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इतिहास रिपोर्ट

कभी वामपंथ के सहारे हक़ और अधिकार प्राप्त करने वाला मध्यवर्ग 21वीं सदी में वामपंथ विरोधी कैसे बना?

जब पेट पर लात पड़ने का डर सामने आ खड़ा होता है तो पहली चीज जो याद आती है, वह है एक कर्मचारी के रूप में अपने अधिकार और उसके बाद जो चीज याद आती है वह है वामपंथ, जिसकी वैचारिक छतरी तले इस देश के मध्यवर्गीय लोगों ने विभिन्न नौकरियों में अपने हितों की रक्षा के लिये संघर्ष किया। न सिर्फ संघर्ष किया, बल्कि अधिकार भी हासिल किए।

अधिकार…सेवा के स्थायित्व का, कर्मचारियों की न्यूनतम मानवीय गरिमा का, मूल्य सूचकांक पर आधारित वेतन और महंगाई भत्ते का, आकस्मिक हादसे में आश्रितों को संरक्षण का और सर्वाधिक महत्वपूर्ण…बुढापा के सहारे के रूप में पेंशन का। यह 1970 का दशक था जब बिहार और यूपी जैसे राज्यों में स्कूल, कालेजों के शिक्षकों ने अपने अधिकारों के लिये सघन संघर्ष शुरू किया था। मामूली से वेतन पर नौकरी करने वाले मास्साब और कभी-कभार मिलने वाले ग्रांट पर जीने वाले प्रोफेसर साब आदि ने अपने हक के लिये जो लंबा संघर्ष किया था वह वामपंथ की वैचारिक छाया में ही किया था।

उस पीढ़ी के लोग भूले नहीं होंगे कि जब आंदोलनों, धरना-प्रदर्शनों के दौरान उन पर लाठी चार्ज होता था या उनकी गिरफ्तारियां होती थीं तो विधान मंडलों में वामपंथी विधायक/पार्षद किस तरह आसमान सिर पर उठा लेते थे और अपने तर्कों के माध्यम से सरकार को निरुत्तर कर देते थे। उस दौर में सदनों में वामपंथी दलों की अच्छी और प्रभावी उपस्थिति होती थी।

1970-80 का दशक पूरे देश में ऐसे सफल आंदोलनों का गवाह रहा है। दशक के पूर्वार्द्ध में बैंकों का और कोयला उद्योगों सहित अनेक इकाइयों का राष्ट्रीयकरण हुआ तो उत्तरार्द्ध में अनियमित अनुदानों पर चलने वाले हजारों स्कूल/कॉलेजों का सरकारीकरण हुआ। दीन हीन से दिखने वाले मास्टर साहब लोगों को नियमित और सम्मानजनक वेतन मिला, कर्मियों के रूप में वाजिब कानूनी अधिकार मिले और समाज को सरकारी स्कूलों/कालेजों की ऐसी सौगात मिली जिनकी बहुत जरूरत थी।

बात चाहे रेलवे की हो या हवाई अड्डों की, बैंकों की हो या अन्य सार्वजनिक उपक्रमों की, स्कूलों की हो या कालेजों की… सरकारों के द्वारा इनके कर्मियों को जो मान्यता और सुविधाएं मिलीं उनके पीछे कर्मचारियों की पिछली पीढ़ियों का तप और संघर्ष था। उस पीढ़ी ने इस तप और संघर्ष में अपने को होम कर दिया और बहुत सारे कर्मचारी तो कुछ लाभ पाए बिना ही रिटायर या गोलोकवासी भी हो गए। लेकिन, उन्होंने आने वाली पीढ़ी के लिये काम के बेहतर माहौल, सेवा के स्थायित्व और बेहतर सुविधाओं का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

