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रिपोर्ट

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को झारखंड पुलिस ने एक जनसभा करने पर किया गिरफ्तार

झारखंड पुलिस ने प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को गिरफ्तार कर लिया है. उन्हें गढ़वा के बिशुनपुर थाना की पुलिस ने हिरासत में लिया है. न्यूज विंग की रिपोर्ट के अनुसार उनके साथ पुलिस ने विवेक गुप्ता समेत अन्य एक व्यक्ति को भी हिरासत में लिया है. सभी को बिशुनपुर थाना में रखा गया है. ज्यां द्रेज ने बताया है,

“वे लोगों के साथ बिशुनपुर बाजार में राईट टू फुड (भोजन के अधिकार) पर एक कार्यक्रम का आयोजन कर रहे थे. जिसकी जानकारी प्रशासन को भी दी गयी थी. जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ पुलिस वहां आई और उनको और उनके साथियों को थाने ले गई.”

पुलिस ने न्यूज विंग की टीम को बताया है कि आचार संहिता लागू होने और बिना प्रशासनिक अनुमति के कार्यक्रम करने की वजह से उनको गिरफ्तार किया गया है. मामले की जानकारी एसडीओ और दंडाधिकारी को दे दी गयी है. उनके आने पर सभी को मुक्त करने पर फैसला लिया जायेगा.

कौन हैं ज्यां द्रेज

हिमांशु कुमार लिखते हैं, ज्यां द्रेज दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री माने जाते हैं. अमर्त्य सेन ने अपनी अधिकांश पुस्तकें ज्यां द्रेज के साथ मिलकर लिखी हैं. एक बार ज्याँ द्रेज को दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिये बुलाया गया था. ज्यां द्रेज ने नज़दीक की झुग्गी झोंपड़ी में रहना चुना. वे रोज़ सुबह साइकिल के कैरियर पर अपना तौलिया कपड़े और साबुन लेकर यूनिवर्सिटि जाते थे. वहाँ के बाथरूम में नहाकर ज्यां अपनी क्लास लेते थे.

ज्यां और बेला भाटिया की शादी हुई. बेला भाटिया आजकल छत्तीसगढ़ में आदिवासी अधिकारों के लिये काम कर रही हैं. ज्यां द्रेज जिस झुग्गी बस्ती में रहते थे, एक बार सरकार ने उसे तोड़ने की तैयारी करी. बस्ती के लोग ज्यां द्रेज के पास आये. ज्यां द्रेज ने गूगल नक्शा निकाला. उसमें कुछ देखा, और एक चिट्ठी बनाई. साथ में नक्शा नत्थी कर दिया और सरकार को भेज दिया.

चिट्ठी में ज्यां ने लिखा कि गूगल मैप बताता है कि दिल्ली में 12% ज़मीन पर झुग्गी बस्तियां बसी हुई हैं. लेकिन नक्शा बताता है कि दिल्ली की 44% ज़मीन पर कारों का कब्ज़ा है. इन कारों के मालिक गलियों और सड़कों पर अपनी गाड़ियों को अवैध रूप से खड़ा करते हैं. कारों के मालिक सरकार को पार्किग का कोई पैसा नहीं देते. इसलिये अगर सरकार को ज़मीन चाहिये तो वह गरीबों का मकान तोड़ने की बजाय अमीरों की कारों द्वारा अवैध रूप से घेरी गई जमीनों को वापिस लेने की योजना बनाये.

उसके बाद से आज तक वह झुग्गी बस्ती नहीं तोड़ी गई. किसी भारतीय के दिमाग में गरीबों के पक्ष में इस तरह के ख़्याल क्यों नहीं आते? ज्यां द्रेज ने लम्बे समय तक झारखण्ड में आदिवासियों के भोजन के अधिकार के मुद्दे पर काम किया है.

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