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बाबा साहब भीमराव अंबेडकर अगर आज होते तो देश के राजनीतिक दलों के हालात पर क्या कहते?

128 साल पहले जन्मे बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने भारतीय संविधान के निर्माण में असाधारण योगदान नहीं दिया होता तो आज इस देश के 20 करोड़ दलितों और 10 करोड़ आदिवासियों के हालात अमानुषिक होते। देश गृह युद्ध के दौर से गुजर रहा होता और यह हिम्मत किसी में नहीं होती कि वे आरक्षण जैसी व्यवस्था सोच पाते या इसका कोई दूसरा विकल्प सुझा पाते। वज़ह ये कि भारतीय राजनेता और राजनीतिक दल आग से खेलना तो जानते हैं, लेकिन उसे बुझाना नहीं जानते। भारतीय राजनेता और राजनीतिक दल अपने स्वार्थों के लिए अतीत की ग़लत व्याख्या करते हैं, वर्तमान के यथार्थ पर पर्दा डालकर उसकी बिलकुल काल्पनिक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं और भविष्य को लेकर उनके मन-मस्तिष्क में इतना अंधकार है कि वे संत कबीर के अंधा अंधे ठेलिया, दोऊ कूप पड़ंत वाली हालत में हैं।

बाबा साहब हों या सरदार भगतसिंह, दयानंद सरस्वती हों या एमएन रॉय, लाला हरदयाल हों या सुभाषचंद्र बोस, इस देश के पुनर्जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों को इस देश के भविष्य की बहुत चिंताएं थीं। बाबा साहब के पास एक मौका आया और उन्होंने उसे न केवल छोड़ा नहीं, बल्कि इस तरह की आधारशिला रखी कि एक मज़बूत और स्वाभिमानी भारत खड़ा हुआ। ऐसा भारत जो अपने नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करने का वादा करता है। सिर्फ़ किसी धर्म या जाति विशेष के लोगों को ही नहीं। सिर्फ़ ब्राह्मणों, क्षत्रियों या वैश्यों को ही नहीं। सिर्फ़ ज्यादा वोट वाली जातियों को ही नहीं। सिर्फ़ पैसे वालों को ही नहीं। सिर्फ़ पुरुषों को ही नहीं। सिर्फ़ किसी विचारधारा विशेष के लोगों को ही नहीं।

एक ऐसा भारत जो आज़ादियां खुले दिल से बांटता है। विचार की आज़ादियां। ख़यालों की आज़ादियां। अभिव्यक्ति की आज़ादियां। विश्वास रखने की आज़ादियां। विश्वास न रखने की आज़ादियां। धर्म को मानने या न मानने की आज़ादियां। उपासना करने या न करने की आज़ादियां। एक ऐसा भारत जहां न्याय के लिए तरह-तरह के निर्झर बहने चाहिए। सामाजिक न्याय के निर्झर। आर्थिक न्याय की जलधाराएं। राजनीतिक न्याय प्रदान करने वाला एक उदार और खुले दिल का राष्ट्र। हर व्यक्ति को प्रतिष्ठा और अवसर की समता की वचनबद्धता देता भारत। एक ऐसा भारत, जो यह सब इस शर्त पर प्रदान करता है कि आप बंधुता की संस्कृति को पुष्पित और पल्लवित करेंगे। न कि जाति, धर्म या कौम के नाम पर विष घोलेंगे। ऐसा संविधान कि जो अपने कमज़ोर से कमज़ोर नागरिक की गरिमा पर पूरे इतिहास को न्योछावर करने को तैयार है।

लेकिन हमारे राजनेता और राजनीतिक दल कैसा भारत बना रहे हैं? क्या वह वाक़ई अंबेडकर के सपनों का भारत बना रहे हैं? विभिन्न गुटों और विषों से भरे लोग, जो आज अंबेडकर जी के नाम पर तरह-तरह के ठीए खोले बैठे हैं, क्या किसी ने उनके स्वप्न को सच्चे मन से समझने की कोशिश की है? अंबेडकर के दिए और दिलाए आरक्षण की वजह से इतने विधायक और सांसद विधानसभाओं और संसद में पहुंचते हैं, लेकिन इन सबको उस समय क्यों सांप सूंघ जाता है, जब कमज़ोर और वाक़ई दलितों पर बड़ी जातियों और बाहुबलियों का हमला होता है? वे वोट के लालच में अंबेडकर से ली सुविधाओं को भूल जाते हैं और दबंग जातियों की अभंग तेल मालिश अपनी जिह्वा से करते रहते हैं। क्या ये लोग वाकई दलित प्रतिनिधि हैं और इन्हें अंबेडकर जी का नाम लेना चाहिए? क्या कमोबेश ऐसे ही हालात ब्यूरोक्रेसी में आला अफसरों के नहीं हैं?

