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चौधरी चरण सिंह पुण्यतिथि विशेष: किसानों को सत्ता तक पहुंचाने वाले राजनीति के असली चौधरी

अभिषेक लाकड़ा/मनोहर सैनी

चौधरी चरण सिंह का जन्म 1902 में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के नूरपुर में एक मध्यम वर्गीय किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने 1923 में विज्ञान से स्नातक की एवं 1925 में आगरा विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। कानून में प्रशिक्षित चरण सिंह ने गाजियाबाद से अपने पेशे की शुरुआत की।

चरण सिंह ने कांग्रेस से राजनीति की शुरुआत की। खुद को गांधीवादी कहते थे बाद में समाजवादी हो गए। अंग्रेजी जमाने मे कुछ समय क्रांतिकारी भी रहे। जाति और वर्गभेद मिटाने की बात करते थे पर कम्युनिस्ट नहीं थे। कोऑपरेटिव फार्मिंग के विरोधी थे। किसानों के मालिकाना हक की बात करते थे। कुछ विचारक उनको बड़े जमींदारों का नेता बताते थे पर जिस तरीके से बिना कोई लूप हॉल छोड़े जमींदारी उन्मूलन किया उसने हर गरीब किसान के दिल दिमाग में चरण सिंह को भगवान बना दिया। यूपी जैसे स्टेट में चकबंदी कर दी। जो किसान साहूकारों के नीचे दबा पड़ा था, बड़े जमींदारों के लिए खेती करता था, वो एक झटके में मालिक बन गया। एक नारा था, जमीन किसकी? जो बो रहा उसकी!

इससे किसान का नेचर भी बदल गया और धीरे धीरे खेती का भी। साहूकारी से निकला एक बड़ा किसान वर्ग धीरे धीरे खुद वही बन गया जिससे वो निकला था। जहां खेती बढिया थी वहां किसानों के बीच एक बड़ा बर्जुआ वर्ग भी पैदा हुआ। मालिकाना मिलते ही उसका स्वभाव भी बदल गया। किस हद तक बदला और क्या ठोस कारण था, ये अध्यन का विषय है। यूपी में बड़ी बड़ी मंडिया बनवाई। खासकर ईस्ट यूपी में।

श्री चरण सिंह ने विभिन्न पदों पर रहते हुए उत्तर प्रदेश की सेवा की एवं उनकी ख्याति एक ऐसे कड़क नेता के रूप में हो गई थी जो प्रशासन में अक्षमता, भाई – भतीजावाद एवं भ्रष्टाचार को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते थे। प्रतिभाशाली सांसद एवं व्यवहारवादी श्री चरण सिंह अपने वाक्पटुता एवं दृढ़ विश्वास के लिए जाने जाते हैं।

उत्तर प्रदेश में भूमि सुधार का पूरा श्रेय उन्हें जाता है। ग्रामीण देनदारों को राहत प्रदान करने वाला विभागीय ऋणमुक्ति विधेयक, 1939 को तैयार करने एवं इसे अंतिम रूप देने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। उनके द्वारा की गई पहल का ही परिणाम था कि उत्तर प्रदेश में मंत्रियों के वेतन एवं उन्हें मिलने वाले अन्य लाभों को काफी कम कर दिया गया था। मुख्यमंत्री के रूप में जोत अधिनियम, 1960 को लाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह अधिनियम जमीन रखने की अधिकतम सीमा को कम करने के उद्देश्य से लाया गया था ताकि राज्य भर में इसे एक समान बनाया जा सके।

देश में कुछ-ही राजनेता ऐसे हुए हैं जिन्होंने लोगों के बीच रहकर सरलता से कार्य करते हुए इतनी लोकप्रियता हासिल की हो। एक समर्पित लोक कार्यकर्ता एवं सामाजिक न्याय में दृढ़ विश्वास रखने वाले श्री चरण सिंह को लाखों किसानों के बीच रहकर प्राप्त आत्मविश्वास से काफी बल मिला।

