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हैदर से अपनी मौत का इंतक़ाम लेने को कहने वाले इस एक्टर की आज पहली पुण्यतिथि है

“रूहदार…अग़र तुम वाक़ई में बच गए, तो मेरा एक पैग़ाम दे देना, मेरे बेटे हैदर को. उससे कहना कि वो मेरा इंतक़ाम ले….मेरे भाई से. उसकी उन दोनों आंखों में गोलियां दागे, जिन आंखों ने उसकी मां पर फ़रेब डाले थे. वो आंखें, जो उसे यतीम बना गईँ”

शायद ही कोई होगा जो साल 2014 में आई विशाल भारद्वाज की फ़िल्म हैदर के इस संवाद से नावाक़िफ़ हो. फ़िल्म का बेहद ही ज़रूरी हिस्सा था ये डायलॉग. ये पैग़ाम हैदर को उसके अब्बू, डॉक्टर हिलाल मीर की जानिब से मिला था.
डॉक्टर हिलाल मीर…कुछ याद आया ? लंबी कद-काठी, आकर्षक व्यक्तित्व, देखने में सुनील दत्त की माफ़िक़ नज़र आने वाला शख्स, रौबदार आवाज़. क्या-क्या बताए मरहूम अभिनेता ‘नरेंद्र झा’ के बारे में.

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2 सितंबर, 1962 को बिहार के मधुबनी ज़िले के कोइलख गांव में जन्मे नरेंद्र नारायण झा का बचपन से फ़िल्मों में आने का कोई सपना नहीं था. संगीत में तो उनकी रुचि थी मग़र एक्टिंग का प्लान दूर-दूर तक नहीं था. पिता शुभनारायण झा गांव के ही एक हायर सेकंडरी स्कूल में प्रिंसिपल थे. उनका सपना था कि बेटा कन्हैय्या (नरेंद्र का निक नेम) पढ़-लिखकर I.A.S. या I.P.S. अफ़सर बने मग़र होनी को कुछ और ही मंज़ूर था.

बिहार में शुरुआती पढ़ाई करने के बाद नरेंद्र ने दिल्ली की ओर रुख़ किया. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास विषय से एम.ए. किया. इसी दौरान उनके अंदर के एक्टिंग के कीड़े ने अपना फन फैलाना शुरू कर दिया.

अभिनय की ओर रुझान

कोइलख गांव में नाट्य परिषद होने की वजह से कई सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहते थे. नरेंद्र के पिता और बड़े भाई भी इनमें अभिनय करते थे. उनकी देखा-देखी नरेंद्र भी बचपन से ही इनमें हिस्सा लेने लगे थे. झांसी की रानी पर आधारित नाटक में अंग्रेज़ अधिकारी का एक रोल तो उनके हिस्से ही बंधा हुआ था. इसके बाद स्कूल-कॉलेज में भी नरेंद्र नाटकों में हिस्सा लिया करते थे.
JNU से पढ़ाई पूरी करने के बाद लगभग साल भर उन्होंने दिल्ली में ही रह कर सिविल सर्विसेज की तैयारी की. UPSC की परीक्षा में पहली बार में असफ़ल होने के बाद ही उनका दिल इससे हट गया. जब इसमे मन नहीं रमा, तो अभिनय की ओर चल पड़े.

अपने मन की बात जब नरेंद्र ने पिता से कही तो उन्होंने कन्हैय्या को अभिनय की तकनीक समझने के लिए व्यवहारिक शिक्षा लेने की सलाह दी. पिता के कहने पर ही उन्होंने एक्टिंग की बारीकियां सीखने के लिए दिल्ली के श्रीराम सेंटर फ़ॉर आर्ट एंड कल्चर में दाख़िला ले लिया. ये साल 1991 था.

