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अर्थव्यवस्था के आंकड़े मोदी के खिलाफ़ हैं इसलिए प्रचार में मुसलमान और पाकिस्तान निशाने पर हैं!

इस चुनाव में असली मुद्दे कहा हैं? नोटबंदी की मार के बाद देश की अर्थव्यवस्था ढह रही है उस पर कोई बात क्यों नहीं कर रहा है?

मार्च के आखिरी हफ्ते में जब फाइनेंशियल ईयर 2018-19 के आंकड़े सामने आये हैं तो पता चल रहा है कि बढ़ना तो दूर रहा डायरेक्‍ट टैक्स कलेक्शन तो इस साल के निर्धारित लक्ष्य से भी 15 फीसदी नीचे आ गया है. टैक्‍स कलेक्शन का लक्ष्य 12 लाख करोड़ रुपये रखा गया था लेकिन 23 मार्च तक मात्र 10,21,251 करोड़ रुपये ही एकत्र किए गए हैं. यह बजट लक्ष्य का 85.1 फीसदी है.

पहले जब भी इस तरह की बात उठाई जाती थी तो हमें यह बोला जाता था कि नोटबंदी के बाद से देश का डायरेक्ट टेक्स कलेक्शन बहुत बढ़ गया है इनकम टेक्स देने वालों की संख्या दुगुनी तिगुनी हो गयी है! लेकिन अब इस झूठ की पोल भी खुल गयी है।

इसी तरह जीएसटी की सफलता का भी बहुत ढोल पीटा जाता है। इसलिए एक बार इनडायरेक्‍ट टैक्‍स के तहत जीएसटी कलेक्‍शन पर भी नजर डाल लीजिए, फाइनेंशियल ईयर 2018-19 के आंकड़े के अनुसार ओवरआल जीएसटी कलेक्‍शन भी निर्धारित लक्ष्‍य से दूर रहा है चालू वित्त वर्ष में जीएसटी कलेक्‍शन फरवरी तक 10.70 लाख करोड़ रुपये हुआ है. जबकि मोदी सरकार ने चालाकी दिखाते हुए चालू वित्त वर्ष में जीएसटी संग्रह लक्ष्य में संशोधन करते हुए इसे 13.71 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 11.47 लाख करोड़ कर दिया था।

मनमोहन सिंह ने साफ़ कहा था कि नोटबंदी के बाद जीडीपी में गिरावट आना तय है।

इस बार भारत की आर्थिक विकास दर चालू वित्तवर्ष 2018-19 में सात फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है। जो पिछले वित्तवर्ष की आर्थिक विकास दर 7.2 फीसदी से कम है. 2018-19 की जीडीपी विकास दर पिछले पांच सालों के मुकाबले सबसे कम है। इस सन्दर्भ में जो लेटेस्ट रिपोर्ट है वह बता रही है कि पिछले साल जीडीपी 7.7 फीसदी थी जो घटकर 6.6 फीसदी पर आ गयी है। ये आंकड़ा इस वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही यानी अक्तूबर से दिसंबर के बीच का है। इस गिरावट के पीछे मैनुफैक्चरिंग सेक्टर के कमजोर होने और कृषि उत्पादन में गिरावट को मुख्य कारण बताया गया है।

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) के आंकड़ों के मुताबिक देश के औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) की वृद्धि दर जनवरी महीने में धीमी पड़कर 1.7 फीसदी रह गई. एक साल पहले यानी जनवरी, 2018 में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर 7.5 फीसदी रही थी. इस तरह देखा जाए तो आईआईपी में पिछले एक साल में भारी गिरावट आई है. चालू वित्त वर्ष की अप्रैल से जनवरी अवधि में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर 4.4 फीसदी रही है जो इससे पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में औसतन 4.1 फीसदी रही थी.

इन सब बातों का परिणाम यह हुआ है कि इस साल राजकोषीय घाटे में बेतहाशा वृध्दि हुई है।

टैक्स कलेक्शन कम होने से चालू वित्त वर्ष 2018-19 (अप्रैल-मार्च) के शुरुआती 11 महीनों में भारत का राजकोषीय घाटा बजटीय लक्ष्य का 134.2 फीसदी हो गया है। महालेखा नियंत्रक (सीजीए) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष के शुरुआती 11 महीनों में राजकोषीय घाटा उस साल के लक्ष्य का 120.3 फीसदी था। राजकोषीय घाटा बढ़ने का मुख्य कारण राजस्व संग्रह की वृद्धि कम रहना है।

मोदी समर्थको द्वारा सबसे बड़ा झूठ भारत के कर्ज के आंकड़े को लेकर बोला जाता है कि मोदीराज में देश पर कर्ज कम हुआ है बीते दिसंबर महीने में वित्‍त मंत्रालय के सरकार कर्ज प्रबंधन की एक रिपोर्ट आई है। रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर के अंत तक सरकार पर कर्ज में इजाफा हुआ है. जून 2018 के अंत तक 79.8 लाख करोड़ रुपये कर्ज था लेकिन यह सितंबर 2018 तक बढ़कर 82 लाख करोड़ रुपये हो गया. सिर्फ 3 महीने में सरकार पर 2.2 लाख करोड़ रुपये कर्ज बढ़ गया है.

यह आंकड़े देश की अर्थव्यवस्था की सच्ची तस्वीर पेश करते हैं और मोदी सरकार यह जानती है इसीलिये, चुनाव प्रचार में पाकिस्तान, मुसलमान और विपक्षी दलों को निशाने पर रखा जाता है ताकि इन जैसे असली मुद्दों छुपाया दबाया जा सके। पता नहीं कब भारत की जनता इनका यह असली खेल समझ पाएगी?

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