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देवीलाल तेरी नेक कमाई, दुष्यंत ने मिट्टी में मिलाई!

परमीत काजल

24 अक्टूबर को हरियाणा विधानसभा के चुनावों का परिणाम आया तो राज्य में किसान कमेरे वर्ग में एक ख़ुशी का माहौल था। हो भी क्यों ना, दुष्यंत को इस वर्ग ने 10 सीटें जीता कर सत्ता की ’चाबी’ हाथ में देकर 5 साल में अपने ख़िलाफ़ हो रही ज़्यादतियों एवं अत्याचारों को दूर करने लिए, उससे भी ऊपर अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिए, और अपने खेत में खड़ी फ़सलों के सम्मानजनक मूल्यों के लिए; खट्टर की मरोड़ जो निकाल दी थी। सिर्फ़ खट्टर ही क्यों किसान-कमेरे वर्ग ने तो ’मोदी-शाह’ की जोड़ी को भी पानी पिला दिया था; जिन्होंने भारत के प्रधान मंत्री और गृह मंत्री होते हुए भी छोटे से हरियाणा में खट्टर को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाने के लिए इतनी रैलियाँ की थी।

अबकी बार 75 पार’ का नारा देने वालों के लिए, बहुमत का आँकड़ा छूने भर के लिए भी निर्दलियों का हाथ पकड़ने की नौबत आ गयी। ‘बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाले, गोपाल कांडा के ‘गीतिका शर्मा कांड’ को भी भूलते दिखाई दिए। जिस गोपाल कांडा की गिरफ़्तारी के लिए भाजपा के नेताओं ने दिल्ली में 2012 में धरने प्रदर्शन किए, उसी कांडा का समर्थन लेने के लिए अब सिरसा से भाजपा की सांसद सुनीता दुग्गल, गोपाल कांडा को चार्टेड प्लेन में दिल्ली लेकर आईं।

लोकलाज के ऊपर लोकराज को तरज़ीह
किसान कमेरे वर्ग के मसीहा, ताऊ देवी लाल ने हमेशा लोकलाज की बात की। किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़ों के इज़्ज़त और मान सम्मान की लड़ाई लड़ी। अपनी ज़बान के पक्के रहे। यहाँ तक कि अपनी ज़बान की लाज रखने के लिए ही प्रधानमंत्री तक कि कुर्सी ठुकराते और लोकलाज को ऊपर करते हुए कहा कि ‘लोग मुझे प्यार से ताऊ बोलते हैं, मुझे ताऊ ही रहने दो। प्रधानमंत्री वी॰पी॰ सिंह को बना दो’। वहीं दूसरी और दुष्यंत ने अपनी ही ज़ुबान से मुकरते हुए भाजपा से हाथ मिला लिया। यूँ तो ताऊ ने भी 90 के दशक में भाजपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ा, परंतु वो चुनाव, कोंग्रेस की किसानों एवं मज़दूरों की दमनकारी नीतियों के ख़िलाफ़ लड़ा था। चौधरी ताऊ देवी लाल कभी शोषण कर्ताओं के साथ जाकर चुनाव नहीं लड़े। उनका मानना था कि लोकराज, लोकलाज़ से चलता है। लेकिन वहीं दूसरी और दुष्यंत चौटाला ने लोकलाज के ऊपर लोकराज को तरज़ीह दी। उन्होंने लोगों की भावनाओं की भी लाज़ नहीं रखी।
दुष्यंत चौटाला, उस पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने चले हैं, जिनकी शोषणकारी नीतियों से किसान, मज़दूर एवं ज़मींदार पिछले पाँच साल से दुःखी हैं। मज़दूरों के बेहतर भविष्य के लिए मज़बूत नहीं, मजबूर सरकार देनी चाहिए थी। इसलिए सरकार से बाहर रहकर मज़दूरों के हित में आवाज़ उठानी चाहिए थी।

