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रिपोर्ट

कांग्रेस के नए घोषणा पत्र में समाजवाद हावी! क्या अपनी जड़ें पहचानने में लगी है कांग्रेस?

कांग्रेस ने अपना घोषणापत्र जारी किया है, जिस पर कई लोग खुश हैं तो कई महज इसे जुलमा बता रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश लिखते हैं, एक संतुलित, समावेशी और जनपक्षी घोषणापत्र जारी करते हुए आज एक नई कांग्रेस उभरती नजर आई! निश्चय ही, विचार के‌ स्तर पर पार्टी ताकतवर हुई है!भाजपा के लिए इसका वैचारिक स्तर पर मुकाबला करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होगा! एक कारपोरेट पक्षी-संकीर्ण हिंदुत्वा सोच के संगठन के पास इस तरह के समावेशी और जनपक्षी घोषणापत्र की भला क्या काट हो सकती है?

इस घोषणापत्र में मुझे डॉ मनमोहन सिंह या पी चिदंबरम सरीखे पुराने कांग्रेसी नेताओं के आर्थिक विचारों से ज्यादा प्रो अमर्त्य सेन और थामस पिकेटी जैसे विश्वविख्यात जनपक्षी अर्थशास्त्रियों की छाया दिखाई दे रही है! रोज़गार, किसान, मानव-विकास(शिक्षा और स्वास्थ्य आदि) और सामाजिक सौहार्द इसके सर्वाधिक अहम पहलू हैं!
यह सब इस घोषणापत्र का उजला और शानदार पक्ष है! लेकिन कांग्रेस के लिए मुश्किलें कुछ दूसरे ढंग की हैं! वह बुनियादी तौर पर संगठन की हैं! दक्षिणी राज्यों के अलावा पंजाब जैसे राज्यों में इस घोषणापत्र का बहुत अच्छा असर दिख सकता है! लेकिन पार्टी की असल चुनौती होंगे, हिन्दी भाषी राज्य!

एक समावेशी और जनपक्षी चुनाव घोषणापत्र को समाज में ले जाने और आखिरी आदमी तक पहुंचाने के लिए कांग्रेस के पास हिन्दी भाषी क्षेत्रों, ख़ासकर यूपी, बिहार और झारखंड में समावेशी और जनपक्षी सांगठनिक तंत्र का सख्त अभाव है! दक्षिण में उसका संगठन अपेक्षाकृत समावेशी है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उसने इस दिशा में अच्छी कोशिश की है। महाराष्ट्र और गुजरात में भी कांग्रेस का संगठन ले-देकर बचा हुआ है! हिन्दी भाषी राज्यों के मुकाबले यहां कांग्रेस संगठन कुछ हद तक समावेशी भी है!

यूपी में भाजपा को जनता का बड़ा हिस्सा इस बार खारिज करने के मूड में है! पर उसे कारगर और सक्रिय विकल्प नहीं नजर आ रहा है! बसपा-सपा जनता की इच्छा के अनुरूप भाजपा को डटकर चुनौती नहीं दे पा रही हैं। अगर इस चुनाव में कांग्रेस यूपी में इनसे अपेक्षाकृत छोटे जनाधार की पार्टी होने के बावजूद इन दोनों का ‘इंजन’ होती तो शायद वह दोनों को भटकने से रोक पाती या ज्यादा मुखर होकर मैदान में उतरने का बल देती! पर समस्या उसके साथ भी कुछ कम नहीं, यूपी में कांग्रेस के पास एक लुंज-पुंज संगठन है। वह ना तो समावेशी है और ना ही सक्रिय! ऐसे में मिला-जुला कर ही यूपी जैसे बड़े प्रदेश में कुछ हासिल होने की संभावना बनती है!

बहरहाल, अभी भी वक्त है, सपा-बसपा और कांग्रेस के पास कि वो समझदारी दिखाएं और फौरी तौर पर संविधान और जनतंत्र पर मंडराते खतरे को समझें!

घोषणापत्र पर पत्रकार नदीम एस अख्तर ने लिखा है, कांग्रेस का घोषणापत्र आते ही देश का माहौल बदल गया है. जनता बोलने लगी है. एक खलबली मची है. जनता में भी और राजनीतिक गलियारे में भी. जिस राहुल गांधी को बीजेपी ने -पप्पू- घोषित किया हुआ है, देश की जनता उसकी तरफ उम्मीद से देखने लगी है. अचानक माहौल में आ रहे इस परिवर्तन को अगर आप महसूस नहीं कर पा रहे हैं तो आप जमीन से कटे हुए हैं. कुछ चीजों पर गौर कीजिए.