राजनीति के सर्वोच्च शिखर ने शायद अब इस देश के नागरिकों के भविष्य और वर्तमान के बारे में सोचना बंद कर दिया है। उनमें इस देश के नागरिकों के प्रति शायद कोई तड़प नहीं है। यह देश के आम चुनाव का समय है और इसमें 90 करोड़ नागरिक मतदाता के रूप में शामिल होंगे। लोगों के सच्चे दु:ख-दर्द से राजनेताओं का कोई वास्ता नहीं रह गया है। वे न कोई स्टडी करते हैं और न कुछ इन्वेस्टीगेट करते हैं। उनकी कोई स्पेसिफिक पॉलिसीज नहीं हैं। वे अपने आपको राजनीतिज्ञ कहते अवश्य हैं, लेकिन उनका कोई काम ऐसा नहीं है, जिसे देखकर कहा जा सके कि वह पॉलिटिकल या आइडियोलॉजिकल हैं। वे दिनभर झूठे आंकड़े और मिथ्या तस्वीरें पेश करते रहते हैं। सिर्फ़ अपनी पार्टी के पक्ष में झूठी और आधारहीन दलीलें। सच को स्वीकार करने का साहस एक में नहीं। वे बार-बार काठ की हंडिया चढ़ाने के उस्ताद हैं! दल भले उनका कोई भी हो। आज अंबेडकर इन हालात को देखते तो वे गुस्से से भर उठते।

वास्तविकताओं को तो जैसे तलाक-तलाक कह दिया गया है। आम लोग आए दिन जिस तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उन्हें दूर करने के बजाय उन्हें यथास्थिति में ही ख़ुश रखने वाले जुमले गढ़कर हमारे राजनीतिक दल उन्हें ग़ुमराह कर रहे हैं। मेरी शिकायत पूरी पॉलिटिकल क्लास से है। किसी एक दल या नेता विशेष से नहीं। भले कांग्रेस के नेता हों या भाजपा के या फिर कम्युनिस्ट पार्टियों सहित अन्य दलों के। सबके सब ब्यूरोक्रेसी की तरह काम कर रहे हैं। वे ऑर्डर निकालते हैं और नीचे लोग उन्हें फॉलो भर करते हैं। हम किसी पॉलिटिकल क्लास से संचालित नहीं हैं। देश का एक सीईओ हो गया है। सब पार्टियों के अपने-अपने नेशनल और स्टेट सीईओ हैं। वे सिर्फ़ ऑर्डर इश्यू करते हैं और ये ऑर्डर अक्सर ग़लत ही होते हैं। देश का सीईओ देश को मिसलीड करता है। पार्टियों के सीईओ पार्टियों के लोगों को मिसलीड कर रहे हैं। इन लोगों की कोई पार्टी लाइन नहीं है। कोई पॉलिसी नहीं है। कोई नीति और सिद्धांत नहीं है। अंबेडकर जी ने यह तो नहीं ही सोचा था कि संविधान निर्माण के बाद हमारा भारत देश इस तरह चलेगा।

राजनीतिक लोगों या अपने आपको पॉलिटिकल कहलाने वालों का हाल ये है कि वे लोगों से मिलते तो ज़रूर हैं, लेकिन उन्हें अपने एजेंडे और ऑर्डर पर लाने के लिए; लेकिन उनकी सुनता कोई नहीं है। वे चाहे किसी भी दल से हाें, लेकिन वे आपको 50 हजार करोड़ के राफे़ल या बोफ़र्स तो लाकर दे सकते हैं, लेकिन आपके शहरों में ऐसे स्कूल खड़े नहीं कर सकते, जहां इक्कीसवीं सदी के हिसाब से बेहतरीन शिक्षा किफ़ायती पैसों में मिल सके। वे आपको ऐसे बर्बाद स्कूल देंगे, जिनमें किसी के बच्चों का भविष्य तो नष्ट हो सकता है, लेकिन बन नहीं सकता। वे आपको ऐसे अस्पताल या एंबुलेंस कतई नहीं दे सकते, जहां पूरे डॉक्टर हों, अच्छी दवाएं हों, साफ़-सफ़ाई और पीने का पानी हो।

