लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

राजनीति

मुक़ाबला त्रिकोणीय, अब यह बेगूसराय पर निर्भर है कि वह इतिहास को किन हर्फ़ों में लिख पाता है

हेमंत कुमार झा

बेगूसराय में 2014 में राजद के तनवीर हसन भाजपा के भोला सिंह से महज़ 50 हजार वोटों से पराजित हुए थे। यह तब हुआ था जब सीपीआई के उम्मीदवार भी मैदान में थे और उन्हें 1 लाख 92 हजार वोट हासिल हुए थे।

2019 में अगर कन्हैया कुमार सामने नहीं आए होते तो तनवीर हसन ही भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ मुख्य मुकाबले में होते। मोदी लहर के बावजूद बेगूसराय में भाजपा की जीत का अंतर बड़ा नहीं था। इस बार वैसी कोई लहर नहीं है। मुकाबले में भोला सिंह नहीं, गिरिराज सिंह हैं।

भोला सिंह स्थानीय थे और क्षेत्र में उनका निजी प्रभाव भी काफी था। आखिर, कई दशकों से वे इस इलाके की राजनीति में सक्रिय रहे थे और गांव-गांव में उनकी निजी पहचान थी। इस मामले में गिरिराज जी भोला सिंह के मुकाबले थोड़े हल्के पड़ते हैं।

पिछली हार के बावजूद तनवीर हसन ने अपना उत्साह नहीं खोया था और बीते वर्षों में लगातार वे इलाके में घूमते रहे, जनता से उनका संपर्क बना रहा। सहज स्वभाव और सर्व सुलभ रहने की उनकी कोशिशों ने उनके प्रभाव का विस्तार भी किया। जाहिर है, इस बार तनवीर हसन के लिये बेहतर मौका था।

लेकिन…परिदृश्य में कन्हैया कुमार के आने से तनवीर हसन की संभावनाओं पर सवाल खड़े हो गए। वर्षों की उनकी मेहनत पर पानी फिरने का खतरा उत्पन्न हो गया।

यद्यपि, बेगूसराय संसदीय क्षेत्र में राजद की जीत का कोई सिलसिला नहीं रहा है लेकिन परिसीमन के बाद क्षेत्र के जो नए समीकरण बने, उसमें इसका अच्छा-खासा जनाधार है। 2014 का चुनाव सामान्य नहीं था। आमतौर पर, जब भी कोई लहर होती है तो चुनाव सामान्य नहीं रह जाते। लेकिन, इस बार भाजपा समर्थकों में भी मोदी के प्रति वैसा उत्साह नहीं था जैसा पिछली बार था। इसका असर उनके वोट गिराने के प्रतिशत पर पड़ना तय था। अंततः…यह सब तनवीर हसन की चुनावी संभावनाओं को ही मजबूत करता।

लेकिन…। कह सकते हैं कि यह राजद से अधिक निजी तौर पर तनवीर हसन की त्रासदी है कि वे देश-दुनिया में कन्हैया कुमार के रास्ते का कांटा नजर आने लगे हैं और अनेक हलकों में यह बात भी उठने लगी है कि राजद को अपना उम्मीदवार वापस ले लेना चाहिये।

उस प्रत्याशी की मनःस्थिति के बारे में विचार करें जो इस बार जीत कर संसद पहुंच सकता था लेकिन हालात ऐसे बने कि देश के बुद्धिजीवियों और ‘सोशल एक्टिविस्ट्स’ का एक बड़ा वर्ग उसके बैठ जाने का हामी हो गया है।

क्योंकि…दांव अब बड़ा हो गया है। इतना बड़ा…कि राजद की एक सीट या तनवीर हसन की ज़िंदगी भर के राजनीतिक संघर्षों को इस दांव पर लगाने के लिये बहुत सारे लोग तैयार हैं। अब यह राजद के थिंक टैंक को सोचना है कि अगला कदम क्या उठाया जाए।

कन्हैया की जगह सीपीआई का कोई और प्रत्याशी होता तो बेगूसराय के चुनावी संघर्ष का यह रंग नहीं होता, न ही इसकी इतनी चर्चा होती। अधिक संभावना यही रहती कि त्रिकोणीय संघर्ष में वामपंथी प्रत्याशी पिछली बार की तरह तीसरी पोजिशन पर रह जाता।

