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कला एवं साहित्य

चुनाव और फिल्मी गाने

प्रकाश के रे

फिल्मी गानों में वोट का लोकतंत्र
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सिनेमा के बारे में हम चाहे जो राय रखते हों, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इसने हमारे जीवन के हर पहलू को छुआ है. फिल्मी कहानियों ने लोककथाओं, संवादों ने लोकोक्तियों और गीतों ने लोकगीतों जैसा मुकाम पा लिया है. ऐसे में मौजूदा चुनावी माहौल में यह देखना प्रासंगिक है कि किस तरह से चुनाव और नेताओं को गीतों ने देखा है. इस संबंध में आह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि आम तौर पर सिनेमा की कहानी की तरह उसके गीत भी अच्छे और बुरे के बीच सीधा अंतर रखते हैं.

साल 1970 की फिल्म ‘यादगार’ में मनोज कुमार परदे पर महेंद्र कपूर की आवाज में ‘एकतारा बोले’ गीत में गाते हैं-

‘दो किसम के नेता होते हैं इक देता है, इक पाता है इक देश को लूट के खाता है इक देश पर जान लुटाता है… राम ना करे मेरे देश को कभी भी ऐसा नेता मिले. जो आप भी डूबे, देश भी डूबे. जनता को भी ले डूबे. वोट लिया खिसक गया / कुर्सी से चिपक गया…’ इस फिल्म के करीब बीस साल बाद 1989 में ‘काला बाजार’ के एक गीत में कादर खान गाते हैं- ‘मिलता है उसी को वोट / जो दिखाए वोटर को नोट / ये पैसा बोलता है…’ नीतिन मुकेश ने इस गीत को गाया है और इसमें बताया गया है कि किस तरह से भ्रष्टाचार ने समाज और शासन को अपना ग्रास बना लिया है.

एन चंद्रा द्वारा निर्देशित ‘प्रतिघात’ 1987 की चर्चित फिल्म थी और इसकी कथा के केंद्र में राजनीति का अपराधीकरण था. इसमें नाना पाटेकर ने सड़क पर आवारा घूमनेवाले विक्षिप्त व्यक्ति की भूमिका निभायी थी और जो अपनी टिप्पणियों से शासन-प्रशासन तथा नागरिकता के क्षीण पड़ते जाने पर तीखी टिप्पणियाँ करता रहता है. इनके हिस्से में एक गीत भी था, जो चुनाव के समय पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा मतदाताओं को लुभाने-ललचाने को लेकर था. एसपी बालासुब्रण्यम द्वारा गाया गया यह गाना- ‘हमरे बलमा बेईमान हमें पटियाने आए हैं वोट हथियाने आए हैं… सारे मिलकर देश की नाव डुबाने आए हैं पाँच साल के बाद शकल दिखलाने आए हैं…’ बहुत हिट हुआ था. आज भी लोग इस गाने के बोल कह कर नेताओं पर तंज कसते हैं.

राजनीति पर व्यंग्य करने की सिनेमाई परंपरा में अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ की एक खास जगह है. साल 1977 में बनी इस फिल्म को आपातकाल के दौरान न सिर्फ प्रतिबंधित किया गया था, बल्कि उसके सारे प्रिंट भी सरकार ने नष्ट करा दिए थे. बाद में नाहटा ने इसे फिर से बनाया था. इसमें एक गीत ‘जनता की जय बोलो’ है और इसी के साथ फिल्म खत्म होती है. गाने की शुरुआत ‘ऊँ नमः कुर्सी देवाए’ के मंत्रोच्चार से होता है. इसे आशा भोंसले, महेंद्र कपूर और जगजीत सिंह ने गाया था. इसमें एक पंक्ति यूँ आती है- ‘वोट अगर जो लेना हो तो दारू की बोतल खोलो… जनता की जय बोलो…’ इस गाने में अनाज, गोदाम, नोट, फाइलों और दफ्तरों को खानेवाले दुश्मन के रूप में चूहे को चिन्हित किया गया है कि किसी और का दोष नहीं, चूहे का दोष है. इसमें कुर्सी द्वारा अपने वादे भूलने की शिकायत भी की गयी है.

‘रोटी’ (1974) में किशोर कुमार के गाए गीत ‘ये पब्लिक है सब जानती है…’ में एक चुनावी सभा में घुसकर राजेश खन्ना गाते हैं- ‘क्या नेता क्या अभिनेता दे जनता को जो धोखा …’ इससे सालभर पहले आयी ‘नमकहराम’ में गाते हुए असरानी कहते हैं- ‘वो झूठा है, वोट ना उसको देना…’ यह पूरा गीत नेताओं के भ्रष्टाचार पर आधारित है. किशोर कुमार ने 1969 में ‘आँसू बन गए फूल’ में गाया कि ‘इलेक्शन में मालिक के लड़के खड़े हैं.’ इसमें धनी लोगों, अखबार मालिकों और उद्योगपतियों की उम्मीदवारी पर तंज था.

राजनीतिक फिल्मों की कोई भी सूची गुलजार की ‘आँधी’ के बिना पूरी नहीं हो सकती है. साल 1975 में आयी इस फिल्म में कव्वाली के अंदाज में मोहम्मद रफी, अमित कुमार और भूपिन्दर ने गाया था- ‘सलाम कीजिए, आली जनाब आए हैं / ये पाँच सालों का देने हिसाब आए हैं…’ इसमें जनता की शिकायतों का बदला चुनाव में लेने की बात कही गयी है. बहरहाल, ‘अपना देश’ (1972) में ‘कोई जीता कोई हारा’ गीत में चुनाव नतीजे के बाद का जश्न है और विजयी उम्मीदवार अपने सादेपन का हवाला देकर कहता है- ‘इस जीवन पे सबका हक है, अपना है ये नारा…’

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