यह कितनी दु:खद बात है कि अंबेडकर के नाम पर अभियान चलाने वाले लोग तक भारतीय शहरों में सफाई व्यवस्था की अमानुषिकता पर एक शब्द नहीं बोलते। भारतीय कानून में मैला ढोना तो गैरकानूनी है, लेकिन मल और मूत्र से भी अधिक गंदे नाले में उतरना हर दिन ज़रूरी है। यह काम क्यों नहीं मशीनों से होता? आख़िर सत्तर साल तक इस देश में यह सब क्यों होता रहा? हमारी ब्यूरोक्रेसी में बैठे एससी आईएएस अधिकारियों ने क्या किया? संसद और विधानसभाओं में बैठे लोगों ने कभी क्यों नहीं इन चीजों को लेकर सोचा? अरे इस देश में तेलियों ने तेल का काम छोड़ दिया, खातियों ने बसूला फेंका दिया, पिंजारों ने पेंजों को आग लगा दी, लेकिन आप कब उबरोगे? आज भी क्यों एक मोची मोची ही बना हुआ है? क्यों उसका जीवन बकरे या ऊंट की खाल से ही बंधा है?

परमाणु बम बनाने वाले और पाकिस्तान को आए दिन घर में घुसकर मारने वाले नेताजी हों या पाकिस्तान के दो टुकड़े करने वाले, आख़िर वे क्यों देश को टीबी, कैंसर, मलेरिया, हेपेटाइटिस और जाने ऐसी कितनी ही जानी-अनजानी बीमारियों को सबक सिखा सके? आतंकवादियों के दूसरे देश में बने कैंपों को नष्ट करने वाले अगर इस देश से गंदगी के कीटाणुओं को नष्ट करवा दें तो शायद अधिक भला हो, लेकिन ये सब तो बातों के काम हैं। हमारे नेता हर साल अस्पतालों या स्कूलों की घोषणाएं करते हैं, लेकिन इनका सच क्या है?‌ अम्बेडकर के बनाए संविधान में इस देश की सड़कों पर आज किसी पैदल आदमी के चलने के लिए एक छोटा सा फुटपाथ नहीं होता।

वे हमें ऐसे अस्पताल देंगे, जहां हम इलाज़ तो करवा सकते हैं, लेकिन इस इलाज़ में ही हमारे घर के सारे जेवर और जमीन-जायदाद तक बिक जाएगी। वे आपको बेहतरीन बसें नहीं दे सकते। वे आपको परमाणु बम और ख़तरनाक़ पनडुब्बियां दे सकते हैं, लेकिन उनके पास किताबों और पुस्तकालयों के लिए एक नया पैसा नहीं है। वे ख़ुद आलीशान कारों के बेड़े रखेंगे, लेकिन आपकी सुरक्षा में लगाई गई पुलिस के जवान को इस सदी में भी साइकिल भत्ते पर मज़बूर करेंगे और दयनीय ही रखेंगे। अंबेडकर होते तो वे इन लोगों को देखकर कहते, ये दंभी, स्वार्थी और विदूषक किस्म के लोग इतने आत्ममुग्ध हैं कि ये देश पर बोझ बन गए हैं। ये लोग हर समय मूल मुद्दों को छोड़कर निरुद्देश्य बहसें करते हैं और दिन भर लोगों को बरगलाने के अलावा कुछ नहीं करते।

