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मोदी जी याद कीजिए DRDO ने साल 2012 में ही हासिल कर ली थी ‘मिशन शक्ति’ की क्षमता

प्रिय भारत के प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी जी,

आज आपने देश की एक आठ साल पुरानी और उल्लेखनीय उपलब्धि को सनसनी बनाने के प्रयास में बेहद निराश किया। इससे लगता है कि आप चुनावी माहौल बदल देने और जीत जाने के लिए कितने डेस्परेट हैं। मिशन शक्ति की सफलता वाकई एक उपलब्धि है और आपका संदेश एकदम ठीक था। लेकिन आपने जिस तरह देश के नाम संदेश की घोषणा करके इसे भुनाने की सनसनीखेज कोशिश की, वह भारत जैसे महादेश के प्रधानमंत्री के बतौर बेहद बचकाना हरकत रही।

आपको वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के माध्यम से पता होगा कि भारत अंतरिक्ष में आपके प्रधानमंत्री बनने से पहले एक महाशक्ति बन चुका था। विभिन्न अंतरिक्ष कार्यक्रमों के तहत इसरो अब तक 103 उपग्रह छोड़ चुका है। पीएसएलवी, जीएसएलवी, एरियन आदि लांच व्हीकल के सहारे, जी-सैट, माइक्रो-सैट, कार्टो सैट, आईएनएस, इनसेट, रीसैट, एस्ट्रोसैट आदि तमाम श्रेणी की कई उपग्रह सीरीज लांच हुई हैं। भारत का पहला उपग्रह आर्यभट्ट 1975 में और भास्कर उपग्रह 1979 में ही लांच हो गए थे। जिस मिशन के बारे में आज आपने सूचना दी, वह सूचना 2012 की है। भारत यह कारनामा आज के आठ साल पहले ही कर चुका है। आपके प्रधानमंत्री बनने से पहले ही भारत दूसरे देशों के उपग्रह भी लांच करने लगा था। फिर ऐसा क्या था कि आपने अचानक देश को संबोधित करने और संदेश देने का शगूफा छोड़ दिया। नया क्या हुआ? यह उपलब्धि निश्चित तौर पर उन सफलताओं का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन वह तो पहले ही हो चुका था।

आपने जिस तरह की बज क्रिएट की और फिर इसकी घोषणा की, वह बहुत हल्की हरकत थी। देश का मजबूत होना जरूरी है और देश की मजबूती प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति की मजबूती से तय होती है, चाहे मोदी हों, मनमोहन हों, या कोई और।

जो सूचना आपका प्रचार विभाग और आपका ट्वीटर अकॉउंट दे सकता था, उसे आपने ऐसे पेश किया जैसे कि चुनावी माहौल में देश पर कोई संकट आन पड़ा है और आप अचानक राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं। कुछ घंटे तक इसे लेकर कयास लगाए गए और चैनलों ने चरस बो दिया। ऐसी बातों से न सिर्फ आपके पद, बल्कि एक महादेश की सामूहिक छवि कमज़ोर होती है।

अगर स्पेस में यह हमारी पहली उपलब्धि होती तो निश्चित तौर पर आप ऐसा कर सकते थे, जैसा इंदिरा गांधी ने किया था जब भारतीय वैज्ञानिक आसमान में थे और पीएम की हैसियत से उन्होंने वैज्ञानिकों से बात की थी। देश को अचानक संबोधित करने की वजह पाकिस्तान तोड़कर बांग्लादेश बना देने जैसी उपलब्धि भी हो सकती है और इमरजेंसी जैसा कलंक लगा देने वाली तानाशाही भी।

प्रधानमंत्री देश के नाम अचानक संदेश दे तो ज़रूरी नहीं कि वह देशवासियों को पसंद ही आएगा। इंदिरा गांधी के दो संबोधनों से इसे समझा जा सकता है। एक संबोधन के बाद, कथित तौर पर आपके पितृ पुरुष अटल ने उन्हें दुर्गा कह डाला था, दूसरे संबोधन के बाद वे भारत की ना भूतो न भविष्यति तानाशाह बन गईं।

आप जब भी देश को संबोधित करेंगे, देश आपको ध्यान से सुनेगा। आपको इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि इस देश की पिछली 70 साल की उपलब्धियां देश के सामने हैं और यह भी के आप भारत वर्ष के प्रधानमंत्री हैं। गरिमा बनी रहे तो बुराई क्या है! आप ही कहते हैं कि हम आप नहीं रहेंगे, यह देश तब भी रहेगा। तो बेहतर हो कि इसकी गरिमा को भी बनाये रखा जाए। उम्मीद है कि आपके समर्थक इन बातों का बुरा नहीं मानेंगे।
हार्दिक धन्यवाद।
आपका
कृष्ण कांत

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