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रिपोर्ट

नागरिक को अर्द्ध नागरिक में बदलता समय

चंदन श्रीवास्तव

लॉकडाऊन के सवा दो माह गुजरने के बाद जब कोई सवाल ये पूछे तो कि देश ने क्या खोया-क्या पाया तो एक खस्ताहाल आम नागरिक का और क्या जवाब होगा भला सिवाय मी’र के इस शे’र के कि ‘उलटी हो गई सब तदबीरें कुछ ना दवा ने काम किया—देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आखिर काम तमाम किया’ ? लॉकडाऊन के बीते दिनों के बारे में बस इतना भर कहा जा सकता है कि तदबीरें हजार हुईं मगर सब की सब उलटी पड़ गईं.

लॉकडाऊन के शुरु में सुनायी दिया कि जान है तो जहान है. तजवीज ये की गई कि अपने-अपने जहान को अगले कुछ हफ्तों के लिए भूल जाओ— वक्त-जरुरत जो कहीं जाना-आना पड़े तो मुंह पर रुमाल बांधों, सामने वाले से दो गज की दूरी बनाओ, थूको मत, छींको मत, बोलो कम, सुनो ज्यादा और मुहल्ले के कोने की एकलौती दुकान से कहीं से आटा-दाल-सब्जी और दवाई लेकर घर लौटो तो अपने ही हाथ को शंका से देखो. बन सके तो जूते-कपड़े और दिमाग दरवाजे के बाहर रखो और खालिस भय से भरा दिल लिये टीवी या मोबाइल पर ये देखो कि कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा किस ऊंचाई पर पहुंचा, कितने मरे, कितने बचे, कितने अस्पताल में दाखिल हुए और कितने दाखिल होने की कोशिश में कतार में लगे रह गये ! सोचो, तुम्हें सर्दी-खांसी-बुखार तो नहीं, गला दर्द तो नहीं कर रहा, सांस कुछ तेज तो नहीं चल रही ? जो, ऐसा हो तो फौरन डाक्टर से मिलो, जांच कराओ !

अनलॉक-1 में यही समझावन उलट गयी है. अब जान बचानी है, जहान बचाना है जबकि साफ दिख रहा है कि जान के लाले तो पहले से ज्यादे पड़े हुए हैं. मसलन, नीति आयोग का मॉडल कह रहा था कि 16 मई के आते-आते कोरोना को ये देश जंग में हरा चुका होगा. लेकिन अनलॉक के पहले चरण में पहुंचकर हम-आप देख रहे हैं कि कोरोना-संक्रमितों का ग्राफ तो नित नई ऊंचाइयां छू रहा है. लक्षण दिखते ही डॉक्टर के पास जाने की सलाह हवा हो गई है और टीवी पर एक मुख्यमंत्री लोगों से कह रहा है कि कोरोना के अस्सी प्रतिशत मरीजों में कोई लक्षण नहीं होते या फिर होते भी हैं तो हल्के-फुल्के. सो, घर ही में क्वारंटाइन रहो, फिजूल अस्पताल के चक्कर मत काटो. यह नये भारत में आत्मनिर्भर होने का सबसे नायाब नुस्खा है. शुरुआत कोरोना से जंग लड़ने से हुई थी जब तालाबंदी अपने आखिर पर पहुंची है तो बताया जा रहा है, अब कोरोना के साथ ही रहना है. तालाबंदी की शुरुआत में हमें झटपट अस्पताल बनवाये थे, अस्पतालों में बेड और वेंटीलेटर बढ़ाने थे और तालाबंदी के खात्मे पर महानगरों से खबर आ रही है कि लाशों के निबटाने के लिए नये ताबूत बनवाये जा रहे हैं!