श्री चौधरी चरण सिंह ने अत्यंत साधारण जीवन व्यतीत किया और अपने खाली समय में वे पढ़ने और लिखने का काम करते थे। उन्होंने कई किताबें एवं रूचार-पुस्तिकाएं लिखी जिसमें ‘ज़मींदारी उन्मूलन’, ‘भारत की गरीबी और उसका समाधान’, ‘किसानों की भूसंपत्ति या किसानों के लिए भूमि, ‘प्रिवेंशन ऑफ़ डिवीज़न ऑफ़ होल्डिंग्स बिलो ए सर्टेन मिनिमम’, ‘को-ऑपरेटिव फार्मिंग एक्स-रयेद्’ आदि प्रमुख हैं।

चरण सिंह कांग्रेस में रहे पर किसी से बनी नहीं। फिर खुद की पार्टी बनाई तो भी वे स्थिर नहीं रहे। उन्होंने पिछड़े वर्ग को भी उभार दिया। असल मे चरण सिंह ही पिछड़े वर्ग की राजनीति की शुरुआत करने वाले है। उन्होंने पिछड़े वर्ग को उभारा भी और इनके नेताओं को भी। बिना किसी लाग लपेट या लालच के मुलायम सिंह को अपनी राजनीतिक विरासत सौंप गए। गांव के गरीब यादव, त्यागी, कुर्मी, जाट, सैनी, गुज्जर किसान बिरादरियों को बता गए, खेत के साथ साथ राजनीति पर भी ध्यान दो। इसका असर इतना था कि बड़े बुड्ढे पहले अखबारों की बात को सच नहीं मानते थे। कहते थे कि ये सब लालाओं के अखबार है, टाटा बिड़ला के, ये क्यों किसान के पक्ष में बात लिखेंगे। लिखेंगे तो ये खुद खत्म हो जाएंगे।

चरण सिंह पॉलटिक्स का असर ये था कि लोगों में बड़े कारपोरेट, बनियों के खिलाफ़ एक नज़रिया बन गया था। इसका फायदा कम्युनिस्टों को भी मिला। चरण सिंह मुजफ्फरनगर जो जाट हार्टलैंड था, वहां से अपने राजीनीतिक जीवन की पहली और एकमात्र हार मिली। कामरेड ने उन्हें यहां से हरा दिया। बड़ौत जैसी सीट से माकपा का विधायक रहा। क्योंकि चरण सिंह की बनिया वर्ग विरोधी जाति विरोधी बातों ने कम्युनिस्टों को भी एक आधार दे दिया था। पूंजीपति विरोधी राजनीति की एक बात पॉल आर ब्रास की किताब में पढ़ी थी। वे लिखते है जिस दिन चरण सिंह ने वित्त मंत्री के तौर पर देश का बज़ट पेश किया था उस दिन बम्बई में विरोध में स्टॉक मार्केट बंद कर दिया था। इंडियन एक्सप्रेस में फ्रंट पेज पर हेडलाइन थी।

उनके बारें में कईं मिथ भी है। एक तो लोग उनको गांव का अनपढ़ जाट बताते है। हालांकि वे काफी पढ़े लिखे थे। एमएससी साइंस, एलएलबी साथ मे कईं किताबे भी लिखी। दुनिया के कई विश्विद्यालयों में रिसर्च में इस्तेमाल होती है। एक बात ये है कि वे जाट नेता थे। पर वे जिंदगी में कभी जाट महासभा जैसे संगठन तक के कार्यक्रम में नहीं गए। जाट स्कूल में वाइस प्रिंसिपल बनने से इसलिए मना कर दिया था कि स्कूल के नाम मे जातीय शब्द है। जब मौका मिला तो जाट कॉलेज को जनता कॉलेज बना दिया। मुजफ्फरनगर के जाट कॉलेज का नाम भी बदलवाया। भूमि सुधार में जब दलितों को जमीन दी तो उनके खिलाफ दिल्ली में जाटों ने पंचायत भी की पर उन्होंने फैसला नहीं बदला। इंटर कास्ट मैरिज के समर्थक थे। नेहरू से गुजारिश की थी, सरकारी नौकरी के लिए इंटरकास्ट मैरिज अनिवार्य हो।

किसान आज भी उन्हें अपना हीरो मानते है। चरण सिंह की जिंदगी में कईं विरोधाभास भी है। कांग्रेसी भी रहे, और समाजवादी भी, कम्युनिस्टों से भी गठबंधन किया और जनसंघियों से भी। इसलिए सबके अपने अपने विश्लेषण है।

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