कई बार लगता है, अंबेडकर आज भी लालकिले पर खड़े हैं और कह रहे हैं : ये लोग वह काम नहीं कर रहे हैं, जो मैंने इन्हें दिया था। ये सब्जेक्टिव हैं और वनसाइडेड हैं। ये केयरलेस हैं। ये ट्कुलेंट और आर्बिट्रेरी हो गए हैं। वे लोगों की नहीं सुनते और वास्तविकताओं का सामना नहीं कर पाते। वे सिर्फ़ मनमाने ऑर्डर फोर्स करते हैं। देश एक ब्यूरोक्रेसी से पहले ही दबा रहा है और इन पॉलिटिकल ब्यूरोक्रेटों ने तो देश को बर्बाद करने की ही ठान ली है। उस ब्यूरोक्रेसी पर कोई अंकुश तो है, लेकिन इन पर न तो कोई नियंत्रण है और न ही इनका अपना कोई संयम है। ये सत्ता के खुले सांड हैं। ये सब लड़ते हुए और एक दूसरे के शत्रु बने दिखते हैं, लेकिन ये सब आपस में मिले हुए हैं और एकदम एक हैं। बाबा साहब लाल किले की प्राचीर से कहते : ओ भारत देश के नागरिको, एथॉरिटेरियन ब्यूरोक्रेटों ने आपको ब्लाइंड कंट्रोल में ले लिया है।

बाबा साहब कहते : ये नेता सुबह से देर रात तक बिना किसी काम के ही व्यस्त रहते हैं। वे अनथक परिश्रम करते हैं। वे एक सेकंड आराम नहीं करते। वे पूरे साल भर कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहते हैं। लेकिन वे लोगों के दु:ख-दर्द को कभी एग्जमाइन नहीं करते। वे लोगों की समस्याओं को कभी पलकें उठाकर नहीं समझते। वे लोक के मानस को पढ़ने की कोशिश नहीं करते। वे दूसरे लोगों के लिखे और कुछ पैसे देकर खरीदे गए जुमले पढ़ते हैं। इनका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं होता। कुछ अभिनय कुशल लाेग इन्हें दैहिक भंगिमाएं सिखाते हैं और ये कठपुतलियों की तरह लोगों के सामने नाचते हैं। बाबा साहब कहते, ये देश भयंकर रूटीनिज्म में फंस गया है। हमें बंकम, ब्रेनलेस और मिसडायरेक्टिड एथॉरिटेरियन ब्यूरोक्रेटों से सावधान रहना चाहिए।

बाबा साहब लालकिले की प्राचीर पर खड़े होते और उन्हें पूरा देश सुन रहा होता तो वे गरजते : एनफ इज एनफ। दिस पॉलिटिकल एटीट्यूड इज इमेंस। इनका कोई दृष्टिबोध नहीं। ये सबके सब ईगोइस्ट हैं। ये जब तक खु़द हैसियत में नहीं आते, चापलूसियों में नहाते हैं और और जैसे ही कुछ हो जाते हैं, ये अपने आपको महात्मा बुद्ध का अवतार समझने लगते हैं। वे अपनी राहें खाली करवाने के लिए घंटे बजवाते हैं और उस समय सबसे साहसी महसूस करते हैं, जब भारत देश के लोकतंत्र और संविधान के समस्त अधिकारों से सुसज्जित नागरिक भी थर-थर कांपता है। ये ओवरलॉर्ड ब्यूरोक्रेट इस देश पर बोझ बन गए हैं, लेकिन दु:ख है कि इस देश का वह नागरिक भी इनके सामने विनयावनत होने में अहोभाग्य समझता है। लेकिन मैं यह नहीं चलने दूंगा। यह संविधान देना जानता हूं और इस संविधान की शक्तियों से निष्प्राण नागरिकों को प्राणित भी कर सकता हूं। क्योंकि मैं जानता हूं कि झूठे और बेईमान राजनेता इस देश के संविधान से ही ठीक किए जा सकते हैं।

बाबा साहब कहते, ये नेता लोग कोई ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं और जो अपने आपको पढ़ा लिखा या सुशिक्षित कहते हैं, वे अपने ज्ञान को अज्ञान की तरह इस्तेमाल करके इस देश के नागरिकों को गुमराह करने का काम कर रहे हैं। अगर कोई राजनेता कानून का जानकार है और उसकी पार्टी कोई ऐसा कानून ला रही है, जो नागरिकों के प्रतिकूल है तो वह आपको सच बताने का धर्म निभाने के बजाय आपके सामने न लोगों को अपराधी साबित करने में जुट जाएगा, जो आपको किसी भी कीमत पर सच बताना चाहते हैं। ये किसी एक दल की बीमारी नहीं है। सभी दल आज इस महारोग के शिकार हैं। वे सरकारी खजाने से भरपूर पैसा और आलीशान सुविधाएं लेते हैं, लेकिन काम एक धेले का नहीं करते। लेकिन शब्दों की लफ्फाजी में इतने दक्ष हैं कि वे आपकी जेबें भी काट रहे होंगे तो आपको लगेगा कि वे इतने महान हैं कि चुपके से आपकी जेब में अपने गाढे की कमाई का पैसा रख रहे हैं।

