लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

कला एवं साहित्य

मेरे आसपास आजकल बहुत कुछ घट रहा है

मेरे आसपास आजकल बहुत कुछ घट रहा है और बहुत तेजी से कुछ दोस्तों ने मुखौटे बदल लिए हैं कुछ दुश्मनों ने चेहरे। एक बस है जो लगता है छूटने वाली है एक और बस है ठसाठस भरी हुई उसका…

नफ़रत के पुतले

आप दलितों के प्रति इतनी नफ़रत कहाँ संभाल कर रखते हैं जो आपके लेखक वगैराह हो जाने के बावजूद बरक़रार रहती है और आपकी सारी स्मार्टनेस उसे छुपा नहीं पाती? आप उसे छुपाना भी कहां चाहते हैं? फिलहाल मैं यह…

डियर पांच बेटियों के पापा…

रितिका यहां पांच बेटियां लिखना इसलिए ज़रूरी लगा क्योंकि पांच बेटियों का होना ही आपको खास बनाता है। रश्मि, रितिका, गोदावरी, शिप्रा और कावेरी ये पांचों नाम आपने खुद रखे थे न| यहां मुझे चर्चा उन बातों की करनी ही…

‘साहित्य की एक नई दुनिया संभव है’, वक्तव्य से हुआ दलित साहित्य महोत्सव का आरम्भ

दलित शब्द समाज के हर दलित-आदिवासी,महिला, घुमंतू आदिवासी, ट्रांसजेंडर समुदाय, किसान, मजदूर, व हर वंचित समुदाय के संघर्ष और प्रतिरोध का प्रतीक देश भर से आये प्रसिद्द साहित्यकारों ने किया उदघाटन, लक्ष्मण गायकवाड़, बल्ली सिंह चीमा, मोहन दास नैमिशराय, निर्मला…

गांधी का पुतला (दस कहानियां)

लेखक: असगर वजाहत अ.व.1.गांधी के पुतले को यह समझ कर गोली मारी गई थी कि पुतले को मारी जा रही है। लेकिन गोली गांधी को लगी।पुतले के पीछे से गांधी निकल आए। गोली मारने वालों ने कहा यह तो हमारे…

अब कातिल कभी सो नहीं पायेगा

छत्रपति की बेटी श्रेयसी छ्त्रपति की कविता उस रात कोई नहीं सोया था न घर में बैठे हम न आईसीयू के बाहर चिंतित खड़ी मां उस रात के बाद हम कई दिन नहीं सोये पापा के घर लौटने के इंतज़ार…

महात्मा गांधी को मुख़्तलिफ़ निगाहों से देखती सात औरतें

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां रंगमंच पर कंटेंट की जगह रंगबिरंगी लाइटें, भारी भरकम सेट और दूसरी कम जरूरी चीजों पर ज्यादा ध्यान रहता है। रंगमंच से अच्छा कंटेंट कब का बेदखल हो चुका है। रंगमंच…

‘सडांध’, माने बास | नाटक पड़ताल

क से भय ‘क से भय’ नाटक 26 मई को जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी के कन्वेंशन सेंटर में मैत्रैयी कॉलेज की थियेटर सोसायटी ‘अभिव्यक्ति’ की छात्राओं द्वारा खेला गया… उस पर मनदीप पूनिया की रपट हिंदी में अभी अच्छे नाटक नहीं…