जिस जहान को बचाने की चुनौती लेकर अनलॉक-1 का आगाज हुआ है, वह जहान कब का मटियामेट हो चुका है. लगभग 10 करोड़ लोग इन पंक्तियों को लिखे जाने की घड़ी में अपना रोजी-रोजगार गंवाकर घरों को लौट चुके हैं. इनमें से कुछ बीच में ही भूख-प्यास से मारे गये, कुछ गांव के सीवान पर क्वारंटाइन सेंटर में बंद हैं और दुर्भाग्य के मारे कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें गांव-घर के लोगों ने ही बस्ती से दूर किसी झाड़-झंखाड़ के बीच सांप और मच्छरों का सामना करते हुए दिन काटने का फरमान सुनाया है.

सारी तदबीरें यों ही नहीं उलटतीं. ऐसा तभी होता है जब समाज को थामने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्थाएं अपने कर्तव्य-निर्वाह मे चूक जाती हैं. जी हां, हमें संकट की इस घड़ी में लोकतंत्र की मर्यादाओं की खालिस हिफाजत के लिए बनायी गई संस्थाओं ने फेल किया. प्लेग के पसारे के वक्त 19वीं सदी की आखिरी दहाई में एपिडेमिक डिजीज एक्ट बनाने वाले अंग्रेजों ने भी ना सोचा होगा कि भारत-भूमि में ये कानून सवा सौ साल भी जारी रहेगा और 21वीं सदी में इसका इस्तेमाल यों होगा होगा कि नागरिकों का जीवन और जीविका का अधिकार एकबारगी स्थगित होकर रह जायेगा. ‘सुनामी’ के सबक के तौर पर 2005 में डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट को पारित करते वक्त यूपीए शायद ही सोच पायी होगी कि इस कानून के सहारे अघोषित आपात्काल जैसे हालात पैदा किये जा सकते हैं. ये ही कानून थे कि मंत्रिमंडल से सलाह-मशविरा करने की जरुरत ना समझी गई, संसद और विधानसभाओं को सूचित तक करना जरुरी ना समझा गया. सारी शक्ति केंद्र सरकार के प्रधान के हाथ में आ गई और बस चार घंटे के अंतराल से ऐन आधी रात को जब सारी दुनिया सोती है, बिल्कुल नोटबंदी की ही तर्ज पर देश को तालाबंदी में जकड़ दिया गया.

सन्नाटे और सदमे के कुछ हफ्ते गुजरने के बाद जब रोजी-रोजगार जाते रहे, लोगों की आंतें भूख से ऐंठने लगीं तो अपनी जिम्मेवारी दूसरे पर ओढ़ाकर राहत, मदद और शिकायत के निवारण के सारे कामों से कन्नी काटने का खेल शुरु हुआ. केंद्र ने कहा राज्यों का जिम्मा है, राज्यों ने कहा, सारी शक्ति तो केंद्र सरकार के हाथ में हैं और हमारी अंटी में पैसा भी नहीं है तो हम क्या करें, कैसे करें ? कोरोना वायरस का मजहब तलाशने में लगी मीडिया ऐसे समय में राज्य सरकारों की रवैये में नाफरमानी और हुक्मउदूली ढूंढ़ने लगी. तालाबंदी के महज पंद्रह दिनों के भीतर राहत और मदद का मामला एक फरियाद की शक्ल में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका था और सुप्रीम कोर्ट जनहित याचिका के तर्क को सिर के बल उलटते खुद ही सवाल पूछ चुका था कि तालाबंदी में फंसे ‘कामगारों को आश्रय गृहों में भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है और ऐसी स्थिति में उन्हें पैसे की क्या जरूरत है ? ’

कोरोना के कठिन काल में हमारे लोकतंत्र में लोग नहीं हैं, संस्ताओं की नजर में वे ‘खाली पेट याचना में पसरे हुए हाथ’ भर रह गये हैं. सरकार, मीडिया और अदालत के इस न्यायबोध से उकताकर अगर आप प्रतिरोध के स्वर में कुछ कहना चाहें तो कैसे कहिएगा. अनलॉक के इस पहले चरण में भी आपको मुंह बांधकर और दो गज दूरी बनाकर चलना है, ना बोल पायेंगे और ना ही एकजुट हो पायेंगे आप. यह नागरिक को अर्द्ध-नागरिक में बदलता समय है !

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