आप जिन भाषणों पर इतनी तालियां बजाते हैं और टीवी चैनल ऐसे नेता का गुणगान करते कभी थकते नहीं हैं, उनकी स्पीचेज टेस्टलेस हैं और उनमें कोई डायरेक्शन नहीं है। आप जिन्हें नेता माने बैठे हैं, भले वे पक्ष वाले हों या विपक्ष वाले, उनमें कोई लीडरशिप नहीं है। सच बात तो ये है कि वे अपने ऑफिस की ड्यूटीज को नेग्लेक्ट कर रहे हैं। वे एकदम टेलेंटलेस हैं और सच पूछो तो बहुत जीवंत बीजूके हैं। आपको भरोसा नहीं होगा, लेकिन सच यही है, क्योंकि जो डॉक्युमेंट्स उन्हें स्वयं पढ़ने चाहिएं, वे कोई और पढ़ता है और ये सब सोते हैं। वे बिना सोचे-समझे आलोचना करते हैं और तथ्यों को परे रख देते हैं। उनके लिए इस देश के लाेक के कल्याण का कोई सुस्पष्ट मार्ग नहीं है। वे ईर्ष्या और डाह के पुतले हैं। वे अपने से प्रतिभाशाली व्यक्ति को अपने बराबर खड़ा नहीं देख सकते। वे इसी कोशिश में रहते हैं कि राजनीति में आने वाले किसी तेजस्वी नवोदित की राजनीतिक हत्या कैसे करें और अपने से आगे खड़े किसी महान बुजुर्ग को धक्का देकर अपने लिए कैसे आगे जगह पुख्ता करें।

बाबा साहब लालकिले की प्राचीर से संबोधित करते हुए देश के नाम संबोधन में कहते, ये लोग एरोनियस टेंडेंसीज और स्पिरिट ऑव रिएक्शंस को ही प्रोमोट करते हैं। वे ऐसे गंदे लोगों को सीने से चिपकाए रहते हैं, जो उनकी कुर्सी को सलामत रखने में मददगार होते हैं। कोई राजनीतिक दल बर्बाद होने के कगार पर आ जाता है, लेकिन ऐसे चीचड़ उनके नेता को नहीं छोड़ते। वे ऐसे बुरे दिनों को सबसे अच्छा मानकर चलते हैं, जिनमें उनकी सत्ता परवान चढ़ती है। वे शत्रु और मित्र के बीच बहुत महीन फर्क रखते हैं। जो उनका मददगार है, वह एकदम सही है और जो उनके विपरीत है, वह एकदम गलत है। वे लोग लोकतंत्र को कमजोर करते हैं और बदले की भावना से काम करते हैं। इनकी एरोनियस टेंडेंसीज़ और रिएक्शंस वाली कार्यशैली देश को गलत दिशा में ले जा रही है।

बाबा साहब होते और लालकिले की प्राचीर से देश को कहते, आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया फैटेल चैलेंजेज का सामना कर रही है। आज ग्लोबल वॉर्मिंग मानव समाज के लिए एक डैडली चैलेंज है। हमारी धरती माता की क्षमता सिर्फ़ आठ मिलियन संततियों को गोद में रखने और आंगन में पालने की है। और हम जल्द ही साढ़े नौ बिलियन होने जा रहे हैं। और इसके बावजूद हमारे देश के नागरिक भूखे और बीमार रह रहे हैं। पीने की पानी की सुविधा तक नहीं है। हम ये कैसा देश बना रहे हैं कि कहीं तो वैभव के द्वीप हैं और कहीं निर्धनता, दु:ख और अपार कष्टों से जूझते लोग हैं। सिर्फ़ जो आगे बढ़ गए, वही सुख पर अतिक्रमण कर बैठे। सुदूर गांवों में अभिशप्त जीवन जी रहे लोगों की इन्हें कोई चिंता नहीं। क्या मैंने आरक्षण की व्यवस्था इसके लिए की थी‌?

