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राफेल पर प्रधानमंत्री के झूठ को छुपाने के लिए झूठ फैलाती मूर्खों की टोली!

मूर्ख भक्तों का आईटी सेल और कुछ सो कॉल्ड स्मार्ट दंगाई संपादक लोग द हिन्दू के खुलासे पर इस फोटो के माध्यम से प्रोपेगंडा कर रहे हैं। इस फोटो में बताया जा रहा है कि कैसे द हिन्दू के एन राम ने राफेल के ऊपर हाल के खुलासे में दस्तावेज को क्रॉप करके केवल आधी जानकारी दी(फ़ोटो में दायीं तरफ)। मतलब आधी जानकारी जानबूझकर छुपा ली(फोटो में बायीं तरफ)।

इन मूर्ख भक्तों और दंगाई संपादकों और पत्रकारों को पत्रकारिता का क, ख, ग नहीं पता। एन राम जैसा पत्रकार इतना मूर्ख तो होगा नहीं कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर यह जानते हुए कि दस्तावेज डिफेंस मिनिस्ट्री का है, क्रॉप करके फोटो डाले। एन राम को थोड़े ना पता है कि ऐसा करने से उनके साथ क्या हो सकता है। सरकार उनके खिलाफ क्या कर सकती है और सबसे महत्वूवर्ण ऐसा करने पर जब इस बात का खुलासा होगा तो एक लंबे समय तक चले उनके यशस्वी और बेदाग पत्रकारिता करियर का क्या होगा!

खैर, जो लोग पत्रकारिता में हैं वो जानते होंगे कि किसी स्टोरी को करने के लिए यदि आपने किसी दस्तावेज का सहारा लिया है तो जरूरी नहीं है कि उस पूरे दस्तावेज को ही आप अपनी स्टोरी में उतार दें। दस्तावेज की जितनी सूचनाएं आपकी स्टोरी के लिए जरूरी हैं आप उतनी ही सूचनाओं का प्रयोग करते हैं। लेकिन अगर ऐसा है कि दस्तावेज में कुछ ऐसी सूचनाएं हैं जो आपस में विरोधाभासी हैं या फिर कुछ का पूरी तरह खंडन कर रही हैं तो आपको पत्रकारीय नैतिकता के तहत पूरा का पूरा दस्तावेज़ छापना पड़ेगा।

इस मामले में ऐसा कुछ नहीं है। द हिन्दू ने जो हिस्सा क्रॉप किया है उसमें तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का हैंड रिटेन नोट है। इस नोट में उन्होंने रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा पीएमओ की तरफ से हो रही समानांतर सौदेबाजी पर जताई गई आपत्ति को ‘अति सक्रियता’ बताया है। इस नोट की भाषा ऐसी है कि साफ-साफ पता चल रहा है कि डील में पीएमओ द्वारा खेले जा रहे खेल के बारे में खुद पर्रिकर को भी नहीं पता है।

भक्त लोग इसे फोटो को ऐसे प्रसारित कर रहे हैं कि जैसे सरकार ने इस पूरे मुद्दे पर विपक्ष को पटखनी दे दी हो। इसके विपरीत तो इस फोटो से ये पता चल रहा है कि हिन्दू ने दस्तावेज के जिस भाग को नहीं छापा है उसमें तत्कालीन रक्षा मंत्री का हैंड रिटेन नोट है और यह नोट ये प्रमाणित कर रहा है कि पीएमओ भी राफेल डील में शामिल था। यह तथ्य सरकार द्वारा अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट में बताए गए तथ्य के खिलाफ है। सरकार ने अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि राफेल डील में पीएमओ कभी भी शामिल ही नहीं हुआ।

एक तरीके से इस नोट से द हिन्दू के खुलासे को प्रमाणिकता ही मिली है लेकिन भक्त हैं कि फर्जी में लहालोट हुए जा रहे हैं। दंगाई पत्रकारों और संपादकों का तो कहना ही क्या है। आजतक ने तो इस फोटो का हवाला देते हुए ‘राफेल का अर्धसत्य’ नाम से 1 घंटे का डिबेट शो भी चला दिया।

वैसे मैंने कई भक्तों से पूछा कि ऊपर की फोटो में जो लाल रंग के आयात के भीतर लिखा है, उसका मतलब क्या है। उत्तर देने की जगह उन्होंने मुझे पाकिस्तान के इशारे पर काम करने वाला बता दिया। यही बात आज निर्मला सीतारमण और रविशंकर प्रसाद ने भी इस मुद्दे पर सरकार से प्रश्न पूछने वालों के लिये कही। मोदी तो कहते ही रहते हैं। अब मुझे यकीन हो गया है कि इनमें से कोई भक्त आगे चलकर इस देश का पीएम बन सकता है। कई भक्त विभिन्न मंत्रालय भी संभाल सकते हैं।

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