अभिनय में सबसे बड़ी परेशानी

नरेंद्र की सबसे बड़ी मुश्किल थी उनका उच्चारण. बिहार का होने की वजह से ‘श’ को ‘स’ और ‘ड़’ को ‘र’ बोलने की उनकी आदत से उन्हें शुरू में बहुत परेशानी हुई. बिहार राज्य में उच्चारण को लेकर कुछ लोगों को ये ‘तथाकथित’ परेशानी रहती है. एक्टिंग करने के लिए आवाज़ और बोलने की कला में अच्छा होना बहुत ज़रूरी होता है लेकिन अगर आप ‘सड़क’ को ‘सरक’ बोल रहे हैं और ‘शमशीर’ को ‘समसीर’, तो मुश्किल है की आपको किसी फ़िल्म में रोल मिल सके.

इस दिक्कत को दूर करने के लिए श्रीराम सेंटर में नरेंद्र ने बहुत मेहनत की. भाषा पर पकड़ बनाने को हमेशा उन्होंने पढ़ने का अभ्यास जारी रखा.

मुम्बई का सफ़र

एक्टिंग की बारीकियां सीखने के तुरंत बाद नरेंद्र साल 1993 में मायानगरी मुम्बई की ओर चल पड़े. यहां आने के कुछ समय बाद ही, चेहरा-मोहरा अच्छा होने की वजह से उनको मॉडलिंग और फिर ऐड फिल्मों में काम मिलने लगा. मॉडलिंग से ठीक-ठाक आमदनी होने लगी और उनके मुम्बई में रहने-खाने का खर्च निकलने लगा. धीरे-धीरे मॉडलिंग की दुनिया में उनका अच्छा-ख़ासा नाम हो गया. इसी दौरान उन्हें दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक शांति में गौरव का क़िरदार मिल गया. फिर तो एक के बाद एक, आगे रास्ते खुलते ही गए.

आगे चलकर इतिहास, युद्ध, थीफ़ ऑफ़ बग़दाद, कैप्टेन हाउस, आम्रपाली, रावण, बेगूसराय, छूना है आसमान, चेहरा, एक घर बनाऊंगा, क्योंकि सास भी कभी बहु थी, जय हनुमान जैसे कई सारे धारावाहिकों के ज़रिये उन्होंने दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाई.

साल 1996 में अमिताभ बच्चन कारपोरेशन लिमिटेड (ABCL) की ओर से नए चेहरों की तलाश में स्टार ट्रैक नामक एक कांटेस्ट का आयोजन किया गया था. कांटेस्ट में चुने गए नौ लड़के-लड़कियों में से नरेंद्र भी एक नाम थे. इस दौरान जाने-माने एक्टिंग गुरु रौशन तनेजा से नरेंद्र झा को एक्टिंग की और भी कई बारीकियां समझने का मौक़ा मिला था.

फ़िल्मों में एंट्री

साल 2003 में फंटूश फ़िल्म से नरेंद्र ने बड़े पर्दे पर दस्तक दी. हालांकि उनका रोल छोटा सा ही था मगर लोगों की नज़रों में वो आ चुके थे. इसके कुछ समय बाद ही मशहूर फ़िल्मकार श्याम बेनेगल की फ़िल्म नेताजी सुभाष चंद्र बोस में उन्हें हबीब-उर-रहमान का क़िरदार करने का मौक़ा मिला. ये भी एक छोटा सा ही रोल था मग़र झा साहब ने कभी भी क़िरदार की लंबाई देखकर फ़िल्म को हां-ना नहीं किया. इसी का नतीजा हुआ कि आगे चल कर साल 2014 में श्याम बाबू ने नरेंद्र झा को अपने धारावाहिक संविधान में मोहम्मद अली जिन्ना का दमदार रोल सौंपा, जिसमे नरेंद्र के अभिनय कौशल का अलग ही नज़ारा देखने को मिला था.

