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तथाकथित महान संस्कारों की असलियत यही है कि भ्रष्टाचार हमारे समाज की रग-रग में दौड़ता है

प्रेम शुक्ल

फ़तेहपुर सीकरी गया तो क़िले का अस्तबल दिखाते हुये गाइड बताने लगा कि यहाँ से ही सबसे पहले अकबर ने घोड़ों पर मुहर लगाने की शुरुआत की थी। वज़ह पूछने पर वो इससे ज़्यादा कुछ नहीं बता पाया कि इससे घोड़ों की पहचान और गिनती करने में आसानी होती थी।

ये ज़वाब मुझे संतुष्ट नहीं कर पाया। असली वज़ह जानने की जिज्ञासा बार-बार उठती रही। वापस आकर मैंने ‘आईने अकबरी’ पढ़ना शुरु किया। कुछ और स्रोत भी खंगाले। तब जो असल वजह पता चली वो ज़्यादा दिलचस्प इसलिये थी कि वो आज से लगभग साढ़े चार सौ साल पहले के हमारे हिन्दुस्तानी समाज के चिठ्ठे खोलती थी।

असल में अकबर अपनी सेना की क़ाबिलियत और क्षमता का ख़ास ख्याल रखता था। अरब, तुर्की, कश्मीर से बढ़िया नस्ल के घोड़े मंगवाता था। अपनी निगरानी में सैनिकों की भर्ती करता था। भर्ती हुये सैनिकों को वे बढ़िया घोड़े दिये जाते थे। लेकिन कई बार होता ये था कि भर्ती में मिले महंगे घोड़ों को बेचकर भाई लोग सस्ते घोड़े खरीद लेते थे और बाक़ी बचे रुपये अंदर कर लेते थे। या फिर शाही अस्तबल के कर्मचारी ही इस तरह के कारनामे अंजाम दे डालते थे। इस तरह के भ्रष्टाचार को रोकने के लिये अकबर ने घोड़ों पर शाही मुहर लगाने और इनका रजिस्टर मेन्टेन करने की शुरुआत की थी।

भ्रष्टाचार और रिश्वतख़ोरी के कुछ और क़िस्से भी ‘अकबरनामा’ में मिलते हैं।

अपने देश की संस्कृति और संस्कारों की महानता के बारे में लोग जितना भी गर्व कर लें, जितने भी जुमले उछाल लें, सच यही है कि भ्रष्टाचार हमारे समाज की रग-रग में दौड़ता है।

बाक़ी सब तो छोड़िये। इस धर्मपरायण देश में आप किसी भी बड़े-छोटे मन्दिर में जाकर देख लें। लोग अपना काम कराने की अभिलाषा लिये भगवान को रिश्वत देने जाते हैं। रिश्वत के पैसे, चढ़ावे, मिठाई लिये लोग लम्बी-लम्बी लाइनों में लगकर अपनी बारी के इन्तज़ार में खड़े रहते हैं। उनका सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान ईश्वर इतना सीधा सा लॉजिक उनके दिमाग़ में नहीं डाल पाता कि यदि उसने ही ये सारी सृष्टि बनाई है, ज़मीन से आसमान तक जो कुछ भी है, कण-कण उसका है, उसे इनके कुछ रुपयों या चढ़ावे की क्या ज़रूरत पड़ गई !

लोगों की अभिलाषायें भी कुछ ऐसी होती हैं — हे भगवान फलां काम के चक्कर में कई लोग लगे हैं लेकिन देखना प्रभु मैं तुम्हें इतने का चढ़ावा चढ़ा रहा हूँ उनका काम मत होने देना, मेरा करवा देना ! या फिर हे भगवान ! पड़ोसी का बच्चा मेरे बच्चे से ज्यादा नम्बर न लाने पाये, मेरे बच्चे को सबसे ज़्यादा नम्बर दिलवाना फिर मैं तुम्हें सवा किलो लड्डू चढ़ाऊंगा या घी के दिये जलाऊंगा !

मतलब उन्हेंं उनके प्रभु इतना भी ज्ञान नहीं देते कि बच्चा तुम और तुम्हारा पड़ोसी या अलाने-फलाने सब मेरे ही बच्चे हैं, मैं थोड़े से रुपयों या चढ़ावे के लालच में उनका काम बिगाड़ के तुम्हारा कैसे बनाऊं ? क़ायदे से तो प्रभु को करना ये चाहिये था कि ऐसे भक्तों को कड़ी चेतावनी दें कि ख़बरदार जो मुझे रिश्वत देने की जुर्रत की ! मुझे अपने जैसा भ्रष्ट रिश्वतख़ोर समझ रखा है क्या ?!!

ऊपर से कोढ़ में खाज ये कि आप भारत के किसी भी मंदिर के बाहर की पूजासामग्री या प्रसाद की दुकानों में चले जायें शायद ही कोई दुकान हो जहाँ शुद्ध मिठाई मिलती हो। कई बार तो लोग ये भी कहते सुने जाते हैं — भैया पूजा वाला घी देना। दिये जलाने हैं खाना नहीं है ! मतलब भगवान को जो दिये जलायेंगे उसमें महंगा वाला असली घी जला के पैसे क्यों बर्बाद करना। नक़ली घी ही सही रहेगा जो शायद गंदे तेल या किसी जानवर की चर्बी से बनाया गया होगा। भगवान तो इतना मूर्ख और लालची है कि मुफ़्त का माल देखते ही सबकुछ भूल के इनकी मनचाही मुराद पूरी कर देगा !

मतलब ईश्वर जो इनकी ही मान्यताओं के अनुसार सभी अच्छाइयों-आदर्शों का सर्वोच्च प्रतीक है उसे रिश्वत में मिलावटी मिठाई या नकली घी या कुछ रुपये या सोना-चांदी चढ़ा कर हमारे भक्त लोग अपना काम निकलवाना चाहते हैं।

और ये इतनी सामान्य बात है कि इसमें किसी को कोई गड़बड़ी नज़र नहीं आती !

इनके आदर्श आज भी जनता का खून चूसकर तलवारों और ताक़त के बल पर राज करनेवाले वो राजे-महाराजे होते हैं जो सिर्फ़ सेवा कराना जानते थे और छोटी-छोटी बातों पर किसी की गर्दन कटवाने से पहले नहीं सोचते थे।

आज भी अधिकतर आबादी लोकतन्त्र और आदमी-आदमी के बीच बराबरी का कॉन्सेप्ट नहीं समझती।

इसीलिये ये लोग अपना नेता भी ऐसे लोगों को ही चुनते हैं। ईमानदारों के बदले ये अपराधियों, अय्याशों को अपना विधायक, सांसद चुनते हैं। बड़बोलों झूठों में इन्हें अपना तारणहार नज़र आता है।

शायद बहुत से लोगों को ये बातें बेकार की लगेंगीं लेकिन हमारे तथाकथित महान संस्कारों की असलियत यही है।

हमारी अधिकांश आबादी के ईश्वर और आदर्शों की सच्चाई यही है।

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