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जन्मदिन विशेष: मजदूरों के सफ़दर हाशमी, वो बंजारों सा जी न सके

सफ़दर हाशमी

पढ़ना लिखना सीखो:

पूछो, मजदूरी की खातिर लोग भटकते क्यों हैं।
पढ़ो, तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों हैं।
पूछो, मां-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं।
पढ़ो, तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों हैं।

पढ़ो, लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा।
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा।
पढ़ो, अगर अंधे विश्वासों से पाना छुटकारा।
पढ़ो, किताबें कहती हैं – सारा संसार तुम्हारा।

पढ़ो, कि हर मेहनतकश को उसका हक दिलवाना है।
पढ़ो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है।

सफ़दर हाशमी की इस कविता/गीत का प्रयोग साक्षरता मिशन के एक विज्ञापन में किया गया था, जो अत्यंत लोकप्रिय हुआ। 

सफ़दर रंगमंच के कलाकार, नाटककार और निर्देशक रहे, साथ ही लेखक और गीतकार भी। उनके नुक्कड़ नाटकों ने आम जनता तक रंगमंच को पहुँचाया। उनमें विरोध का स्वर था तो साथ ही सामाजिक चेतना का भी। 

सफ़दर हाशमी का जन्म आज के दिन 12 अप्रैल 1954 में हुआ था। भारत में आधुनिक नुक्कड़ नाटक को लोकप्रिय बनाने का श्रेय सफ़दर हाशमी को जाता है, और उनके जन्म दिवस को देशभर में राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

सफदर की 2 जनवरी 1989 में साहिबाबाद में एक नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ खेलते हुए हत्या कर दी गई थी।

उनके जन्मदिवस पर पढ़िए उनकी कुछ और कविताएं

राजू और काजू 

एक था राजू, एक था काजू
दोनों पक्के यार,
इक दूजे के थामे बाजू
जा पहुँचे बाजार!

भीड़ लगी थी धक्कम-धक्का
देखके रह गए हक्का-बक्का!
इधर-उधर वह लगे ताकने,
यहाँ झाँकने, वहाँ झाँकने!

इधर दूकानें, उधर दूकानें,
अंदर और बाहर दूकानें।
पटरी पर छोटी दूकानें,
बिल्डिंग में मोटी दूकानें।

सभी जगह पर भरे पड़े थे
दीए और पटाखे,
फुलझड़ियाँ, सुरीं, हवाइयाँ
गोले और चटाखे।

राजू ने लीं कुछ फुलझड़ियाँ
कुछ दीए, कुछ बाती,
बोला, ‘मुझको रंग-बिरंगी
बत्ती ही है भाती।’

काजू बोला, ‘हम तो भइया
लेंगे बम और गोले,
इतना शोर मचाएँगे कि
तोबा हर कोई बोले!’

दोनों घर को लौटे और
दोनों ने खेल चलाए,
एक ने बम के गोले छोड़े
एक ने दीप जलाए।

काजू के बम-गोले फटकर
मिनट में हो गए ख़ाक,
पर राजू के दीया-बाती
जले देर तक रात।

किताबें

किताबें करती हैं बातें
बीते जमानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की कल की
एक-एक पल की।
खुशियों की, गमों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की।
सुनोगे नहीं क्या
किताबों की बातें?
किताबें, कुछ तो कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।
किताबों में चिड़िया दीखे चहचहाती,
कि इनमें मिलें खेतियाँ लहलहाती।
किताबों में झरने मिलें गुनगुनाते,
बड़े खूब परियों के किस्से सुनाते।
किताबों में साईंस की आवाज़ है,
किताबों में रॉकेट का राज़ है।
हर इक इल्म की इनमें भरमार है,
किताबों का अपना ही संसार है।
क्या तुम इसमें जाना नहीं चाहोगे?
जो इनमें है, पाना नहीं चाहोगे?
किताबें कुछ तो कहना चाहती हैं,
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं!

मच्छर पहलवान

बात की बात
खुराफत की खुराफात,
बेरिया का पत्ता
सवा सत्रह हाथ,
उसपे ठहरी बारात!
मच्छर ने मारी एड़
तो टूट गया पेड़,
पत्ता गया मुड़
बारात गई उड़।


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