लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

समाज

भारतीयों के खून में रिश्वतखोरी है इसलिए बिकाऊ हैं

राजीव मित्तल

भारतीयों के खून में रिश्वतखोरी है इसलिए बिकाऊ हैं

भ्रष्टाचार मुक्त देशों में शीर्ष पर गिने जाने वाले न्यूजीलैंण्ड के लेखक ब्रायन ने भारत में व्यापक रूप से फैले भष्टाचार पर एक लेख लिखा..जानिए क्या है उसमें.. अनुवाद विनोद कुमार और संपादन इस नाचीज ने किया है…

–भारतीय लोग होब्स विचारधारा के हैं (अनियंत्रित असभ्य स्वार्थ की संस्कृति वाले)

–भारत में भ्रष्टाचार भारतीय संस्कृति का अंग है.. इसलिये हम भारतीय भ्रष्टाचारियों से और भ्रष्ट माहौल में बिलकुल असहज नहीं होते.. तभी तो इस देश में ईश्वर और भ्रष्टाचार कण कण में व्याप्त हैं.. भारतीय भ्रष्ट व्यक्ति का विरोध करने के बजाय उसे सहन करते हैं यहाँ तक कि उसे गले लगाने से भी परहेज नहीं करते.. तब तो वो उनका और प्यारा हो जाता है अगर जाति और धर्म मेल खाता हो..
दुनिया की कोई भी नस्ल इस कदर जन्मजात भ्रष्ट नहीं पायी जाती..

….ये जानने के लिये कि भारतीय इतने भ्रष्ट क्यों होते हैं उनकी जीवनपद्धति और परम्पराओं पर एक नजर..

–भारत मे धर्म लेनदेन वाला व्यवसाय है.. भारतीय लोग ईश्वर को भी रिश्वत देते हैं इस उम्मीद में कि वो बदले मे दूसरों की तुलना में इन्हें फल देने में वरीयता देगा.. धर्मस्थल की चहारदीवारी के बाहर हम इसी लेनदेन को भ्रष्टाचार कहते हैं और आदर्शों का शोर मचाते हैं..

–जब यूरोपियन हमारे देश में आये तो यहाँ स्कूल बनवाये.. जब भारतीय यूरोप और अमेरिका जाते हैं तो वो वहाँ मंदिर बनाते हैं.. यह अंधभक्ति और स्वर्ग नर्क की अवधारणा से जुड़े होने की वजह से हमारा निरा बकलोलपन है..

–भारतीयों को लगता है कि अगर ईश्वर को रिश्वत दे कर काम कराया जा सकता है तो फिर कुछ भी ग़लत नहीं.. इसीलिये भारतीय इतनी आसानी से जन्मजात भ्रष्ट बन जाते हैं..

इस देश की संस्कृति इसीलिये इस तरह के व्यवहार को आसानी से आत्मसात कर लेती है.. क्योंकि भ्रष्टता धर्म को स्वीकार्य है..

–भारतीयों का भ्रष्टाचार के प्रति लगाव हज़ारों साल से है.. इतिहास बताता है कि कई शहर और राजधानियों को वहां के द्वारपालों को किले खोलने के लिये और कमांडरों को सरेंडर करने के लिये घूस देकर जीता गया.. और इसके अनगिनत उदाहरण आपको मिलेंगे..

–भारतीयों के भ्रष्ट चरित्र का ही नतीजा है कि भारतीय उपमहाद्वीप में बेहद सीमित युद्ध हुये.. चकित कर देने वाली बात यह है कि भारतीयों ने प्राचीन यूनान और माडर्न यूरोप की तुलना मे बहुत कम युद्ध लड़े। अंतिम साँस तक युद्ध थोथी शान दिखाने को ही लड़े गए जिनके पीछे कोई मकसद था ही नहीं क्योंकि राष्ट्र कहीं नहीं था…

–भारत में तो विदेशियों के खिलाफ युद्ध की जरूरत ही महसूस नहीं की गयी.. चूँकि घूस देना ही सेना को रास्ते से हटाने के लिये काफी था इसलिए कोई भी आक्रमणकारी रिश्वत के बल पर भारतीय राजा को, चाहे उसकी सेना में लाखों सैनिक क्यों न हों, युद्ध के मैदान से हटा सकता था..

..अंग्रेजों को भारत को प्लेट में रख थमा देने वाले प्लासी के युद्ध में 60 हज़ार भारतीय सैनिकों ने मुकाबला किया ही नहीं.. रॉबर्ट क्लाइव ने नवाब के सेनापति को बंगाल का नवाब बनाने की लुभावनी रिश्वत दी और पूरी बंगाल की सेना मात्र तीन हज़ार वाली अंग्रेजों की फ़ौज के सामने दुम दबा के बैठ गई..(और अंग्रेजों की तुरत फुरत तैयार की गयी बंगाल आर्मी में मात्र पचास गोरे थे बाकि सब भारतीय) यही नहीं.. नवाब सिराजुद्दौला को हटवाने के लिए सारा धन क्लाइव को दिया बंगाल के मारवाड़ी सेठों ने..

…भारतीय किलों को जीतने के लिए हमेशा पैसे का जम कर लेनदेन हुआ.. गोलकुंडा का किला 1687 में पीछे का गुप्त द्वार खुलवाकर जीता गया.. मुगलों ने मराठों और राजपूतों को कुल मिला कर रिश्वत से जीता.. श्रीनगर के राजा ने दारा के पुत्र सुलेमान को औरंगजेब को पैसे के बदले सौंप दिया। ऐसे हज़ार मामले हैं, जहाँ भारतीयो ने सिर्फ पैसे के लिये बड़े पैमाने पर गद्दारी की..

कुल मिला कर भारतीयों में देश तक बेच देने वाला सौदेबाजी का ऐसा कल्चर है, जिसकी मिसाल दुनिया भर में कहीं नहीं मिलती..

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *