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आपका हीरो कौन है-भगत सिंह या नरेंद्र मोदी?

(यह लेख उन आम नवयुवकों के लिए है जो अज्ञानतावश भगत सिंह और नरेंद्र मोदी दोनों की तस्वीरें चिपकाए हुए हैं। भगत सिंह का रास्ता मोदी के रास्ते से संघर्ष का रास्ता है, शायद यह पढ़कर उन्हें मोटे तौर पर कुछ बातें समझ में आएं। बाकी जो धूर्ततावश और जानबूझकर ऐसा करते हैं, वे इसे पढ़कर समय न गवाएं।)

नरेंद्र मोदी भगवान हैं। उन्होंने कलजुग में खाकी निक्कर पहनकर अवतार लिया है। सामूहिक नरसंहार और बड़ा जनसमर्थन जुटा लेने के कारनामे तो अक्सर होते रहे हैं लेकिन बचपन में एक मंदिर पर झंडा फहराने के लिए खाकी निक्कर पहनकर मगरमच्छों से भरी झील को पार कर जाना सामान्य बच्चे के बूते से बाहर की बात है। उनके ऐसे चमत्कारी कारनामों पर आ रही चित्रकथा के प्रकाशक का दावा है कि बाल मोदी के ये कारनामे सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं और इस बारे में आठ महीने की रिसर्च भी की गई है।

लेकिन, अगर आप भगत सिंह के भी प्रशंसक हैं तो आपको निराशा होगी। भगत सिंह एक सामान्य हाड़-मांस के बने मनुष्य थे और मगरमच्छ से भरी झील में पांव रखने की मूर्खता वे नहीं कर सकते थे। मंदिर पर झंडा फहराने का काम उन्होंने बीच में कोई ऐसी बाधा न होते हुए भी कभी नहीं किया। आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा ले रहे एक ऐसे सिख किसान (बड़े किसान) परिवार जिस पर आर्यसमाज का गहरा असर था, में जन्मे भगत सिंह पर भी शुरुआती दौर में आर्यसमाज का असर था और बाद में वे तार्किकता के आधार पर नास्तिक हुए और कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित हुए। अपने मशहूर लेख मैं नास्तिक क्यों हूँ में भगत सिंह लिखते हैं- मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था, जिसकी भविष्य के बारे में कुछ निराशावादी प्रकृति थी। मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। इसी लेख में वे कहते हैं, अब अपने कन्धों पर ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी – विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिये अध्ययन करो। अपने मत के पक्ष में तर्क देने के लिये सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। रोमांस की जगह गम्भीर विचारों ने ली ली। न और अधिक रहस्यवाद, न ही अन्धविश्वास। यथार्थवाद हमारा आधार बना। मुझे विश्वक्रान्ति के अनेक आदर्शों के बारे में पढ़ने का खूब मौका मिला। मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद के पिता माक्र्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लोगों को पढ़ा, जो अपने देश में सफलतापूर्वक क्रान्ति लाये थे। ये सभी नास्तिक थे। बाद में मुझे निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली। इसमें रहस्यवादी नास्तिकता थी। 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान परम आत्मा की बात, जिसने ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन और संचालन किया, एक कोरी बकवास है। मैंने अपने इस अविश्वास को प्रदर्शित किया। मैंने इस विषय पर अपने दोस्तों से बहस की। मैं एक घोषित नास्तिक हो चुका था। आप इस लेख को थोड़ी सी भी गंभीरता के साथ पढ़ेंगे तो भगत सिंह, ईश्वर और धर्मों और धर्मों के पीछे के कुतर्कों व पाखंड़ों को आसानी से समझा सकोगे।

तो मोदी की तरह भगत सिंह की राजनीति हिंदू या किसी भी धर्म की रक्षा या किसी दूसरे धर्म से नफ़रत और इस आधार पर हिंसा की कभी नहीं रही। बल्कि मोदी और उनकी ब्रिगेड और उनके आक़ा संघ के लोग जा कर रहे हैं, उससे भगत सिंह की सीधी लड़ाई थी। 1928 में भगत सिंह ने एक लेख लिखा था साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज। इस लेख में भगत सिंह लिखते हैं- ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता है। इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डण्डे लाठियाँ, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर-फोड़-फोड़कर मर जाते हैं। बाकी कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है। यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है। दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।
इसी लेख में भगत सिंह कहते हैं- यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते है। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें।

लेकिन मोदी और उनकी विचारधारा धर्म के नाम पर खूनी सियासत करके ही फलती-फूलती है।

मोदी 54-56 जाने कितने इंच के चौड़े सीने का दंभ भरते हैं। भगत सिंह विचारों की, साम्प्रदायिक एकता की, सामाजिक और आर्थिक बराबरी वाले समाज की, प्रगतिशील विचारों की बात करते हैं। उन्हें लगातार एक पिस्तौलधारी बांके युवक की छवि में सीमित करने की कोशिश की जाती रही पर वे ऐसी दंभी वीरता के बजाय इंकलाब की तलवार को विचारों की सान पर तेज करने की बात करते हैं। आरएसएस वर्ण व्यवस्था की हिमायत करता है और मंडल आंदोलन को बेअसर करने के लिए मंदिर आंदोलन खड़ा कर देता है। मोदी तो मैला उठाने के काम को आध्यात्मिकता और कर्तव्यपारायणता करार देते हैं। लेकिन भगत सिंह अपने लेख अछूत समस्या में लिखते हैं- सब इन्सान समान हैं तथा न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य-विभाजन से। अर्थात् क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं। इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे। साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है। अब क्या हो सकता है?चुपचाप दिन गुजारो! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गए। लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया। मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया। आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया। बहुत दमन और अन्याय किया गया।

भगत सिंह से सच्चा लगाव रखने वाला कोई भी शख्स अडानी-अंबानी और दूसरे देसी-विदेशी पूंजीपतियों को सार्वजनिक संसाधनों की लूट की छूट देने की नीति पर चल रहे नरेंद्र मोदी का सिपाही नहीं हो सकता। भगत सिंह तो साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खिलाफ लगातार संघर्ष करते रहे। जिस आज़ादी के लिए वे लड़ रहे थे, वह आज़ादी कैसी होगी, इस बारे में उन्होंने और उनके साथियों ने साफ तौर पर अपना रुख सामने रखा था। अपने संIठन के नाम में इसीलिए उन्होंने सोशलिस्ट शब्द जोड़ा था- हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी। और उन्होंने कहा भी था कि गोरे अंग्रेजों के बजाय काले अंग्रेजों के हाथ में शासन आना आज़ादी नहीं होगी। लेनिन को पढ़ते हुए फांसी के फंदे की ओर चले भगत सिंह और नरेंद्र मोदी दोनों की तस्वीरें एक साथ लगाना या तो अज्ञानता के चलते किया जाता है या बेशर्मी और धूर्तता के चलते। साथियो, आपको तय करना चाहिए कि आप सच में किसके साथ हैं मोदी के या भगत सिंह के।

(जिन उद्धरणों का यहां जिक्र किया है, उनसे संबंधित पूरे लेख भी आसानी से नेट पर तलाशकर पढ़े जा सकते हैं।)

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