किसान कमेरे वर्ग ही नहीं, छात्रों एवं आरक्षित वर्ग से भी छल
चौधरी ताऊ देवी लाल हमेशा ही दमनकारी सरकारों, मुख्यतः कांग्रेस मुक्त राज्यों की परिकल्पना करते थे। इसी कड़ी में उन्होंने 1987 में हरियाणा की 90 में से 85 सीटें जीतकर कोंग्रेस को हरियाणा में मात्र 5 सीटों पर लाकर खड़ा कर दिया था। यही नहीं, किसान-मज़दूरों को दमनकारी सरकारों के विरुद्ध एक नया विकल्प भी दिया था। वहीं दूसरी और दुष्यंत चौटाला ने दमनकारी सरकार के साथ हाथ मिलाकर न केवल किसान-मज़दूरों एवं ज़मीनदार वर्ग के साथ छल करने का काम किया है। अपितु हाल ही में ग्रूप डी॰ की नौकरी परीक्षा मात्र के लिए पूरे हरियाणा में इधर से उधर दौड़ाये गये, एवम् करनाल आई॰टी॰आई॰ के प्रदर्शनकारी छात्रों को भी ठगने का काम किया है। जिन्होंने रोष में, सरकार के विरोध में वोट किया था। यहीं नहीं, दुष्यंत चौटाला ने आरक्षित वर्ग को भी नहीं बक्शा, जिसने दुष्यंत को 10 सीटें जितवाने में न केवल जी तोड़ मेहनत करी बल्कि 10 में से गुहला, नरवाना, शाहबाद एवं उकलाना की 4 आरक्षित सीटें जितवा कर भी दी। इस वर्ग ने भी अच्छी ख़ासी तादाद में दिल्ली में रविदास मंदिर और लखनऊ में महर्षि वाल्मीकि के मंदिर के तोड़े जाने की वजह से, सरकार के विरोध में वोट किया था।

अपने कौन से बुरे थे?
ख़बरों की माने तो भाजपा का साथ देने की एवज़ में दुष्यंत चौटाला ने उपमुख्यमंत्री, 2 कैबिनेट मंत्री और एक राज्यसभा पद माँगा है। अगर उपमुख्यमंत्री पद से ही संतुष्ट होना था तो अपने दादा ओम् प्रकाश चौटाला और चाचा अभय चौटाला कौन से बुरे थे? उनसे भी माँग सकता था। जबकि चौटाला परिवार के धर्मभाई पंजाब के बादल परिवार में, प्रकाश सिंह बादल और सुखबिर सिंह बादल के बीच तो यह होता भी आया है। सुखबिर सिंह बादल तो 2014 में हिसार के पुराना सरकारी कॉलेज मैदान में दुष्यंत के चुनावी प्रचार के लिए आए थे। जब अभय चौटाला ने भी पूरी जान लगा दी थी अपने परिवार के नयी पीढ़ी के चुनावी सफ़र की शानदार शुरुआत करवाने के लिए। यही नहीं पिछले साल बी॰एस॰पी॰ और आई॰एन॰एल॰डी॰ के बीच हुआ गठबंधन तो इतना मजबूत था कि सरकार बनाने के बाद जितने चाहे मंत्री बन सकते थे। 1996 के आम चुनावों में ताऊ देवीलाल और साहब कांशीराम की जोड़ी ने 10 में से 5 सीटें जीतकर गठबंधन की मज़बूती दिखा भी दी थी। हरियाणा की राजनीति पर अच्छे से नज़र रखने वाले पत्रकार मंदीप पूनिया ने भी अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि आरएसएस के इशारों पर चलकर दुष्यंत एवं दिग्विजय चौटाला ने गौहाणा में न केवल अपने दादा चौधरी ओम् प्रकाश चौटाला और चाचा अभय चौटाला के ख़िलाफ़ रैली में हूटिंग करवाई, अपितु परिवार एवं पार्टी तोड़कर नई पार्टी भी बना ली।

किसान-ज़मींदार के नेता से आधे परिवार का नेता
जहाँ, ताऊ देवीलाल ने किसान मज़दूर और ज़मींदारों को एक किया। उनके नेता कहलवाये। वहीं दूसरी ओर पार्टी और परिवार ही नहीं, किसान-कमेरे और ज़मींदार वर्ग को भी आई॰एन॰एल॰डी॰ और जे॰जे॰पी॰ के बीच में बाँटने का काम दुष्यंत का ही कहा जा सकता है। अपने चुनावी प्रचार में भी जो दुष्यंत चौटाला ने चुनावी गाने इस्तेमाल किए उनके बोल “यो तो रूप दूसरा ताऊ का दुष्यंत चौटाला रै”, में भी ताऊ की साफ़ छवि को भुनाने की कोशिश की गयी। ऐसा नेता जो कुर्सी के लालच में लोकसभा चुनावों में ‘ऐनक’ के शीशे तो फोड़ ही गया; बल्कि विधान सभा चुनावों में तो किसान-कमेरे वर्ग की आँखे ही फोड़ गया। जो ताऊ देवीलाल जैसा किसानों का नेता तो बन नहीं पाया, बल्कि चौधरी ओम् प्रकाश चौटाला के जेल में चले जाने के बाद जाट नेता बनने के चक्कर में एक परिवार का नेता बन के रह गया, वो भी आधे चौटाला परिवार का।

(लेखक जेएनयू के रिसर्च स्कॉलर हैं)

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