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भू-लुटेरों की पत्नियाँ क्या करें!

अव्यक्त

संलग्न तस्वीरें उस दौर की हैं जब अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में पहुँचे गोरे वहाँ के आदिवासियों का अपनी मनमर्जी से ‘शिकार’ करते थे। लेकिन पहली तस्वीर में देखनेवाली बात है बग्घी से झाँकती गोरे की निष्ठुर पत्नी का चेहरा।

प्रकारांतर से यह तस्वीर सोनभद्र में जमीन हथियानेवाले जिलाधिकारी की पत्नी की भी हो सकती है। वही पत्नी जिसके नाम से उसने ज़मीन खरीदी थी।

नीचे वाली तस्वीर में बंदूक लहराते लोग ऐसे जिलाधिकारियों के दबंग ‘समगोत्री’ भी हो सकते हैं।

आदिवासियों पर तो यह हमला प्रकट रूप से इस तरह हो रहा है जैसे यह भारतीय समाज की एक स्वीकृत परिघटना बन गई हो। कोई सुननेवाला नहीं है। जाओ! कहोगे किससे? हर जगह हम ही बैठे हुए हैं।

लेकिन छिपे तौर पर भारत का गैर-आदिवासी समुदाय का एक बड़ा हिस्सा भी इसका शिकार हो रहा है, भले ही उसे खुद भी यह दिखाई नहीं दे रहा हो।

ग़ुलामों की ग़ुलामी का सबसे बड़ा कारण यह होता है कि उसे अपनी ही ग़ुलामी दिखनी बंद हो जाती है।

भारत में सबसे बड़ा छिपा हुआ घोटाला भू-स्वामित्व का है। इसका जातिगत, वर्गीय और लैंगिक पैटर्न भी आसानी से देखा और समझा जा सकता है।

भारत का ज्यादातर कस्बाई और ग्रामीण समाज भूमि-विवादों में फँसा हुआ समाज है, जिसका निपटारा (?) भी शोषक वर्ग के पटवारियों, वकीलों, जजों और अधिकारियों के हाथों में है।

भूमिहीन और अत्यल्प भूमि में किसी तरह बसर कर रहे परिवार दो-दो धूर वासडीह के लिए आपस में ही झगड़ा-फसाद-मुकदमों में आजीवन फंसे रहते हैं।

भारत का ग़रीब पहले तो कुपोषण, गंदगी और दूषित जल का शिकार होकर बीमार पड़ता है। उसके बाद हर नुक्कड़ पर एक तोंदिल निजी चिकित्सक दुकान सजाकर बैठा होता है। वहाँ ये ग़रीब सुबह से शाम तक लाइन लगाकर खड़े रहते हैं।

वह महंगी फीस लेकर उनका इलाज करता है। इसके अलावा अनावश्यक जाँच और घटिया कंपनी की महंगी दवाओं से अलग कमाता है। लोगों की जान से खेलकर उनके पैसे खसोटता है। और इसके बाद इनके दलाल घूम-घूमकर बिकाऊ ज़मीनों की सुंघानी लिए फिरते हें।

यह पोस्टकार जब गाँव में रहता था तो इसके पास भी दिन में दो-एक ऐसे पुछक्कड़ बहुत ही बेशर्मी से पूछने आ ही जाते थे। धीरे-धीरे यह पहचानने लगा था कि कौन सा पुछक्कड़ किस डॉक्टर, सेठ या अधिकारी का दलाल है।

अपना सबकुछ गँवाकर छोटी-छोटी जोत वाला किसान गंभीर बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में अपनी खेती वाली ज़मीन बेचने पर बाध्य हो जाता है। बाकी बची ज़मीन बेटी के ब्याह और माता-पिता के श्राद्ध या खुद उसके अपने मृत्युभोज में बिक जाती है।

खरीदनेवाला कौन होता है यह ऊपर लिखा जा चुका है।

इस तरह छोटे शहरों और कस्बों की सारी बिकाऊ ज़मीनें महंगे दामों पर इन धनपशुओं ने खरीद ली हैं। जिस ज़मीन तक सड़क पहुँच गई, वह ज़मीन गरीबों की पहुँच से बाहर हो चुकी समझिए।

इसका एक कारण बेतहाशा भ्रष्टाचार कर इकट्ठा किए गए कालेधन को ज़मीन खरीदने में खपाना भी है। इनकी वजह से जमीनों का इतना अधिमूल्यन हो चुका है कि सामान्य लोगों के लिए ईमानदारी की कमाई से वासभूमि या बासगीत खरीदना मुश्किल होता जा रहा है।

बड़े शहरों की तो बात ही जाने दें, छोटे कस्बों और गाँवों में इनके लिए कहीं ज़मीन नहीं बची है।

महाजनों के पास सूदभरना और महदानामा में भी गरीबों की ज़मीनें गईं। बैंक लोन के कुचक्र में फँसकर भी ज़मीनें गईं। कुछ कुपुत्रों और कुपात्रों की ज़मीनें नशाखोरी और व्यभिचारी में भी गई। कहाँ तक बताएँ।

भारत में अगर सही सर्वेक्षण की कोई प्रणाली होती, तो पता चलता कि केवल स्थानीय सेठ ही नहीं, चपरासियों से लेकर क्लर्कों, बाबुओं, बाबू साहबों और राज-अनैतिक साहेबानों के पेट में सारी ज़मीनें समाती जा रही हैं। लेकिन वह पेट है कि ब्लैक होल है, यह समझ में नहीं आ रहा।

और इन सबके ऊपर बिल्डरों और कॉरपोरेटी लुटेरों का खुला खेल तो चल ही रहा है। उसके लिए तो ‘ब्लैक होल’ की उपमा भी छोटी पड़ जाएगी।

लेकिन बात शुरू हुई थी बग्घी से झाँकती गोरे की पत्नी से। अब उम्मीद केवल उसी से बची है।

हत्यारे भू-लुटेरों की पत्नियों की करुणा जाग जाए। वह इन्हें दुत्कारना शुरू करें। परोस कर खिलाना बंद करें। इन्हें अपना शरीर न छूने दें। कहें कि जाओ तुम्हारे हाथों से ग़रीब भूमिहीनों और आदिवासियों के खून की बू आती है।

बहनों! तुम्हारे सारे गठिया-वात, मोटापा, मधुमेह, डिप्रेशन और चेहरे पर असमय पड़ती जा रही झाइयों का इलाज यही है। तुम इन लुटेरों का साथ देना बंद करो।

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