उस दौर के ऐसे तमाम आंदोलनों ने जो सफलताएं हासिल कीं उन्होंने स्थायी नौकरी और अच्छा वेतन पाने वाले लोगों के वर्ग का विस्तार किया जिसे आप मध्य वर्ग के विस्तार के रूप में भी देख सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की उपलब्धता बढ़ी, जनकल्याण की योजनाओं में बैंकों की भागीदारी बढ़ी, सार्वजनिक क्षेत्र की दर्जनों इकाइयों ने उत्पादन और रोजगार सृजन के नए दौर का आगाज़ किया, सरकारी स्कूल/कालेजों की बेहतर उपलब्धता ने ग्रामीण आबादी को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने में एक मुकाम हासिल किया, मध्य वर्ग के विस्तार और उनकी क्रय शक्ति में बढ़ोतरी ने बाजार की रौनक बढाने में योगदान दिया।

1990 का दशक युगांतरकारी बदलावों का दौर लेकर आया। सोवियत विघटन और पूर्वी यूरोप की भ्रष्ट साम्यवादी सरकारों के पतन ने वामपंथ को राजनीतिक रूप से कमजोर किया और धारणाओं के स्तर पर उसकी प्रासंगिकता को लेकर सवाल उठाए जाने लगे।

मीडिया अपनी नैतिक और वैचारिक आभा खो कर कारपोरेट के प्रचारतंत्र का हिस्सा बनने लगा। संचार क्रांति और वैश्वीकरण ने उदारवाद को आगे बढ़ने के लिये समतल मैदान दिया। युग बदलने लगा, धाराएं दिशा बदलने लगीं और विचार कहीं नेपथ्य में गुम होने लगे। सामने आया नग्न उपभोक्तावाद, जो मुक्त आर्थिकी का सहजात है और समाज की सामूहिक चेतना का शत्रु भी।

लालच बढाते विज्ञापन, कारपोरेट के एजेंट बनते सेलिब्रिटीज, एक-दूसरे के सीने पर लात रख कर आगे बढ़ जाने की प्रवृत्ति और मानवीय मूल्यों का ह्रास… इन सबने मिल कर सबसे अधिक क्षति जिस चीज को पहुंचाई वह थी सामूहिक चेतना। व्यक्ति स्वातन्त्र्य पर अधिक जोर देने वाले उदारवाद के प्रारंभिक कदमों की आहट मन को और कानों को सुहावनी लगने वाली थी, वहीं सरकारी लालफीताशाही में जकड़े उद्योग, व्यापार और बाजार के लिये मुक्त होती अर्थव्यवस्था नए अवसरों की राह खोलने वाली थी। उदारवाद ने उद्योग-व्यापार में निवेश के नए अवसरों को बढ़ाया, बाजार को खोला और मध्यवर्गीय कामगारों की समृद्धि में वृद्धि की।

स्थायी नौकरी, नियमित वेतन और प्रोन्नति, बढ़ती समृद्धि, बाजार में उपभोक्ता सामग्रियों की भरमार और समृद्धि दर्शाने की ललक में उन सामग्रियों के क्रय के पीछे पागल होते मध्यवर्गीय लोग। लोन की उपलब्धता, ईएमआई की सुविधा जैसी चीजें बढ़ती समृद्धि के साथ बोनस के रूप में आ रही थी।

अब उन लोगों का मिजाज बदलने लगा जिन्होंने लम्बे संघर्ष के बाद व्यवस्था में अपने लिये जगह हासिल की थी। उनके ड्राइंग रूम में सोफे आ गए, सोफे के सामने फर्श पर गलीचे आ गए, ब्लैक एंड व्हाइट टीवी की जगह पहले कलर टीवी ने ली, फिर एलईडी, फिर स्मार्ट टीवी ने ली। अब…सोफे पर बैठ कर, गलीचे पर पैर रख कर स्मार्ट टीवी में न सिर्फ बेसिर पैर की फिल्में और सीरियल, बल्कि राष्ट्रवादी बहस आदि देखना इस वर्ग को अच्छा और रुचिकर लगने लगा।

उसके सरोकार बदलने लगे और उसने अपने को समाज के सामूहिक सवालों से काटना शुरू किया। उसकी विकृत होती रुचियों ने टीवी चैनलों के कंटेंट को घटिया बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

अब इस वर्ग को वामपंथ अप्रासंगिक लगने लगा और वंचित समुदायों की बात करने वाला कोई भी आदमी वामपंथी लगने लगा। वामपंथ की इसकी समझ स्टालिन के दमन और चौशेस्क्यू के भ्रष्टाचार की कहानियों से परिभाषित होने लगी।

