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रिपोर्ट

देवीप्रसाद त्रिपाठी नहीं रहे: दोस्तों का दोस्त, लोकतंत्र का फ़िक्रमंद और तानाशाही का निंदक चला गया

देवीप्रसाद त्रिपाठी नहीं रहे। साहित्य और कला के नायाब प्रेमी और ख़ैरख़्वाह थे। एनसीपी के महासचिव थे और राज्यसभा सदस्य रहे।

वे डीपीटी नाम से ज़्यादा जाने जाते थे। लम्बे समय से कैंसर से जूझ रहे थे। पर जीवट ऐसा कि मित्रों के बीच शाम गुज़ारे बग़ैर उन्हें चैन नहीं पड़ता था। बालपन से चले आते आँखों के असाध्य कष्ट के बावजूद वे ख़ूब पढ़ते थे। ख़ूब किताबें ख़रीदते थे। याददाश्त अचूक थी। हिंदी, उर्दू और अंगरेज़ी के उद्धरण उनकी ज़ुबान से किसी चौपाई की तरह बहते थे। उनकी वक्तृता सदा असरदार थी।

साहित्य-संस्कृति के तो सहचर ही थे। छोटे हों चाहे बड़े, लेखकों से उनका गहरा याराना था। फ़ैज़ दिल्ली आए तो फ़ैज़ साहब की चाह पर उन्हें फ़िराक़ साहब से मिलाने इलाहाबाद (जहां वे खुद कभी पढ़ाया किए) ले गए थे। फ़हमीदा रियाज़ को पाकिस्तान की हुकूमत ने सताया, तो दिल्ली में डीपीटी के घर पनाह ली थी। नेपाल के लिए तो वे भारत के सहृदय स्वयंभू राजदूत थे। उनसे आख़िरी बात फ़ोन पर तब हुई, जब उन्हीं की तरह राजनीति और बौद्धिक गतिविधियों के बीच आवाजाही करने वाले प्रदीप गिरि काठमांडू से दिल्ली आकर उनके साथ बतरस जमाए हुए थे।

अशोक वाजपेयी के साथ बैठकर तरह-तरह के आयोजनों की कल्पना करते रहते थे। कुछ रोज़ से मुझे अपने यहाँ एक व्याख्यान देने को उकसा रहे थे। यारों के यार थे। जिसके लिए जो बन पड़ता, आगे बढ़कर ख़ुशी-ख़ुशी बग़ैर जताए करते थे। ‘थिंक इंडिया’ पत्रिका का नियमित सम्पादन-प्रकाशन करते रहे। देश में साम्प्रदायिता और छद्म राष्ट्रवाद के उबाल से बहुत आहत थे। दिल्ली में छात्रों, शिक्षकों और पत्रकारों पर राष्ट्रवाद के नाम पर हमला हुआ, तो संसद में सैमुअल जॉनसन को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा था – Patriotism is the last refuge of the scoundrel!

उनका जाना दुखद है। दोस्तों का दोस्त चला गया। लोकतंत्र का फ़िक्रमंद, तानाशाही का निंदक चला गया। उन्हें आख़िरी सलाम करते हुए संसद में उनकी आख़िरी तक़रीर याद करता हूँ, आपसे साझा करता हूँ।

अपनी उस तक़रीर को बंद करते उन्होंने हफ़ीज़ होशियारपुरी की ग़ज़ल का यह मतला कहा था, जो आज कितना मौजूँ अनुभव होता है: “मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे।”

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