मोदी एक बुजुर्ग की भूमिका में हैं. सफेद बाल और वही थकी हुई अदा. आप मानें या ना मानें उन्होंने पिछले पांच सालों में अपनी छवि एक बड़बोले और नाकाम व्यक्ति की बना ली है, जो करता-धरता कुछ नहीं, बस सारी चीजों के लिए कांग्रेस और नेहरू को जिम्मेदार ठहराता रहता है. ऐसे में जनता उनसे ये पूछना चाहती है कि अगर यही करना था तो पीएम काहे बने थे ? अच्छे दिन के सपने काहे दिखाए थे ?

दूसरी तरफ राहुल एक युवा हैं जो बेहिचक जनता के बीच घूम रहे हैं. आप राहुल पे लाख जोक बना लें पर जनता कोयला और हीरा की परख जानती है. उसके ज्ञान को हल्के में ना लें. सो राहुल में देश की जनता को भविष्य दिखता है और मोदी में एक थका-हारा बुजुर्ग, जिसके वश में कुछ करना नहीं है. बस संघ से आज्ञा लेना और कांग्रेस को गरियाना, उनके यही दो काम रह गए हैं. उनका विजन जो था, वह पिछले पांच साल में ना दिखा और ना लागू हो पाया. सरदार पटेल की विश्व की सबसे ऊंची मूर्ती जरूर बनी, जिसका भविष्य में देश की जनता आचार डालेगी.

आज कांग्रेस का घोषणापत्र जारी करने के वक्त सोनिया गांधी भी राहुल के बगल में खड़ी थीं. जनता को ये अच्छा लगा. सोनिया को इस देश की जनता ने 10 साल तक गद्दी सौंपी. फिर मोदी जी के विकास के भुलावे में आकर कांग्रेस को जमीन पर पटक दिया पर मोदी ने पिछले पांच साल में ये दिखा दिया कि राजकाज चलाना उनके वश में है नहीं. राफेल यानी रक्षा पे बात होती है तो रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण नहीं बोलतीं. वित्त मंत्री अरुण जेटली बोलते हैं. अगर निर्मला जी इतनी ही नाकाबिल हैं तो फिर उनको रक्षा मंत्री काहे बनाया? जेटली जी को ही Minister of All घोषित कर देते! इसीलिए कह रहा हूं कि मोदी जी को राजकाज चलाना नहीं आता.

एक और उदाहरण देता हूं. अंतरिक्ष में भारत ने अपने जिस डमी सेटेलाइट को मिसाइल से नष्ट किया और जिसे बताने के लिए मोदी जी ने पूरे देश की सांसें पौन घंटे तक रोके रखीं, उसकी ना सिर्फ पूरी दुनिया में निंदा हो रही है बल्कि ये दुनियाभर के मुल्कों के लिए स्पेस मिशन में परेशानी पैदा करेगा. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने इस घटना को मानवता के लिए “Terrible” कहा है क्योकि जिस सैटेलाइट को नष्ट किया गया, उसके सैकड़ों टुकड़े कचरे के रूप में अंतरिक्ष में तैर रहे हैं. उससे अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) को खतरा हो गया है जो कई देशों का सम्मिलित उपक्रम है. साथ ही अंतरिक्ष में भविष्य में जाने वाले मानवों यानी एस्ट्रोनॉट के लिए भी ये टुकड़े घातक और जानलेवा हो सकते हैं. अगर ये उनके स्पेसशिप या स्पेसवॉक करते हुए उनसे टकरा गया, तो उनकी जान जा सकती है. दुनियाभर में भारत के इस कदम के लिए आलोचना हो रही है पर मोदी जी को इससे फर्क नहीं पड़ता. उन्होंने कांग्रेस के राज में हासिल हुई इस तकनीक के इस्तेमाल की इजाजत अपने राज में दे दी. सिर्फ इसलिए कि चुनाव का वक्त है, तो कुछ वोट मिल जाएं. यहीं पे सवाल है.