क्या आपने कभी सोचा है कि कृषि का संकट कितना व्यापक हो गया है? पर्यावरणीय बदलावों और मानवीय परिवर्तनों के कारण कैसे-कैसे संकट आ गए हैं। कृषि का उत्पादन करने वाली भूमियां छीनी जा रही हैं और दलित और दमित वर्ग के लिए अच्छा जीवन जीने के लाले पड़ गए हैं। मैंने जाति व्यवस्था समाप्त करने के लिए बिगुल बजाया था, लेकिन देख रहा हूं कि हमारे राजनीतिक दलों ने जातिवाद को लोहे जैसा मजबूत बना दिया है। यह कैसा भारत हम बनाने जा रहे हैं कि एक भारतीय मुस्लिम नागरिक को प्रतिनिधित्व तक देने में हमारे हृदय संकीर्ण हो जाते हैं और एक दलित अपने ही निवासीय क्षेत्र से टिकट की दावेदारी से वंचित कर दिया जाता है। ये कैसे राजनीतिक दल हैं, जो न बीमारियों से मरते लोगों की चिंता करते हैं और न इन्हें इस बात पर अफ़सोस होता है कि इस देश में आज भी सरकारी स्तर पर न अच्छे अस्पताल हैं, न एंबुलेंस सेवाएं हैं और न अच्छे स्कूल हैं।

बाबा साहब, प्रश्न करते कि हम शांति और अमन के लिए क्या कर रहे हैं? क्या हम आज भी अपनी बहन-बेटियों को सामाजिक न्याय दिला पाए हैं? क्यों आज भी हमारी 50 प्रतिशत आबादी वाली महिलाएं संसद या विधानसभाओं में गिनती की दिखती हैं? हमने पूरी राजनीतिक संस्कृति को शोक, प्रपंच और चातुर्य से क्याें भर दिया है? क्या हमने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी आत्मा की भट्‌ठी को इसीलिए गलाया और तपाया था? क्या सारे तप इसीलिए किए गए थे? यह देखकर दु:ख होता है कि जिस तरह पुराने समय में यज्ञ होते थे और पवित्र बताए जाते थे, लेकिन उनसे कुछ मानवों को अछूत बताकर दूर रखा जाता था, उसी तरह आज आपने लोकतंत्र को भी वैसा भी यज्ञ बना दिया है और संसद भवन को वैसा ही एक मंदिर, जिसमें न अछूतों का प्रवेश हो सकता है और न ही रजस्वला स्त्रियों का। आपके इस मंदिर में सिर्फ़ वही अछूत और वही स्त्रियां प्रवेश पा सकती हैं, जिन्हें आज के लोकतंत्र का संचालन करने वाले ब्राह्मणवादियों ने अपने राजनीतिक दलीय यज्ञाेपवीत पहना दिए हैं।

मैं देख रहा हूं, एक क्रोधित चेहरा। एक गलता हुआ हिमखंड। मैं देख रहा हूं, एक ऐसी ललकार, जो समय की शक्तियों के शाप से शापित एक लोक के दु:खों से द्रवित और क्रोधित है। मैं देख रहा हूं, उस चेहरे की आंखों की पलकों पर टंके उस स्वप्न को, जो इस हिंदुस्तान को ज्ञान की अथाह जलराशि देना चाहता है, जो अनगिनत तारे तोड़ लाने को उत्कंठित है, जो असीम और असमाप्त अभिलाषाओं से आपूरित जीवन लाने को आतुर है, जो इस देश के निर्धनतम और अछूत तक घोषित कर दिए गए नागरिक को उत्कट, गर्वीला और अपराजित बना देने के लिए इस धरती पर आया था। इस देश में हजारों साल से चले आ रहे अनवरत अन्याय को चुनौती देने का साहस रखने वाला वह व्यक्तित्व एक सघन अंधेेरे से चिने कालखंड में चांदनी की एक अप्रतिम मीनार खड़ी कर दी, जिस ध्वस्त करने के लिए तरह-तरह की शक्तियां आतुर हैं।

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