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धारवाहिक संविधान में मोहम्मद अली जिन्ना के रोल में नरेंद्र झा 

बोस फ़िल्म के बाद नरेंद्र के फ़िल्मी सफ़र ने रफ़्तार पकड़ ली. दक्षिण भारत की छत्रपति, लीजेंड जैसी फ़िल्मों में उन्होंने एस.एस. राजामौली सरीखे कई बड़े निर्माता-निर्देशकों के साथ काम किया. कई भाषाओं में उनका फ़िल्मी सफ़र जारी रहा. मग़र हिंदी फ़िल्मों में उनके कैरियर को नई दिशा मिली फ़िल्म हैदर से.

हैदर फ़िल्म ने अलग मुक़ाम पर पहुंचाया

नरेंद्र झा के फ़िल्मी सफ़र में विशाल भारद्वाज की फ़िल्म हैदर ने एक नया कीर्तिमान जोड़ दिया. 2014 में आई इस फ़िल्म को दर्शकों समेत फ़िल्मी आलोचकों ने भी काफ़ी सराहा. तब्बू, के.के.मेनन, इरफ़ान, ललित परिमू, शाहिद कपूर जैसे कलाकारों के बीच नरेंद्र का अपनी हाज़िरी दर्ज करा जाना ही काफ़ी रहता, मग़र यहां तो डॉक्टर हिलाल मीर की भूमिका में उन्होंने पूरी फ़िल्म की एक मज़बूत कड़ी का ही काम कर डाला.

ख़ास तौर से उनकी आवाज़ में गुनगुनाये गए फ़ैज़-अहमद-फ़ैज़ के तरानों- ‘गुलों में रंग भरे’ और ‘हम देखेंगे’ ने फ़िल्म को एक कलात्मक सिनेमा का रूप दे दिया था.

रईस फ़िल्म का डॉन मूसा भाई हो या फ़िल्म क़ाबिल का इंस्पेक्टर चौबे, घायल-वंस अगेन का बिज़नेसमैन राज बंसल हो या कि मोहनजोदड़ो का पागल जखीरो, अपने निभाये हर क़िरदार में नरेंद्र झा दमदार आवाज़ और शानदार अभिनय क्षमता से जान डाल देते थे.

हमारी अधूरी कहानी, शोरगुल, फ़ोर्स 2, रेस 3, जैसी बड़े बजट की फिल्मों के साथ ही माई फ़ादर इक़बाल जैसी छोटे बजट की फ़िल्म में भी उन्होंने काम किया. बाहुबली फ़ेम प्रभास अभिनीत आने वाली फ़िल्म साहो में भी उनका एक रोल है.

ज़बरदस्त गायक-म्यूजिशियन

नरेंद्र झा की अभिनय क्षमता से तो सभी वाक़िफ़ हैं मग़र बहुत कम लोगों को पता होगा की वो एक बेहतरीन गायक होने के साथ ही ज़बरदस्त म्यूजिशियन भी थे. ख़ाली समय में गिटार, पियानो, माउथ ऑर्गन, बांसुरी बजाना और उनकी धुनों पर गाने गुनगुनाना उनका पसंदीदा शौक था. ये अलग बात है कि गायकी की उन्होंने कहीं-कोई स्पेशल ट्रेनिंग नहीं ली थी.

सेंसर बोर्ड की पूर्व CEO पंकजा ठाकुर से साल 2015 में ब्याह करके नरेंद्र ने अपने गृहस्थ जीवन की शुरुआत की थी. साल 2016 में लगभग एक माह के अंतराल में ही माता-पिता दोनों को खोने के डेढ़ साल बाद ही नरेंद्र भी इस दुनिया को अलविदा कह गए. 14 मार्च, 2018 को मुम्बई से क़रीब 80 किलोमीटर दूर, वाड़ा स्थित अपने फार्म हॉउस में सुबह क़रीब पांच बजे दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई.

मुमक़िन है कि नरेंद्र झा जैसा कलाकार अग़र कुछ समय और इस दुनिया में रहता तो हमें उनके अभिनय कौशल के और भी कई नमूने देखने को मिलते मग़र अब उनको केवल पर्दे पर निभाये गए उनके क़िरदारों में ही देखा जा सकता है.

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