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रिपोर्ट

जन्मदिन विशेष: सोनी सोरी, ‘खूब लड़ती मर्दानी यह तो बस्तर वाली रानी है’

उत्तम कुमार व हिमांशु कुमार

आज छत्तीसगढ़ की बहादुर महिला सोनी सोरी का जन्मदिन है। हम सभी को उनकी दीर्घायु की कामना करनी चाहिए। उनके संघर्षों के बदौलत यकीन मानिए हम चैन की नींद सो पाते हैं। यदि बैठकर उनके संघर्षों पर लिखा जाए तो एक अच्छी खासी मोटी पुस्तक लिखी जा सकती है।

गरीब आदिवासी परिवार में जन्मी सोनी पेशे से शिक्षिका है। लेकिन उन्हें नक्सलियों का सहयोगी बोल थाने में यातना देकर जेल में डाल दिया जाता है ताकि शिक्षा आदिवासियों तक ना पहुंचे। तिरंगा फहराने के कारण नक्सलियों द्वारा भी उन्हें प्रताड़ित किया जाता है।

गोमपाड़ में उनके द्वारा तिरंगा फहराए जाने से वहां के आदिवासियों को नक्सली बोलकर गोलियों से भून दिया जाता है। यातना इतनी की बड़े से बड़े पुलिस अधिकारियों को राज्य सरकार सम्मानित करती है। फिर भी वह चुप नहीं रहती है। उनको दिए गए यातना की जब कलकत्ता लैब में पुष्टि हो जाती है तो सुप्रीम कोर्ट को मजबूरन उन्हें रिहा करना होता है।

जब वह रिहा होती है तो वह निर्दयी सरकार के खिलाफ चुनाव लड़ती है शायाद यह चुनाव इस सरकार के करतूतों पर उनकी पहली जीत दर्ज होती है। इस पर भी जब शासन प्रशासन को चैन नहीं मिलती है तो उनके चेहरे को तेजाब से खराब कर देने की कोशिश होती है। बावजूद वह फीनिक्स की तरह जी उठती है और लगातार फर्जी एकाउंटर पर आवाज बुलंद करती है। अपने कठिन कामों में वह जेल से छूटे लोगों को अपने शरण में लेती है और उन्हें अपने घरों तक सकुशल पहुंचाने का काम करती है। हर एनकाउंटर पर मुस्तैद रहती है ताकि मानवता जिंदा रहे।

मेरा मानना है कि वह दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला है जो मनुष्य के जीवन जीने और उसे जिंदा रहने के लिए उसके फितरत से लगातार लड़ती है। देश दुनिया उनके इस खूबसूरत कार्य के लिए बार बार सम्मानित करती है। वास्तव में यह सोनी का सम्मान नहीं बल्कि लोग उनके बहाने अपना मान सम्मान करती है। जब तक सोनी जीवित है आदिवासियों को जिंदा रहने का बहाना मिल जाता है। उनके कारण आदिवासियों का अस्तित्व जिंदा है। जल, जंगल और जमीन जिंदा है उनकी संस्कृति जिंदा हैं।

एक ऐसी नेत्री जो नेता ना होते हुए भी लोगों को नेता बोलने के लिए प्रेरित करती है। एक ऐसा नेता जो कभी सम्मान की भूखी नहीं रही। उन पर जितना भी लिखा जाए कम है। संघर्ष के मैदान में लोग उनसे सीखते है कि जंग बिना हथियार के कैसे जीता जाता है।

हां उनके जन्मदिन पर केक और गुलदस्ता तुच्छ चीज मात्र है उनकी लड़ाई और उनकी खूबसूरती रानी चेन्नमा, रानी झलकारी से कम नहीं है। अगर महादेवी वर्मा होती तो अपनी गलती सुधारते हुए लिखती, ‘खूब लड़ती मर्दानी यह तो बस्तर वाली रानी है।’

तारीख 27 नवंबर, साल 2016। मुम्बई में सोनी सोरी को ‘मैरी पाटिल पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। मैरी पाटिल ने आदिवासियों की शिक्षा के लिये अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। पुरस्कार स्वरूप सोनी सोरी की पच्चीस हजार की सम्मान राशि और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया।

सोनी सोरी को दिये गये प्रशस्ति पत्र का पाठ यह था,

सोनी सोरी जी,
सादर अभिवादन!

आपका जन्म समेली गाँव, जिला दन्तेवाड़ा, छत्तीसगढ़ में हुआ।
आपका परिवार राजनीतिक चेतना से संपन्न परिवार है।
आपके पिता गाँव के सरपंच और चाचा सीपीआई पार्टी के विधायक रहे हैं। आपकी पढ़ाई गांधीवादी परिवेश में हुई। पढ़ाई पूरी करने के बाद आप आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने में जुट गईं लेकिन उसी समय आदिवासियों की ज़मीनें बड़ी कम्पनियों को देने के लिए सरकार ने सलवा जुडुम नामक अभियान चलाया।

इस अभियान में आदिवासियों के गाँव खाली कराने के लिए घरों को आग लगाई गईं, आदिवासी महिलाओं से सुरक्षा बलों ने निर्मम अत्याचार किए और हज़ारों निर्दोष आदिवासियों को जेलों में ठूंसा।आपने आदिवासियों पर हुए सरकारी अत्याचारों का विरोध किया।

फलस्वरूप पुलिस ने आपके पति अनिल पर फर्जी मामले बनाकर कारागार में डाल दिया, बाद में कोर्ट ने अनिल को निर्दोष माना लेकिन रिहाई के दिन पुलिस ने अनिल को इतना मारा कि वो कोमा में चले गए और कुछ दिनों में उनका देहान्त हो गया।

पुलिस ने आपको और आपके पत्रकार भतीजे लिंगा कोड़ोपी पर भी फर्जी मुकदमे दायर किए। आप पर पुलिस थाने में झूठे कागजों पर दस्तखत करने के लिए दबाव डाला गया और अरूंधति रॉय और हिमांशु कुमार जैसे बुद्धिजीवियों को नक्सली बताने को कहा गया लेकिन आप पुलिस के दबाव के सामने नहीं झुकी।

आपको ढाई साल जेल में रखा गया। सर्वोच्च न्यायालय से ज़मानत पर रिहा होने के बाद आपने आदिवासियों के मानवाधिकारों के लिए काम करना जारी रखा।

आपने आदिवासी बाड़ियों में घूम घूमकर ऐसे आदिवासी बच्चों को खोज निकाला, जिनके माता पिता पुलिस या नक्सलवादियों द्वारा मार दिए गए थे।

ऐसे बच्चों को आपने अपने स्कूल में पनाह दी। सरकार ऐसे बच्चों के खाने, कपड़े के लिए पैसा नहीं देती थी, आपने अपने वेतन के पैसों से उन बच्चों की शिक्षा जारी रखी। आपको सामाजिक साहस हेतु दिल्ली हिन्दी अकादमी का संतोष कोली तथा समाज सेवा हेतु कुंती माथुर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। आप अटूट संघर्ष की एक अनोखी मिसाल हैं। आपके कारण आदिवासी बच्चों के जीवन में ज्ञान का आलोक फैला हुआ है और आपके ही कारण उनका भविष्य उज्ज्वल मार्ग पर अग्रसर हो रहा हैं।

सोनी सोरी ने आदिवासी औरत होने के बावजूद पुलिस के ज़ुल्मों के खिलाफ आवाज़ उठाने की जुर्रत करी तो पूरा सत्ता तन्त्र सोनी सोरी के मार्फ़त पूरे आदिवासी समुदाय को सबक सिखाने पर तुल गया। ताकि आइन्दा कोई आदिवासी सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने की जुर्रत न कर सके।

साल 2011 में सोनी सोरी को फर्जी मामले में फंसाया गया। उसे थाने में ले जाकर नंगा किया गया। बिजली का करेंट लगाया गया, और फिर उसके गुप्तांगों में पत्थर भर दिए गए।

सोनी सोरी को प्रताड़ित करने के बाद पुलिस ने सोनी को धमकी दी थी की अगर सोनी ने अपने साथ हुए ज़ुल्म के बारे में किसी को बताया तो पुलिस सोनी के बच्चों की परवरिश करने वाले सोनी के भाई को भी जेल में डाल देगी.

