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ओले गिरने पर दिल्ली की तुलना शिमला-मसूरी से करने वालों ये ओले किसानों के लिए काल हैं

नोएडा की ओलावृष्टि की जो तस्वीरें वायरल हो रही हैं, डराने वाली हैं। ओलों का मतलब फसलों की, मतलब किसानों की पिटाई। किसी आश्रयहीन रास्ते में ओलों के बीच फंस जाने वाले व्यक्ति और पशु-पक्षियों के लिए भी स्थिति भयावह हो जाती है।

यह शायद उस पृष्ठभूमि का असर है जिसमें पला-बढ़ा कि ओले देखकर एकदम चिंता होने लगती है। रात में ही गांव में घर पर फोन मिलने की कोशिश की। एक दोस्त से पता चला कि गांव में ओले नहीं पड़े पर दूसरी कई जगहों पर काफी ओले गिरे हैं।

खेत में खड़ी फसल का मामला दुकान या नौकरी से इस नाते काफ़ी अलग है कि वह हमेशा क़ुदरत की मार की आशंका के साये में रहती हो। फसल पककर तैयार हो तो ऐन मौके पर मौसम मटियामेट कर देता है। गेहूँ की फसल संगवाने की प्रक्रिया के दौरान तो कभी-कभी दुर्गति के लंबे सिलसिले भी झेलने पड़ते हैं। एक साल गेहूँ की पकी फ़सल पहले ओलों की चपेट में आयी। फिर जब फसल काट ली गयी तो थ्रेशिंग से पहले ही तेज़ बारिश हुई। मौसम खुला तो हम लोगों ने गेहूँ की पुलियों (बंडल) को खेत में अलट-पलट किया। उनमें हवा निकली भी न थी कि फिर बारिश आ गयी। उस साल बहुत से किसानों के खेत में कटे पड़े गेहूँ वहीं झड़ने लगे थे। बहुत सारा दाना काला पड़ गया था। भूसे के ढेर तो कई बार संगवाये जाने से पहले ही आँधी उड़ा ले जाती थी।

खेत में अचानक तेज़ बारिश से बुरी गत हो जाने की मज़ेदार यादें भी हैं पर ऐसा कभी नहीं होता था कि ओले गिरना मज़े की बात के तौर पर दर्ज़ होता हो। तब भी नहीं जब कोई फ़सल तैयार न खड़ी हो।

इन भयानक अधकचरे और असंवेदनशील नागरिकों के लिए वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक रंजन लिखते हैं,

दिल्ली और आस-पास के इलाक़ों में काफ़ी ओले पड़े। फेसबुक पर तस्वीरें साझा की जा रहीं हैं। उत्साह व आनंद से विभोर कई लोग ‘ओला आच्छादित’ दिल्ली की तुलना शिमला-मसूरी से कर रहे हैं!
यही ओले किसानों के चास-खेत में भी गिरे हैं? रबी फ़सलों को काफ़ी नुकसान हुआ है। फिर भी,’ओलावृष्टि’ का जश्न मनाया जा रहा है। जश्नजीवी यही लोग किसानों की ख़ुदकशी पर टिपना लोर (आंसू) भी बहाते हैं? खेतों में पड़ी दरारें,किसानों की फटी एड़ियां और आकाश की तरफ़ टकटकी लगाए काश्तकारों की छवियाँ खूब शाया होती हैं,जब राजधानी में उनका जुटान होता है। वाकई बड़ी छबीली है यह दिल्ली! क्या पता,किसी रोज़ ‘रक्तवृष्टि’पर भी यहाँ जश्न होने लगे!

पर्यावरण के संरक्षण के लिए काम करने वाले युवा पत्रकार रोहिन कुमार ने दुख व्यक्त करते हुए लिखा है,


अभी और भयावह होगा. पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगा कोई, उसकी मार झेलेगा कोई और. ओले के साथ सेल्फी वालों को समझ नहीं आएगा क्योंकि उनका कोई नुकसान नहीं हुआ है. और, किसानों ने लक्जरी लाइफ जी ही नहीं..

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