खुद सुविधापूर्ण जीवन का आदी हो चुका यह वर्ग इस दौर के अन्य आंदोलनों, खास कर वंचितों के सवालों को लेकर होने वाले आंदोलनों के प्रति हिकारत के भाव रखने लगा।

सुविधाभोगी, स्वार्थी और आत्मकेंद्रित हो चुका यह वर्ग निजी स्कूलों के प्रसार के लिये सर्वाधिक उत्तरदायी है जिसने सरकारी स्कूलों की चरमराती व्यवस्था के खिलाफ सवाल उठाने के बजाय अपने बच्चों को निजी स्कूल में भेजना शुरू किया। यह उन आम बच्चों से अपने बच्चों को करियर की दौड़ में आगे रखने की मानसिकता से प्रेरित था जिनके लिये सरकारी स्कूलों में ही रह जाने की नियति थी। शिक्षा, चिकित्सा और परिवहन जैसी सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण का इस वर्ग ने मौन समर्थन किया क्योंकि इन्हें अपनी बढ़ी हुई आर्थिक हैसियत का अंदाजा था और यह गुमान भी कि वे अपने लिये और अपने बच्चों के लिये ऐसी सेवाएं खरीद सकते हैं। दुनिया अपने सोचे अनुसार नहीं चलती। उसकी गति विचित्र तो होती ही है, समय के अनुसार कभी वक्र भी होती है। अपनी नौकरी के अलावा बाकी सारी कायनात के निजीकरण का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन करने वाली यह प्रजाति तब सकते में आने लगी जब इसी के सक्रिय समर्थन से राजनीति में जगह मजबूत करने वाली शक्तियों ने इनकी कुर्सियों के नीचे पटाखों की लड़ियों में माचिस की तीलियाँ सुलगानी शुरू कर दी।

आज की तारीख में रेलवे, बैंक, एयरपोर्ट, स्कूल, कॉलेज, कोयला उद्योग सहित सार्वजनिक क्षेत्र की अन्य कम्पनियों के कर्मचारी अपनी सेवा और सुविधाओं के स्थायित्व को लेकर डरे हुए हैं। उनका डर वाजिब है क्योंकि उनके ही कन्धों पर चढ़ कर सत्ता तक पहुंचने वाली शक्तियां उनका निजीकरण कर रही हैं।

अब इन कर्मचारियों के आंदोलनों में फिर से वामपंथी शक्तियां ही सक्रिय हो रही हैं क्योंकि आर्थिक नीतियों के धरातल पर भाजपा और कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जबकि समाजवाद का नाम ले कर राजनीति करने वाली पार्टियों को अपने जख्मों को गिनने से ही फुर्सत नहीं। कामगारों/कर्मचारियों का हर क्षेत्र आंदोलित है, आशंकाओं से भरा हुआ है। आगामी वर्ष की शुरुआत में इन संघर्षों को धार देने की तैयारियां हो रही हैं और किसी अंधेरे कोने में पड़े कुछ वामपंथी ट्रेड यूनियन नेता अपने गर्दो-गुबार झाड़ कर इस गर्म होती हवा को दिशा देने की कोशिश में हैं।

लेकिन…आंदोलन की राह पर चल पड़े बाबू वर्ग को यह अंदाजा शायद न हो कि वह हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है। उसका वर्गीय चरित्र उसके आंदोलन के चरित्र को प्रभावित कर रहा है और यही उसकी राह की सबसे बड़ी बाधा है।

अपने पूर्ववर्त्तियों के तप और संघर्षों और इनसे प्राप्त उपलब्धियों को गंवाने वाली पीढ़ी खुद को तो नहीं ही बचा पाएगी, बल्कि अपनी अगली पीढ़ी को गुलामी का अभिशाप दे कर जाएगी।

बात रही वामपन्थ की, तो…अपनी खुशफहमी में कोई चाहे जितने भ्रम पाले रहें, जब भी कामगारों के मौलिक हितों पर और उनके अस्तित्व पर सवाल उठेंगे…वामपन्थ प्रासंगिक होकर सामने होगा।

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