क्या कांग्रेस 2012 में हासिल इस तकनीक का अंतरिक्ष में इस्तेमाल नहीं कर सकती थी ? कर सकती थी. पर उसे पता था कि इससे अंतरिक्ष में कचरा फैलेगा और भविष्य के स्पेस मिशन के लिए ये घातक होगा. सो उसने परीक्षण नहीं किए. पर मोदी जी को हर चीज में इवेंट चाहिए. देश की हर उपलब्धि वह अपने नाम करना चाहते हैं और वोट बटोरना चाहते हैं. वे कहते हैं कि कांग्रेस राज में कुछ नहीं हुआ. तो कोई मोदी जी से पूछे कि जब कुछ नहीं हुआ तो स्पेस में सैटेलाइट को मार गिराने की तकनीक क्या इसरो ने आपके राज में हासिल की ?? नहीं ना. और फिर चांद पर पहला भारतीय जब गया था तो पीएम कौन था ? आप या अटल जी या फिर इंदिरा जी ?? इंदिरा जी थीं ना ??

ये उदाहरण इसलिए गिना रहा हूं कि मोदी जी की गलतबयानी से जनता तंग आ गई है. अरे ! आप अपने काम दिखाओ ना. कांग्रेस, पाकिस्तान, श्मशान, कब्रिस्तान, आन-बान-शान और तान पर कब तक लटके रहोगे मोदी जी ??!!! जनता रिजल्ट चाहती है और आप हैं कि सिर्फ बोलना जानते हैं. करते नहीं हैं. ये बात जनता को खलती है और वह 2019 में बताएगी कि लोकतंत्र का मतलब क्या होता है ?? तो अब मुद्दे पर लौटते हैं. मैं बात कर रहा था कांग्रेस के मेनिफेस्टो की. राहुल गांधी ने बहुत सलीके से अपना मेनिफेस्टो बनाया है, ये बात तो मैंने पिछली पोस्ट में लिख दी. लेकिन उसे जिस तरह जनता के सामने प्रेजेंट किया है, वही चीज बीजेपी को बेचैन करने के लिए काफी है. बीजेपी राहुल को पप्पू बोलती है, राहुल ने आज पूरी बीजेपी को पप्पू बना दिया. जानते हैं उन्होंने कांग्रेस के मेनिफेस्टो के कवर पर क्या लिखा है ??

राहुल ने लिखा है- हम निभाएंगे यानी Congress will deliver. अब सोचिए एक ही झटके में बीजेपी को जमीन पर लिटाने के लिए इससे बड़ा कोई पंच लाइन हो सकता था क्या ??!! मतलब कि बीजेपी ने, मोदी जी ने नहीं निभाया, डिलीवर नहीं किया पर जनता निराश ना हो. हम निभाएंगे. जो कहा है, वो कर के दिखाएंगे. और इसी बात को मैं बार-बार दोहराता हूं कि राहुल युवा हैं और अपने काम से उन्होंने अपनी एक क्रेडिबिलिटी बनाई है. ऊपर से गांधी परिवार की भी एक अपनी अलग क्रेडिबिलिटी है. सोनिया ने देश को सूचना का अधिकार, मनरेगा और आधार कार्ड जैसी नई चीजें दीं. लाख विरोध के बावजूद. यानी जो कहा, वो निभाया. पर चूंकि मोदी जी नहीं निभा पाए, सो राहुल अपनी उसी क्रेडिबिलिटी को लेकर जनता के बीच आ गए. कह दिया- हम निभाएंगे. अभी हाल में ही कांग्रेस ने तीन राज्य जीते और राहुल ने जो कहा, वो निभाया. किसानों का कर्जा माफ किया. 10 दिनों के भीतर.

अब कहिए. 2019 में जनता किसे वोट देगी??!! मोदी को या राहुल को ??!! बस कांग्रेस का घोषणापत्र जारी करते हुए राहुल की तस्वीर देखिए, सोनिया गांधी को देखिए और कांग्रेस के घोषणापत्र का कवर देखिए- जिस पर लिखा है- हम निभाएंगे. फिर सोचिए कि 2019 के चुनाव नतीजे क्या होंगे??!! राहुल को जनता वोट ना दे तो फिर किसे दे. मोदी जी ने कोई उम्मीद छोड़ी भी है ??!!

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