लेकिन…कन्हैया की उम्मीदवारी साधारण नहीं है। वह एक प्रतीक बन गए हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की राजनीतिक प्रवृत्तियों, सत्ता और कारपोरेट के जनविरोधी गठजोड़ के खिलाफ आम युवाओं के विरोध का प्रतीक।

दरअसल, जेएनयू के बहाने मोदी सरकार की जो विश्वविद्यालय विरोधी मानसिकताएं सामने आयीं, विचारधाराओं का जो संघर्ष सामने आया, नीतियों की आड़ में कारपोरेट निर्मित ‘ब्रांड मोदी’ के जो खेल सामने आए…उसके प्रतिरोध में न सिर्फ जेएनयू में, बल्कि देश के अनेक कैम्पसों में, अनेक शहरों में प्रतिरोध की आवाजें उठीं।

हालातों ने कन्हैया कुमार को प्रतिरोध की इन भावनाओं के केंद्र में ला दिया। इतिहास अक्सर ऐसे भी बनते हैं।

प्रतिरोध का वह स्वर अब बेगूसराय के चुनावी मैदान में उतर आया है। जेएनयू के बहाने विश्वविद्यालय संस्कृति और सत्ता के बीच जो अंतर्विरोध सामने आए, उसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति का मैदान अब बेगूसराय संसदीय क्षेत्र बन गया है। तभी तो…देश-दुनिया की निगाहें बेगूसराय पर केंद्रित हो गई हैं।

कन्हैया की जीत उन सवालों को सतह पर ला खड़ा करेगी जिसे यत्न पूर्वक सत्ता ने नेपथ्य में धकेल दिया है। शिक्षा का सवाल, रोजगार का सवाल, अंधाधुंध निजीकरण का सवाल, आम जन के संवैधानिक अधिकारों का सवाल…।

कन्हैया कुमार अगर जीतते हैं तो यह गिरिराज सिंह से अधिक, सीधे ‘ब्रांड मोदी’ की हार होगी। इस चुनावी परिणाम की खबर अमेरिका और यूरोप के अखबारों में भी आएगी, क्योंकि यह हार सिर्फ भाजपा की नहीं होगी, बल्कि राष्ट्रवाद की भ्रामक आड़ में कारपोरेटवाद के खेल खेलती सत्ता की हार होगी। यह सांस्कृतिक विभाजन की राजनीति की हार होगी।

लेकिन, यह लड़ाई कतई आसान नहीं है। अगर राजद के तनवीर हसन अपनी उम्मीदवारी वापस नहीं लेते, तब तो सारी वैचारिक क्रांति धरी की धरी रह जा सकती है क्योंकि देश-दुनिया के बुद्धिजीवियों की राय अपनी जगह, स्थानीय मतदाताओं का मनोविज्ञान अपनी जगह।

मीडिया के शोर, नामांकन में उमड़ी भीड़ आदि के बावजूद इस बात की अधिक संभावना नहीं लगती कि गिरिराज सिंह के वोट आधार में कन्हैया प्रभावी सेंध लगा पाएंगे। अतिउत्साह में भाजपा के रणनीतिकारों को कमजोर समझना सही नहीं होगा।

यह जरूर है कि इस त्रिकोणीय संघर्ष में भाजपा के कोर वोटर जिस अनुपात में कन्हैया की ओर झुकेंगे, उनकी संभावनाएं उतनी ही बलवती होंगी। बेगूसराय के युवाओं में उत्साह है और यह उत्साह फिलहाल तो दल या जाति की सीमाओं का अतिक्रमण करता प्रतीत होता है। यह आवेग अगर बना रह गया तो बेगूसराय इतिहास बना सकता है। लेकिन…बहुत कुछ निर्भर करता है राजद की सोच पर।

जितना बड़ा यह संघर्ष है, जिन संघर्षों का प्रतीक बेगूसराय का यह चुनावी समर है, इसे त्रिकोणीय होना ही नहीं चाहिए था। यह रहस्य है कि मोदी विरोध की प्रतिबद्धता के बावजूद राजद ने सीधे संघर्ष के लिये जमीन क्यों नहीं छोड़ी?

दांव पर जब इतिहास हो, सत्ता और जन प्रतिरोध का द्वंद्व हो तो सीमित निजी या दलगत हितों को दरकिनार करना ही होता है।

अब यह बेगूसराय पर निर्भर है कि वह इतिहास को किन हर्फ़ों में लिख पाता है।

(लेखक बिहार में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *