalism. It is not a well thought and well perceived decision. Every organization is bound to have departments…

बिहार में पढ़ने वाले बच्चे जेएनयू, जामिया और डीयू को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?

दीपक कुमार कल मैं पटना के एक मॉल में कुछ कपड़े खरीदने पहुंचा था. जहां दो लड़के आपस में मोबाइल नंबर एक्सचेंज कर रहे थे. शायद दोनों दोस्त थे जो बहुत दिनों बाद मिले हों. एक ने व्यंग्य के लहजे…

जेएनयू हमले के बाद ‘दंगाई’ मीडिया के ख़िलाफ़ पत्रकारों का विरोध प्रदर्शन

जेएनयू में गुंडों के हमले के बाद पत्रकार अपने मीडिया मालिकों और एंकरों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं. 6 जनवरी को दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान में रोज़ाना साम्प्रदयिक जहर उगलने वाले टीवी चैनल्स, अख़बारों के ख़िलाफ़ पत्रकारों…

एक नज़्म के ख़िलाफ़ जंग क्यों?

लेखक: अजय शर्मा हिंदुस्तान के हुकमरानों को तो छोड़ ही दें, ख़ुद पाकिस्तान में भी फ़ैज़ को लेकर कन्फ़्यूज़न रहा है. ‘हम देखेंगे’ पाकिस्तान के पूर्व सैन्य तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ़ की पसंदीदा नज़्म रही है. फ़ैज़ की कविताएं बेहद परतदार…