लेकिन पुलिस की धमकी से डरे बिना जब सोनी सोरी ने खुद पर हुए ज़ुल्मों के बारे में सबको बता दिया तो सच में पुलिस की टुकड़ी सोनी सोरी के भाई को पकड़ने सोनी सोरी के भाई के घर पहुँच गयी।

हम लोगों ने दिल्ली से सारे शहरों से और सारी दुनिया से शोर मचाया तो पुलिस की टुकड़ी को सोनी के भाई के घर से सरकार ने वापिस बुला लिया।

पुलिस ने कहा इसे ले जाओ अब अदालत ने इसे छोड़ देने का हुक्म दे दिया है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी सरकार अपना खेल दिखा चुकी थी। घर लाने के एक महीने के भीतर सोनी सोरी के पति अनिल फुटाने ने दम तोड़ दिया।

इसके बाद ही सोनी के साथ हुए ज़ुल्मों के सदमे से सोनी की मां ने दम तोड़ दिया। सोनी सोरी के पति अनिल फुटाने को भी पुलिस ने फर्जी मामले में फंसा कर जेल में डाल दिया। सोनी सोरी के पति अनिल फुटाने को अदालत ने निर्दोष घोषित किया। लेकिन तब तक तीन साल गुजर गए थे और सोनी सोरी का पति अस्पताल के बिस्तर पर मौत की साँसें गिन रहे थे।

यह सरासर सरकार द्वारा की गयी सोनी सोरी के पति की ह्त्या है। सोनी के पति की उम्र चालीस से भी नीचे थी। वह एक तंदरुस्त हट्टा-कट्टा युवक था। सरकार का दावा था की यह नक्सलियों के साथ एक कांग्रेसी नेता के घर पर हुए हमले में शामिल था। पुलिस की मानें तो वह स्वस्थ था तभी तो हमले में शामिल हो सका।

तो सरकार की जेल में तीन ही साल में सोनी सोरी के पति अनिल फुटाने के साथ सरकार ने ऐसा क्या किया की फिर कभी जेल से सोनी सोरी के पति अपने पैरों बाहर आ ही नहीं पाए?

सोनी सोरी के पति निर्दोष थे, आपकी अदालत भी ऐसा मानती है। वह स्वस्थ था आप भी मानते हैं। वह आपकी हिरासत में थे. वह आपकी देखभाल में थे। फिर वह आपकी कैद से रिहा होते समय अपने पैरों पर चलने लायक क्यों नहीं बचे थे?

तो इस तरह सरकार ने सोनी सोरी के बच्चों को अनाथ बना दिया। एक हँसते खेलते परिवार को तबाह कर दिया। सोनी सोरी के पति ने मरने से के एक पत्रकार को बताया था की जेल में सोनी सोरी के पति को बुरी तरह मारा जाता था। जिसके कारण वह इस हालत में पहुंचा था।

शायद सरकार मानती है की अदालत तो सरकार के लिए बनायी गयी है जिसमे सरकार आदिवासियों, दलितों, मुसलमानों को पकड कर फर्जी मामलों में फंसा कर जेल में सडवा दे। ताकि यह सब लोग सरकार से डर कर हमेशा खामोश रहें और कभी भी अपने हकों के लिए आवाज़ उठाने की सोच भी न सकें।

लेकिन अगर कोई आदिवासी दलित, मुसलमान इसी सरकारी अदालत में सरकार की ही पेशी करवा दे तो सरकार इसे अपनी बेईज्ज़ती मानती है और ऐसी हिमाकत करने वालों पर ऐसे ही ज़ुल्म करती है जैसा उसने सोनी सोरी के पूरे परिवार के साथ किया।

सोनी सोरी के पति अनिल फुटाने का एक वीडियो है जिसमे उन्होंने बताया था की पुलिस अधीक्षक ने अपने सिपाहियों को हुक्म दिया की यह औरत सोनी सोरी बहुत ज्यादा नेतागिरी दिखा रही है इसका रेप कर दो बाद में ये खुद शर्म से मर जायेगी। इतना ही नहीं अपने सिपाहियों को बलात्कार करने का यह हुक्म देने वाला वो एसपी अमरेश मिश्रा आजकल छ्त्तीसगढ़ में ही बड़ा अधिकारी बना हुआ है।

(उत्तम कुमार दक्षिण कोसल पत्रिका के संपादक हैं और हिमांशु कुमार सोनी सोरी को मदद पहुंचाने वाले वकील हैं)

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