लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

राजनीति रिपोर्ट

राफेल पर कैग की रिपोर्ट की लच्छेदार भाषा और अरुण जेटली के झूठों का पहाड़

राफेल पर CAG की रिपोर्ट की भाषा भ्रमित करने वाली है। यह लच्छेदार भाषा में छुपे झोल कुछ इसप्रकार हैं,

  1. रिपोर्ट में ऑफसेट कांट्रैक्ट को लेकर कहीं कोई जिक्र नहीं है. इस तरह से रिपोर्ट में इस बात की कोई तफ्तीश नहीं की गई है कि जिन 108 विमानों के निर्माण की जिम्मेदारी HAL को मिलनी थी, उसकी जगह सौदे के कुछ दिन पहले ही बनी रिलायंस डिफेंस को ऑफसेट पार्टनर कैसे चुन लिया गया. हालांकि, इसे एक अलग CAG रिपोर्ट में डील किया जाएगा. लेकिन अरुण जेटली फालतू में लहालोट हुए जा रहे हैं.
  2. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि राफेल पर NDA का नया सौदा 2007 में UPA के दौरान हुए सौदे के मुकाबले 2.86 फीसदी सस्ता है. हालांकि, 2007 के सौदे में सरकार पूरे 126 विमानों के डिजायन और डेवलपमेंट के लिए एक फिक्स खर्चे के लिए पूरी तरह से उत्तरदाई थी. जबकि सभी प्रकार की शर्तों और प्रक्रियाओं को धता बताते हुए NDA ने 36 राफेल विमानों को UPA के समय से 41 फीसद अधिक दाम पर खरीदा. CAG ने माना है कि इस सौदे के डिजायन और डेवलपमेंट में 6.54 फीसदी खर्चा अधिक हुआ है. वहीं ट्रेनिंग की लागत भी 2.68 फीसदी बढ़ी है. यहां इस बात का ध्यान रखा जाए कि परसों निर्मला सीतारमण ने स्वीकार किया है कि NDA के समय हुए नए सौदे में विमानों का डिजायन और डेवलपमेंट बिल्कुल वैसा ही है जैसे UPA के समय तय हुआ था. जबकि अरुण जेटली ने जनवरी में लोकसभा में बताया था कि डि़जायन और डेवलपमेंट पिछले सौदे से कहीं बेहतर है. जाहिर है कि अरुण जेटली का झूठ पकड़ा गया है. लेकिन फिर भी वे लहालोट हुए जा रहे हैं.
  3. कैग ने यह माना है कि इस डील में कोई बैंक या सरकारी गारंटी नहीं ली गई है और इस वजह से फायदा भारत सरकार को ना होकर दस्सॉ एविएशन को हुआ है. अगर सरकारी या बैंक गारंटी ली जाती तो सौदे के मूल्य में 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी और होती. द हिंदू ने आज बताया है कि बैंक गारंटी ना लेने की स्थिति में दस्सॉ को 574 मिलियन यूरो का फायदा हुआ है. CAG ने रिपोर्ट में इस बिंदु को शामिल करके द हिंदू के खुलासे को भी सही साबित कर दिया है. यहां ध्यान रखा जाए कि सरकार ने बैंक गारंटी ना लेने की बात सुप्रीम कोर्ट से छिपाई है. वहीं गारंटी ना लेने की स्थिति में एस्क्रो अकाउंट बनाए जाने की सलाह को भी नकार दिया. इसपर कानून मंत्रालय ने भी अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी. लेकिन अब रविशंकर भी लहालोट हुए जा रहे हैं.
  4. शायद यह पहली बार हुआ है कि CAG रिपोर्ट में ‘एब्सोल्यूट फिगर्स’ का जिक्र नहीं है. रिपोर्ट में सिर्फ प्रतिशत के आधार पर हुए परिवर्तनों का जिक्र है. राफेल का दाम कहीं भी नहीं बताया गया है. इस प्रकार इस मामले में यह रिपोर्ट पारदर्शिता के साथ समझौता करती है.
  5. राफेल पर नए सौदे का औचित्य सही ठहराने के लिए मोदी सरकार ने कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर देश को इन विमानों की तुरंत जरूरत है. CAG रिपोर्ट में बताया गया है कि 36 में से पहले 18 विमान 36 से 53 महीनों के बीच आने थे और बाकी के 67 महीने तक.
  6. 2007 के सौदे में तकनीक के हस्तांतरण के तहत 126 में से 108 राफेल विमानों के निर्माण का काम HAL को मिलना था. लेकिन NDA के नए सौदे में तकनीक के हस्तांतरण को खत्म कर दिया गया. ये अगर बना रहता तो प्रत्येक राफेल की कीमत में गिरावट होती क्योंकि इन्हें देश के भीतर बनाया जाता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सरकार की महत्वकांक्षी मेक इन इंडिया योजना भी धरी की धरी रह गई. आखिर ऐसा क्यों किया गया.

इस प्रकार मोदी सरकार ने ये डील UPA सरकार के समय तय हुई डील के मुकाबले किसी भी तरह से बेहतर शर्तों में नहीं की है. मोदी सरकार बार-बार कहती रही है कि ये डील UPA से सस्ती है और इसमें विमान जल्दी मिलेंगे. CAG रिपोर्ट ने एक तरह से इन दावों को खारिज कर दिया है. यही खुलासा आज द हिंदू ने भी किया है. हिंदू ने सौदेबाजी दल के तीन सदस्यों को उस डिसेंट नोट को छापा है, जिसे डील पर साइन होने के 3 महीने पहले जमा किया गया था. इन तीनों सदस्यों ने कहा था कि नए सौदे को पुराने सौदे से बेहतर शर्तों पर करने के लिए भारत-फ्रांस का जो संयुक्त बयान जारी हुआ था, सौदेबाजी खत्म होने के बाद उस ओर कुछ भी नहीं हुआ है, बल्कि विपरीत हुआ है.

CAG रिपोर्ट ने इस नए सौदे से जुड़े बड़े और महत्वपूर्ण प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया है. हो सकता है कि सरकार ने जिस तरीके से सौदे से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट को भ्रम में रखा वैसे ही CAG को भी रखा हो.

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *