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किसानों को तबाह करने वाली बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि का जिम्मेदार शहरी प्रदूषण है!

हाल ही के वर्षों में बेमौसम बारिश और ओलावर्ष्टि से किसानों को काफी नुकसान झेलने पड़े हैं। गर्मी लगातार बढ़ रही है और मानसून अपनी लीक से हट रहा है। शोधकर्ताओं को अब बादलों की जांच करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। उत्तर भारत में लगातार पिछले चार सप्ताह से बारिश हो रही है जिसकी शुरुआत जनवरी के आखरी सप्ताह में हो गयी थी। फरवरी के महीने में उत्तर के मैदानों में अलग-अलग जगह हुई बारिश किसानों की चिंता का विषय भी बनी रही है।

कुछ वर्ष पहले पर्यावरणविद नागराज आडवे और उनकी टीम ने गुजरात का दौरा कर जलवायु परिवर्तन से छोटे किसानों पर पड़े प्रभावों की छानबीन की थी, जिसमें यह पाया गया कि कम सर्दी पड़ने के चलते सर्दियों में मक्का की फसल प्रभावित हो रही है और कई वर्षों से ओस गिरना अत्यधिक कम होने के कारण फसलें बर्बाद हो रही हैं। जहां सिचाईं व्यवस्था नहीं है वहां फसल के लिए नमी एकमात्र स्त्रोत है। उत्तरी मैदानों के गाँवों में पिछले कुछ समय से अधिकतर बरसात गलत समय में होती है, जिससे लोगों को नई बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है, पशु और ज्यादा बीमार रहने लगे हैं, कीटाणुओं का प्रकोप बढ़ गया है।

वह अचानक मौसम में आये बदलाव का कारण पर्यावरण में बढ़ते प्रदूषण को मानते हैं. हाल के वर्षों में भारत के अलावा विश्व के लगभग सभी देश जलवायु परिवर्तन से जूझ रहा है. यह एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे विश्व की समस्या बन चुकी है.

बेमौसम हो रही बरसात का मुख्य कारण पश्चिम विक्षोभ की संख्या में बढ़ोतरी होना है। जिसका मुख्य कारण तिब्बत के पठार और भूमध्यरेखा क्षेत्र के तापमान में बढ़ोतरी होना है। पश्चिम विक्षोभ या वेस्टर्न डिस्टरबेंस की मुख्य वजह ग्लोबल वार्मिंग ही है।

वेस्टर्न डिस्टर्बेंस पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिक बीएन गोस्वामी हमें बताते हैं, 
“भूमध्यसागर के ऊपर कम दबाब का सिस्टम अब बार-बार बन रहा है। यह फिर पूर्व की तरफ बढ़ता है। इससे ईरान, पाकिस्तान और भारत में बरसात और कुछ हिस्सों में बर्फवारी बढ़ गई है। जनवरी से फरवरी के बीच विक्षोभ से भारी बरसात और बर्फवारी होती है। साइक्लोनिक सिस्टम उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी हवाओं के कारण जब भारत पहुंचता है तो इन हवाओं को हिमालय रोक लेता है। इनके आगे न बढ़ पाने के कारण हिमालय पर बारिश होती है। मध्य भारत और दक्षिण भारत में मौसम आमतौर से ठंडा और सूखा और रहता है। लेकिन कभी-कभार यह पश्चिमी विक्षोभ के साथ आए बादलों के बरसने, बाद में शीत लहर और कोहरे के कारण गड़बड़ा जाता है।”

पश्चिम विक्षोभ के चलते उत्तर भारत के पर्वतीय इलाकों में बर्फवारी और उत्तरी राज्यों के अलावा महाराष्ट्र तक में बारिश हुई है। इस साल जनवरी और फरवरी में हुई बरसात इसी का नतीजा है। मार्च महीने के मौसम के बारे में बात करते हुए भारतीय मौसम विभाग के वैज्ञानिक कुलदीप श्रीवास्तव ने हमें बताया,
“मार्च की तीन तारीख तक ही उत्तर भारत के पहाड़ी और मैदानी इलाकों में कई जगह बूंदा-बांदी रहेगी। चार मार्च को बूंदा-बांदी तो नहीं है लेकिन बादल छाए रह सकते हैं। चार मार्च के बाद थोड़ा तापमान बढ़ना शुरू हो जाएगा। तेज हवाएं थोड़ी बहुत चल सकती हैं लेकिन बारिश नहीं होगी।”
कुलदीप श्रीवास्तव ने 2 और 3 मार्च को उत्तरी मैदानों में कई जगह ओलावर्ष्टि की संभावनाएं भी जाहिर की।

अगर ओलावर्ष्टि हुई तो उत्तर भारत के किसानों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। कृषि विशेषज्ञ रमनदीप मान ने ओलावृष्टि की संभावनाओं पर चिंता जाहिर करते हुए हमें बताया, “फरवरी के पहले सप्ताह में हुई ओलावर्ष्टि से पंजाब के जालंधर जिले में आलू की फसल बर्बाद हो गयी है और किसानों को नुकसान झेलना पड़ा है। यूपी में बारिश के चलते गेहूं को छोड़कर अन्य सभी दलहनी-तिलहनी फसलों को नुकसान हुआ है। ज्यादा बारिश के चलते सरसों के पौधे फलियों के बोझ के चलते खेत में गिर गयी हैं। किसान इस समय हल्की-फुल्की बारिश जरूर झेल सकता है लेकिन तेज़ बारिश, आंधी-तूफान और ओलावृष्टि नहीं झेल सकता क्योंकि फसल पककर तैयार हो रही हैं।”

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की मुख्य वजह कार्बन और अन्य गैसों का उत्सर्जन है। दुनियाभर में 2010 में कार्बन डाइऑक्साइड एवं अन्य गैसों का कुल 5000 करोड़ टन उत्सर्जन हुआ। आईपीसीसी (इंटरगवर्नमेंटल पैनेल ऑन क्लाइमेट चेंज) के आंकड़ों के अनुसार कार्बन डाईऑक्साइड व अन्य गैसों के उत्सर्जन में 32 प्रतिशत के लिये औद्योगिक एवं विनिर्माण कार्य, 24 प्रतिशत के लिये वनों की कटाई, 19 प्रतिशत के लिये घर एवं इमारतें, 14 प्रतिशत के लिये परिवहन एवं 11 प्रतिशत के लिये अन्य ऊर्जा जिम्मेदार हैं। लेकिन सबसे चिंताजनक परिवहन क्षेत्र है क्योंकि यह सबसे तेजी से बढ़ते हुए क्षेत्रों में से एक है। पर्यावरण प्रदूषण 30 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र से एवं 70 प्रतिशत शहरी क्षेत्र से हो रहा है।

बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि के गहराते हुए संकट को देखते हुए हमारे पास समय नहीं है। किसानों को बचाने और इससे निपटने के लिये सरकार और समाज दोनों को तत्काल कार्यवाही करने की जरूरत है। 

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