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राजनीति रिपोर्ट

यह कैसा बजट! सौ में से आधा पैसा भी शिक्षा के लिए नहीं..

यूं तो शीर्षक ही सारी कहानी बयां कर देता है और इस सरकार की मंशा भी। अशिक्षित और ग़ैर जागरुक समाज पर कितनी आसानी से राज किया जा सकता है, यह बात हमारे देस के राजनेताओं और सरकारों से छुपी हुई नहीं है। शिक्षा एक ऐसा हथियार है जिससे शासन जनता पर तो वार कर ही सकता है बल्कि अगर यह हथियार जनता पकड़ ले तो इससे सरकार पर पलटवार भी किया जा सकता है।
यह बात सरकार तो समझ रही है लेकिन जनता अभी भी ग़ैर ज़रूरी और हवा-हवाई मुद्दों में बंटी हुई है। सरकार ने इसी बात का फ़ायदा उठाते हुए 2019-20 के बजट में स्कूली शिक्षा पर ख़र्च को 2014-15 के मुक़ाबले 3% तक घटा दिया है। मुद्रा स्फीति को जोड़े तो यह लगभग एक तिहाई कम हो गया है। अब यह हमारे कुल सकल घरेलू उत्पाद GDP का महज़ आधे प्रतिशत से भी कम यानि 0.45% ही रह गया है।
शिक्षा पर बजट से अब कोई ख़र्च नहीं होता। आपको मालूम हो कि व्यक्तिगत/कॉर्पोरेट आयकर से GST तक पर एक शिक्षा सेस (उपकर) लगता है। इस बार के बजट में जितना पैसा इस शिक्षा सेस से एकत्र (लगभग 61 हज़ार करोड़ रुपए) होगा, वह भी पूरा (लगभग 49 हज़ार करोड़ रुपए ही) शिक्षा पर ख़र्च नहीं होगा। दूसरी और जहां 2014-15 में शिक्षक प्रशिक्षण बजट 1158 करोड़ रुपए था, वह 2019-20 में आकर महज़ 150 करोड़ रुपए तक सिमट गया है। 87% की भारी भरकम कटौती। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इस बुनियादी कटौती के कितने दूरगामी दुष्प्रभाव हमारी शिक्षा व्यवस्था पर देखने को मिलेंगे।
2017 के बजट में वित्त मंत्री ने देशभर में 62 नए नवोदय विद्यालयों की स्थापना का ऐलान किया था, पिछले साल ही वित्तमंत्री ने आदिवासी बहुल इलाकों के लिए नवोदय विद्यालयों की तर्ज़ पर आवासीय एकलव्य विद्यालयों की स्थापना की घोषणा की थी। लेकिन साल भर बीत जाने के बाद भी सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस क़दम नहीं उठाए हैं। मोदी सरकार उच्च शिक्षा पर लगातार ज़ोर देती रही हैं लेकिन हायर एजुकेशन फाइनांसिंग एजेंसी HEFA के बजट में 650 करोड़ रुपए की कटौती कर दी है। सरकार की अकर्मण्यता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि पिछले साल शिक्षा के लिए जारी बजट में से 3411 करोड़ रुपए ख़र्च ही नहीं हो सके हैं।
कोशिश तो यह होनी चाहिए थी कि शिक्षा का बुनियादी ढांचा जो पहले से ही जंग खाकर पपड़ी की तरह झड़ता जा रहा है, उसको नए सिरे से मज़बूत किया जाता और तेज़ी से पनप रहे निजीकरण के भूत पर लगाम लगाकर, करोड़ों ग़रीब वंचितों के बच्चों की दिशा में शिक्षा के मूलभूत अधिकार की अनुपालना में ठोस फैसले लिए जाते। उल्टे सरकार ने अपनी इस जिम्मेदारी से हाथ खींचकर लगभग यह घोषणा कर दी है कि इस देस के ग़रीब बच्चों की शिक्षा के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। 
धीरे धीरे हर विभाग की उपेक्षा कर उसे निजी हाथों में सौंपने का यह जो खेल चल रहा है, आख़िरकार यह किसे फ़ायदा पहुंचाएगा? ज़ाहिर सी बात है कि उन निजी पूंजीपति मालिकों को ही जो शिक्षा को बहुत महंगी करके इससे न केवल भरपूर मुनाफ़ा कूट रहे हैं बल्कि धीरे-धीरे वो एक बड़ी वंचित आबादी को शिक्षा के दायरे से बाहर भी फेंक दे रहे हैं। और यह सब सरकार की, जनता की चुनी हुई सरकार की आंखें नीचे हो रहा है। हैरत की बात है कि तमाम विपक्षी दलों ने भी इन गुज़रे हुए पाँच सालों में इसके ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं निकाली। किसी ने भी एक दिन के लिए भी संसद या विधानसभा ठप नहीं की। 
समय आ गया है कि समान और निशुल्क शिक्षा व्यवस्था लागू करवाने के लिए जनता को लामबंद किया जाए और बारी बारी से जनता को मूर्ख बना रही इन धन्ना सेठों की सरकारों को उखाड़ फेंका जाए। 

1 COMMENTS

  1. बजट का गलत विश्लेषण किया गया है। बजट सही तरीके से पढ़े एवं फिर लेख लिखें।

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